Monday, 29 June 2009

सुशील कुमार की कविता: इस शहर में रोज़

संक्षिप्त परिचय: नाम: सुशील कुमार
जन्म: १३ सितम्बर १९६४, पटना सिटी,भारत.
शिक्षा: बी.., बी.एड. (पटना विश्वविद्यालय)
निवास स्थान: दुमका: झाड़खंड 814101 (भारत)
संप्रति: +2 जिला स्कूल चाईबासा में प्रिंसिपल के पद पर हैं.
साहित्यिक कार्य-क्षेत्र: हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में लिखने-पढ़ने में गहरी रूचि. काव्यालोचन और वैचारिक आलेख देश-विदेश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होती रहती हैं. साथ ही हिंदी की मानक वेब पत्रिकाओं में भी सतत प्रकाशन. कविता के लिए वे कहते हैं:
"मैं समझता हूं , कविता सिर्फ़ अंतरतम की पिपासा को ही तृप्त नहीं करती , बल्कि दिन-दिन अमानवीय हो रही व्यवस्था पर अनिवार्य आघात भी कर सकती है, करती है।"

इस शहर में रोज़
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नींद इस शहर को
मयस्सर नहीं, रात होने की
महज़ मजबूरी है

वर्ना पलकें गिराकर भी जगे रहना
लोगों की आदतों में शुमार है यहाँ !

और अलार्म-घड़ियों का बजना तो
सिर्फ़ एक बहाना है,
फिर से लोगों का
शहर की ठंढी दिनचर्या में
वापस लौट आने का

देखता हूँ,
ऊब भरी अलसायी सुबह
नश्तर बनकर गड़ती है जब
देह के पोर-पोर में,
झख़मार कर आदमी को
उठना पड़ता है
इस शहर में रोज़
दिन के सरकस के लिये

और इस सरकस में
उसकी खोली से दफ़्तर के बीच
रोज़ एक दुनिया
बनती है - बिगड़ती है

और हाँ, जैसे-जैसे दिन उठता है
इस दुनिया में
सड़कें अपनी रफ़्तार पकड़ती हैं
और तमाम चीजें सड़कों पर
हरक़त में आने लगती हैं

सड़क के हर
नुक्कड़,
गली
चौराहे पर
कशमकश
गिरती-पड़ती,
दौड़ती-हाँफती
भीड़ की आपाधापी में, सुनो
गौर से...
गहरे सन्नाटे का
जंगल पसरा होता है

जिसके शोर में
घिरनी-सी घूमती हुई
पर एक जगह ठहरी-अँटकी
हजारों-हजार जिंदगियाँ होती हैं
जिनके दीदों में
ढरकते-सूखते
आँसूओं के सैलाब होते हैं

जिनमें बर्फ़ बनती
रिश्तों की तासीर होती है
जो चेहरों से उनके झाँकते हुए
एक और दिन के
बेरंग और
आहत हो जाने का
लुब्बे-लुबाब बताते हैं
जहाँ सपने टूटते हैं, भरोसे
भाँप बनकर उड़ जाते हैं और
दिलों में रह-रहकर हुकें उठती हैं,
फिर भी न जाने क्यों? कैसे तो...
होंठ मुस्कुराहटों की झूठी लाली
फेंकते हैं, पर
तन्य त्रासद आँखें
शह देती हुई उनमें खोब से
साँझ की तरह ढल जाती है
और नींद के वहम में
शामिल होने को
अपनी खोली का
रुख करती है
जहाँ काँखते घोड़ों को
अपनी देह से उतार
समय के खूँटों से आदमी
देर रात गये बांध देता है
रोज़ इस मायानगरी में
जैसे-जैसे रात गहराती है
जिस्म कसकता है, रूहें रोती हैं
आहें भरती हैं अदृश्य लिपियों
की मौन भाषा में कितनी ही साँसें
इस शहर में रोज़ देर रात तक !


