Friday, 6 February 2009

देस परदेस - अख़्तर शीरानी और प्राण शर्मा


देस परदेस

"ओ देस से आने वाले बता "
अख़्तर शीरानी

(भाग १)


देस से आने वाले बता
किस हाल में है याराने-वतन
आवारा-ए-ग़ुर्बत को भी सुना
किस रंग में है कनआने-वतन (कनआनः सुंदरियां)
वो बाग़े-वतन फ़िंदौसे-वतन (फ़िंदौसे-वतनःदेश का स्वर्ग)
वो सर्वे-वतान, रेहाने-वतन (रेहाने-वतनः देश के सरौ)
देस से आने वाले बता।

क्या अब भी वहां के बाग़ों में
मस्ताना हवाएं आती हैं
क्या अब भी वहां के पर्वत पर

"देस परदेस" के अगले अंक में
. अख़्तर शीरानी की नज़्म का भाग
. महावीर शर्मा की ग़ज़लः "जब वतन छोड़ा........


घनघोर घटाएं छाती हैं
क्या अब भी वहां की बरखाएं
वैसे ही दिलों को भाती हैं
देस से आने वाले बता

क्या अब भी वतन में वैसे ही
सरमस्त नज़ारे होते हैं
क्या अब भी सुहानी रातों को
वो चांद सितारे होते हैं
हम खेल जो खेला करते थे
क्या अब भी वो सारे होते हैं
देस से आने वाले बता

क्या अब भी शफ़क के साये में (शफ़कः लाली)
दिन रात के दामन मिलते हैं
ख़ुशरंग शिगूफ़े खिलते हैं (शिगूफ़ेः कली)
बरसाती हवा की लहरों से
भीगे हुए पौदे हिलते हैं
देस से आने वाले बता।

शादाब-ओ-शिगुफ़्ता फूलों से (शादाबः हरा भरा, शिगुफ़्ताः खिला हुआ)
मामूर हैं गुलज़ार अब कि नहीं
बाज़ार में मालिन आती है
फूलों के गुंदे हार अब कि नहीं
शौक़ से टूटे पड़ते हैं
नौउम्र खरीदार अब कि नहीं
देस से आने वाले बता...........क्रमशः
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰

वतन को छोड़ आया हूं
प्राण शर्मा


हरी धरती, खुले-नीले गगन को छोड़ आया हूं
कि कुछ सिक्कों की खातिर मैं वतन को छोड़ आया हूं


विदेशी भूमि पर माना लिए फिरता हूं तन लेकिन
वतन की सोंधी मिट्टी में मैं मन को छोड़ आया हूं


पराए घर में कब मिलता है अपने घर सरीखा सुख
मगर मैं हूं कि घर के चैन-धन को छोड़ आया हूं


नहीं भूलेगी जीवन भर वे सब अठखेलियां अपनी
जवानी के सुरीले बांकपन को छोड़ आया हूं


समायी है मेरे मन में अभी तक खुशबुएं उसकी
भले ही फूलों से महके चमन को छोड़ आया हूं


कभी गुस्सा, कभी अनबन, कभी खिलवाड़ यारों से
मधुर संबंधो के मैं उस चलन को छोड़ आया हूं


कोई हमदर्द था अपना कोई था चाहने वाला
हृदय के पास रहते हमवतन को छोड़ आया हूं


कि इससे मीठी सुंदर कहां होगी कोई भाषा
मगर मैं 'प्राण' हिंदी की फबन को छोड़ आया हूं
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰


24 comments:

विनय said...

बहुत सुन्दर पेशकश है!

---

शर्मा जी एक समस्या है जब आपके ब्लॉग पर आता हूँ तो टिप्पणी करने वाला लिंक टेम्प्लेट के साथ समरंगी होने के कारण नहीं दिखता, अन्दाज़ा लगा के काम चलाना होता है, उदाहरण आप स्वयं देख लें: देस परदेस - अख़्तर शीरानी और प्राण शर्मा, आप Comment Form विधि चालू कर लें! सहायता के लिए: तकनीक दृष्टा

Vijay Kumar Sappatti said...

aadarniya mahaveer ji
namaskar...

