Friday, 23 December 2011

लन्दन से उषाराजे सक्सेना जी की कविता


इस सप्ताह देरी से रचना लगाने के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ.. लीजिये पढ़िएगा लन्दन से उषाराजे सक्सेना जी की एक लाजवाब कविता-






लाचारगी
कभी –कभी

अनजाने ही खुल जाते है

कुछ ऐसे पन्ने

जिनके शब्दों में

उभरने लगते हैं कुछ ऐसे शब्द चित्र

जिनमें सदियों से भटकती

प्यासी आत्माएँ

हाथ उठा- उठाकर

कातर आँखों से

न्याय की गुहार लगा रही हैं।

साँस ले रहे, आज

हर आदमी के सिर पर

कुछ मुर्दे लटक रहे हैं.

उनके कंधों पर

कई – कई चट्टानों का बोझ है.

मेरा बायाँ हाथ

बेजान महसूस करता है,

मैं खुद को भी,

बीते हुए अन्यायों के बीच

आसमान से गिरते

पँख कटे कपोत शिशु सा

असहाय पाती हूँ.


उषाराजे सक्सेना


प्रस्तुतकर्ता- दीपक मशाल

Sunday, 11 December 2011

भारत से चर्चित गज़लकार श्री नीरज गोस्वामी जी की दो ग़ज़लें


लीजिये आज पढ़िएगा भारत के चर्चित गज़लकार श्री नीरज गोस्वामी जी की दो अलग-अलग रंगों की बड़ी ही प्यारी ग़ज़लें.. पहली ग़ज़ल जहाँ एक ओर प्यार में खो जाने को उकसाती है तो दूसरी अपने देश को रहने की एक बेहतर जगह बनाने में गंभीरतापूर्वक अपना योगदान देने के लिए जगाती है..







१-

मान लूँ मैं ये करिश्मा प्यार का कैसे नहीं

वो सुनाई दे रहा सब जो कहा तुमने नहीं

इश्क का मैं ये सलीका जानता सब से सही

जान दे दो इस तरह की हो कहीं चरचे नहीं

तल्ख़ बातों को जुबाँ से दूर रखना सीखिए

घाव कर जाती हैं गहरे जो कभी भरते नहीं

अब्र लेकर घूमता है ढेर-सा पानी मगर

फ़ायदा कोई कहाँ गर प्यास पे बरसे नहीं

छोड़ देते मुस्कुरा कर भीड़ के संग दौडना

लोग ऐसे ज़िंदगी में हाथ फिर मलते नहीं

खुशबुएँ बाहर से 'नीरज' लौट वापस जाएँगी

घर के दरवाज़े अगर तुमने खुले रक्खे नहीं


२.

देश के हालात बदतर हैं, सभी ने ये कहा

पर नहीं बतला सका, कोई भी अपनी भूमिका

झूठ, मक्कारी, कमीनी हरकतें अखबार में

रोज पढ़ते हैं सुबह, पर शाम को देते भुला

बस गया शहरों में इंसां, फर्क लेकिन क्या पड़ा

आदतें अब भी हैं वैसी, जब बसेरा थी गुफा

इस कदर धीमा, हमारे मुल्क का कानून है

फैसला आने तलक, मुजरिम की भूलें हम खता

छोड़िये फितरत समझना, दूसरे इंसान की

खुद हमें अपनी समझ आती कहाँ है, सच बता

दौड़ता तितली के पीछे, अब कोई बच्चा नहीं

लुत्फ़ बचपन का वो सारा, होड़ में है खो दिया

दूसरों के दुःख से 'नीरज' जो बशर अनजान है

उसको अपना दुःख हमेशा ही लगा सबसे बड़ा


प्रस्तोता-

दीपक मशाल

Saturday, 3 December 2011

ग़ज़ल - प्राण शर्मा

आज प्रस्तुत करता हूँ यू.के. के प्रसिद्ध गज़लकार आदरणीय श्री प्राण शर्मा जी की ग़ज़ल
ग़ज़ल - प्राण शर्मा
नादान दोस्तो , पढ़ो ये बात ध्यान से
सोना निकलता है सदा सोने की खान से

लो ,हो गया धुआँ ही धुँआ हर मकान में
फैला धुआँ कुछ इस तरह से इक मकान से

तुम करते हो तरक्की तो अच्छा लगे बड़ा
ज्यों पंछी प्यारा लगता है ऊँची उड़ान से

सारे का सारा शहर भले छान मारिये
मिलता नहीं है चैन किसी भी दुकान से

कितना है बदनसीब वो इन्सान दोस्तो
अनजान ही रहा है जो दुनिया के ज्ञान से

उम्मीद उससे क्यों न बंधे लोगों को जनाब
अब तक तो वो फिरा नहीं अपनी ज़बान से

कब तक छुपाता ही रहेगा अपने जुर्म को
कब तक बचेगा ` प्राण ` वो झूठे बयान से