***सुशीलकुमार-

आगामी अंक: जुलाई २००९
'देवी' नागरानी की दो ग़ज़लें

Saturday, 20 June 2009

संजीव वर्मा 'सलिल' की रचनाएँ

संक्षिप्त परिचय:
शिक्षा: अर्थशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र में एम. ., एल.एल. बी., नागरिक अभियंत्रण में त्रिवर्षीय डिप्लोमा, बी. . एम. आई. ., विशारद, पत्रकारिता में डिप्लोमा, कम्प्यूटर ऍप्लिकेशन में डिप्लोमा.
सम्प्रति: आप .प्र. सड़क विकास निगम में उप महाप्रबंधक के रूप में कार्यरत हैं.
कृतियाँ: 'कलम के देव'(भक्ति गीत संग्रह), 'लोकतंत्र का मकबरा', 'मीत मेरे', 'भूकंप के साथ जीना सीखें'. आपनें निर्माण के नूपुर, नींव के पत्थर, राम नम सुखदाई, तिनका-तिनका नीड़, सौरभ:, यदा-कदा, द्वार खड़े इतिहास के, काव्य मन्दाकिनी २००८ आदि पुस्तकों के साथ साथ अनेक पत्रिकाओं स्मारिकाओं का भी संपादन किया है। अनेक पत्रिकाओं में विविध विषयों में लगातार लेखन.
सम्मान: आपको देश-विदेश में १२ राज्यों की ५० सस्थाओं ने ७० सम्मानों से सम्मानित किया जिनमें प्रमुख हैं : आचार्य, २०वीन शताब्दी रत्न, सरस्वती रत्न, संपादक रत्न, विज्ञानं रत्न, शारदा सुत, श्रेष्ठ गीतकार, भाषा भूषण, चित्रांश गौरव, साहित्य गौरव, साहित्य वारिधि, साहित्य शिरोमणि, काव्य श्री, मानसरोवर साहित्य सम्मान, पाथेय सम्मान, वृक्ष मित्र सम्मान, आदि। पिंगल साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट अवदान के लिए 'वाग्विदान्वर सम्मान'.























गीतिका-१

तुमने कब चाहा दिल दरके?

हुए दिवाने जब दिल-दर के।

जिन पर हमने किया भरोसा

वे निकले सौदाई जर के..

राज अक्ल का नहीं यहाँ पर

ताज हुए हैं आशिक सर के।

नाम न चाहें काम करें चुप

वे ही जिंदा रहते मर के।

परवाजों को कौन नापता?

मुन्सिफ हैं सौदाई पर के।

चाँद सी सूरत घूँघट बादल

तृप्ति मिले जब आँचल सरके।

'सलिल' दर्द सह लेता हँसकर

सहन न होते अँसुआ ढरके।

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

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गीतिका-२

आदमी ही भला मेरा गर करेंगे।

बदी करने से तारे भी डरेंगे.

बिना मतलब मदद कर दे किसी की

दुआ के फूल तुझ पर तब झरेंगे.

कलम थामे, न जो कहते हकीक़त

समय से पहले ही बेबस मरेंगे।


नरमदा नेह की जो नहाते हैं

बिना तारे किसी के ख़ुद तरेंगे।


न रुकते जो 'सलिल' सम सतत बहते

सुनिश्चित मानिये वे जय वरेंगे।

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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(अभिनव प्रयोग)

दोहा गीतिका

तुमको मालूम ही नहीं शोलों की तासीर।

तुम क्या जानो ख़्वाब की कैसे हो ताबीर?

बहरे मिलकर सुन रहे गूँगों की तकरीर

बिलख रही जम्हूरियत, सिसक रही है पीर।

दहशतगर्दों की हुई है जबसे तक्सीर

वतनपरस्ती हो गयी ख़तरनाक तक़्सीर

फेंक द्रौपदी ख़ुद रही फाड़-फाड़ निज चीर

भीष्म द्रोण कूर कृष्ण संग, घूरें पांडव वीर।

हिम्मत मत हारें- करें, सब मिलकर तदबीर

प्यार-मुहब्बत ही रहे मज़हब की तफ़सीर

सपनों को साकार कर, धरकर मन में धीर।

हर बाधा-संकट बने, पानी की प्राचीर।

हिंद और हिंदी करे दुनिया को तन्वीर।

बेहतर से बेहतर बने इन्सां की तस्वीर।

हाय! सियासत रह गयी, सिर्फ़ स्वार्थ-तज़्वीर।

खिदमत भूली, कर रही बातों की तब्ज़ीर।

तरस रहा मन 'सलिल' दे वक़्त एक तब्शीर।

शब्दों के आगे झुके, जालिम की शमशीर।

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

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आगामी अंक: २९ जून २००९
भारत से सुशील कुमार की कविता:
'इस शहर में रोज़'

Saturday, 13 June 2009

प्राण शर्मा जी के जन्म-दिन पर महावीर और विजय सपत्ति की रचनाएँ

श्री प्राण शर्मा जी के जन्म-दिन की "महावीर" ब्लॉग के लेखकों एवं पाठकों की ओर से हार्दिक शुभकामनाएं
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प्राण जी को समर्पित
बागों में बादे-सबा ऎसी चली
जन्म-दिन पर हर कली खिलने लगी

ख़ुद ब ख़ुद जलने लगी ये बत्तियां
प्राण जी ने जब ग़ज़ल ऐसी कही

केक पर है हर नज़र ललचाई सी
पेट में कुछ हो रही है खलबली

प्राण जी को हर ख़ुशी मिलती रहे
ये दुआ करते हैं हम मिलकर सभी

महावीर शर्मा
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विजय कुमार सपत्ति जी को प्राण शर्मा जी के जन्म-दिवस का पता चला तो आनंद विभोर हो गए कुछ ही क्षणों में अपने उद्गार, सद्भावनाएं एक रचना के शब्दों में ढाल कर आदरणीय प्राण जी के लिए गुरु दक्षिणा के रूप में चरण-स्पर्श सहित प्रेषित है

जन्मदिन

आज कुल जहान की खुशियाँ सिर्फ आपको मिले
आज आपको सारी दुनिया की बहुत सी दुआ मिले
यही प्रार्थना है प्रभु से की आपको लम्बी उम्र मिले
आपके जन्मदिन से हर बरस आपको सुख मिले !!!