हरी धरती, खुले-नीले गगन को छोड़ आया हूं
कि कुछ सिक्कों की खातिर मैं वतन को छोड़ आया हूं................
itni acchi aur aankho ko nam karti hui opening lines ke baad ,dono rachnao ne poori tarah se bhavuk kar diya ....
kya kahun.. man chup chaap hai... kuch din pahle likha tha ,mujhko mera shaher rula gaya .. wahi nazaara ab hai in dono behad umda rachnao ko padhkar....
aadarniya akhtar sheerani ji ne man ko rula diya .. o desh se aane wale bata.. pardesh men rahne waale hamaare hindustaani bhaibahno ke man par kya gujarti hongi.................
aadarniya pran sharma ji ne is baar nishabd kar diya hai

पराए घर में कब मिलता है अपने घर सरीखा सुख
मगर मैं हूं कि घर के चैन-धन को छोड़ आया हूं

main kya kahun..
dono lekhako ko lekhani ko salaam karta hoon.. main ab comment bhi doon to kya doon.. man bhavuk ho gaya hai ...

vijay
www.poemsofvijay.blogspot.com
meri nai nazm padhe..

Science Bloggers Association of India said...

वतन की माटी की महक का मोल वही बता सकता है, जो वतन से दूर रहता है।

इन गीतों के लिए आभार।

दिगम्बर नासवा said...

bahoot शुक्रिया ............इतने khoob सूरत.......गीत और गाल से milwaane का.

कोई हमदर्द था अपना कोई था चाहने वाला
हृदय के पास रहते हमवतन को छोड़ आया हूं

वैसे समझ नही आ रहा किसको अच्छा कहूँ सब के सब sher दिल के bahoot kareeb लग रहे हैं. वतन की mahak to इन sher से भी आ रही है

राज भाटिय़ा said...

समायी है मेरे मन में अभी तक खुशबुएं उसकी
भले ही फूलों से महके चमन को छोड़ आया हूं

महावीर जी ,मुझे तो लगता है यह आवाज हम सब की है,
बहुत सुंदर शव्दो से प्राण साहब जी ने सजाई है अपनी यह कविता.
ओर अख़्तर शीरानी जी की कविता भी बहुत खुब आप दोनो का धन्यवाद.
महा वीर जी आप का भी धन्यवाद इस सुंदर कविताओ को हम तक पहुचाने के लिये

गौतम राजरिशी said...

वाह ये अनूठा अंदाज प्राण साब का...बहुत उम्दा

और अख्तर शीरानी जी के शब्द "क्या अब भी वतन में वैसे ही / सरमस्त नज़ारे होते हैं / क्या अब भी सुहानी रातों को / वो चांद सितारे होते हैं
हम खेल जो खेला करते थे / क्या अब भी वो सारे होते हैं / ओ देस से आने वाले बता "

परदेस में रहने वालों का दर्द ... इतने सुंदर शब्दों में उकेरा गया है कि कुछ कहते नहीं बन रहा..

शुक्रिया महावीर जी !!

PRAN SHARMA said...

Urdu zabaan ke behtreen shayar
Akhtar sheerani ki nazm"Dess se
aane waale bataa" kaa pahlaa bhaag
padh kar apna desh bharat yaad aa
gayaa hai.hum sabhee desh se aane
waale se yahee to poochhte hain--
"Ae desh se aane waale bataa----
Apne Des kee mittee se kitna
lagaav hotaa hai!
Akhtar sheerani kee kavita ke doosre bhaag kee pratiksha rahegee.

सुशील कुमार said...

इन दोनों कविताओं/गजल में देश के मिट्टी की गमक़ है,शब्दों में उतनी ही खनक है और मन को बाँध कर स्मृति के झकोंड़े पैदा कर देने का जादुई आकर्षण ! बहुत सुन्दर और भावुक कवितायें। अखतर शीरानी और प्राण शर्मा जी को देश की याद करा देने वाली इस प्रस्तुति पर धन्यवाद।

Nirmla Kapila said...

kisi ek shear ki baat karoongi to sari rachna ke saath nainsaafi hogi dono rachnaayen hi lajvaab hai bahut bahut bdhaai aur itni sunder rachna ko padhvane ke liye dhanyvaad

the pink orchid said...

aapne to bahut si yaadeing taaza kar di...


mere paas uchit shabd nahin hain aapka dhanyawaad karne ke liye.. par fir bhi kahungi ki blog ka anusaran karne ke liye aapki aabhaari hoon
************
http://merastitva.blogspot.com

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' said...

आदरणीय अग्रज

आपका अनुग्रह कि मुझे इस भावपूर्ण पृष्ठ का अवलोकन करने का अवसर मिल सका. मेरे लिए अब तक अनजान यह कोना प्रत्येक रचना के रूप में अपनी माटी अपने देश की सोंधी महक और भावना से सुगन्धित कलियों की भीने महक से परिपूर्ण है. आभारी हूँ आपका स्नेहिल दिव्यलोक का दर्शन करवाने के लिए. अब से नियमित रूप से आप सब मित्रों की रचनाओं का आनंद ले सकूँ यही अभिलाषा है.

श्रद्धा जैन said...