जीवन की राहो में आपके ,सदा फूल खिले मिले
बीते बरसो के अनुभव से आपको सिर्फ प्यार मिले
कायनात से भी झुककर आपको बहुत से सलाम मिले
आपके जन्मदिन से हर बरस आपको सुख मिले !!!


साहित्य जगत को सदा आ
पका मार्गदर्शन मिले
हम जैसे बन्दों को सदा आपका आर्शीवाद मिले
आपकी नयी गज़लों का स्वाद हमेशा चखने को मिले
आपके जन्मदिन से हर बरस आपको सुख मिले !!!


हमें नाज़ है आप पर , कि आप हमें इस रूप में मिले
उस प्रभु के शुक्रगुजार है की आपके आर्शीवाद हमें मिले
आपके चरणस्पर्श के साथ मेरी ये
छोटी सी भेंट आपको मिले
आपके जन्मदिन से हर बरस आपको सुख मिले !!!

विजय कुमार सपत्ति

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(विजय जी कहते हैं कि उन्हें बच्चों में हमेशा ही भगवान दिखाई देते हैं)

विजय जी के दोनों प्यारे प्यारे बच्चे: मधुरिमा (हनी) और तुषार (वासु)।

"महावीर" ब्लॉग-टीम की ओर से बिटिया मधुरिमा और बेटे तुषार को ढेर सारा प्यार!

"बिटिया"

हनी , तुझे मैंने पल पल बढ़ते देखा है !
पर तू आज भी मेरी छोटी सी बिटिया है !!

आज तू बारह बरस की है ;
लेकिन वो छोटी सी मेरी लड़की ....
मुझे अब भी याद है !!!

वही जो मेरे कंधो पर बैठकर ,
चाकलेट खरीदने ;
सड़क पार जाती थी !

वही ,जो मेरे बड़ी सी उंगली को ,
अपने छोटे से हाथ में लेकर ;
ठुमकती हुई स्कूल जाती थी !

और वो भी जो रातों को मेरे छाती पर ;
लेटकर मुझे टुकर टुकर देखती थी !

और वो भी ,
जो चुपके से गमलों की मिटटी खाती थी !

और वो भी जो माँ की मार खाकर ,
मेरे पास रोते हुए आती थी ;
शिकायत का पिटारा लेकर !

और तेरी छोटी छोटी पायल ;
छम छम करते हुए तेरे छोटे छोटे पैर !!!

और वो तेरी छोटी छोटी उंगुलियों में शक्कर के दाने !
और क्या क्या ......
तेरा सारा बचपन बस अभी है , अभी नही है !!!

आज तू बारह बरस की है ;
लेकिन वो छोटी सी मेरी लड़की ....
मुझे अब भी याद है !

वो सारी लोरियां ,मुझे याद है ,
जो मैंने तेरे लिए लिखी थी ;
और तुझे गा गा कर सुनाता था , सुलाता था !

और वो अक्सर घर के दरवाजे पर खड़े होकर ,
तेरे स्कूल से आने की राह देखना ;
मुझे अब भी याद आता है !

और वो तुझे देवताओ की तरह सजाना ,
कृष्ण के बाद मैंने सिर्फ़ तुझे सजाया है ;
और हमेशा तुझे बड़ी सुन्दर पाया है !

तुझे मैंने हमेशा चाँद समझा है ….
पूर्णिमा का चाँद !!!

आज तू बारह बरस की है ,
और ,वो छोटी सी मेरी लड़की ;
अब बड़ी हो रही है !

एक दिन विजय छोटी जी कि बड़ी हो जाएँगी ;
बाबुल का घर छोड़कर ,पिया के घर जाएँगी !!!

फिर मैं दरवाजे पर खड़ा हो कर ,
तेरी राह देखूंगा ;
तेरे बिना , मेरी होली कैसी , मेरी दिवाली कैसी !
तेरे बिना ; मेरा दशहरा कैसा ,मेरी ईद कैसी !

तू जब जाए ; तो एक वादा करती जाना ;
हर जनम मेरी बेटी बन कर मेरे घर आना ….

मेरी छोटी सी बिटिया ,
तू कल भी थी ,
आज भी है ,
कल भी रहेंगी ….
लेकिन तेरे बैगर मेरी ईद नही मनेगी ..
क्योंकि मेरे ईद का तू चाँद है !!!

विजय कुमार सपत्ति

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गामी अंक: 20 जून २००९

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

की रचनाएँ