कभी गुस्सा, कभी अनबन, कभी खिलवाड़ यारों से
मधुर संबंधो के मैं उस चलन को छोड़ आया हूं

bus yahi hai hamari sabki dukhti rag
desh se dhoor bus desh ki yaad satati hai
aapke har ek sher main jaise sabka dard tha

hemjyotsana said...

aaderniye Mahavir Sir ,
aapke blog par hamesha hi behtreen padne ko milta rahaa hai aur aaj bhi dono rachnaye bahut khoob hai,
janha pehli post mein Udru ke kai achche shabd mile to dusri bilkul saral bhasha se dil mein utar gai

विदेशी भूमि पर माना लिए फिरता हूं तन लेकिन
वतन की सोंधी मिट्टी में मैं मन को छोड़ आया हूं


पराए घर में कब मिलता है अपने घर सरीखा सुख
मगर मैं हूं कि घर के चैन-धन को छोड़ आया हूं

daad kabul kariye Pran Sir

saadar
hem jyotsana

shyam kori 'uday' said...

समायी है मेरे मन में अभी तक खुशबुएं उसकी
भले ही फूलों से महके चमन को छोड़ आया हूं
... अत्यंत प्रभावशाली व प्रसंशनीय अभिव्यक्ति हौ।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

Watan se doori, apno se doori, wo aansoo ke sailaab, wo dil mei tadap
wo matee ki khushboo, wo apno ki baatein,
wo humwatano se baatein, humwatno ki
baatein,
sabhee chod ker ab jo baithe hain hum
khalee hai haath aur bharee
hai man !

Bus aisee hee man ki halat ho gayee hai ...Akhtar sahab aur Pran bhai ki Gazalon ka asar ,bahut der tak chaya rahega.

Bahut umda ....padh ker man khush bhee hai aur udas bhee ...

Angrezee mei tippani ki maafi chahtee hoon ..
I am away from my PC right now...
Hope you will forgive ..
Mahavir jee,
Bahut shukriya aapka bhee ..

Sadar, Sa -sneh,
- Lavanya

राजीव रंजन प्रसाद said...

आदरणीय प्राण सर..
आपकी ग़ज़लों का मैं पहले ही कायल हूँ लेकिन इस ग़ज़ल की पंक्तियों नें आँख नम कर दी। पंक्तियों नें निहित दर्द झलकता है।
आभार।

***राजीव रंजन प्रसाद

योगेन्द्र मौदगिल said...

दोनो ही रचनायें बेहद खूबसूरत...... शीरानी साहब और प्राण जी को प्रणाम... महावीर जी को इस शानदार प्रस्तुति के लिये साधुवाद..

अमिताभ श्रीवास्तव said...

आपकी रचना लाजवाब है.
इतनी दूर अपने वतन से..निश्चित ही
मन व्यथित रहता होगा.
मुझे लगता है आपने किसी को नहीं छोडा है.
अपनी सोच ओर रचना के माध्यम से
गहरे तक हिन्दुस्तान को
अपने अंतरतम तक बसा रखा है. ओर मेरा मानना
ये है की आज यदि किसी ने हिन्दुस्तान को पहचाना है तो वो दूर बेठे रहने वालो ने ही.

अमिताभ श्रीवास्तव said...

आपकी रचना लाजवाब है.
इतनी दूर अपने वतन से..निश्चित ही
मन व्यथित रहता होगा.
मुझे लगता है आपने किसी को नहीं छोडा है.
अपनी सोच ओर रचना के माध्यम से
गहरे तक हिन्दुस्तान को
अपने अंतरतम तक बसा रखा है. ओर मेरा मानना
ये है की आज यदि किसी ने हिन्दुस्तान को पहचाना है तो वो दूर बेठे रहने वालो ने ही.

Manoshi said...

शुक्रिया महावीर जी, आपके इस प्रस्तुतिकरण के लिये। प्राण शर्मा जी की ग़ज़ल बहुत अच्छी लगी। ये शेर तो बहुत ही अच्छा लगा-

कभी गुस्सा, कभी अनबन, कभी खिलवाड़ यारों से
मधुर संबंधो के मैं उस चलन को छोड़ आया हूं

बधाई।

seema gupta said...

पराए घर में कब मिलता है अपने घर सरीखा सुख
मगर मैं हूं कि घर के चैन-धन को छोड़ आया हूं
" " dono geet ek se ek.... vatan ki mitti ki yaad or pyaar se bhri ye panktiyan behd bhavuk lgi or dil ko chu gyi....shandaad prstuti....."

Regards

कंचन सिंह चौहान said...

बहुत ही भावपूर्ण रचनाएं.....!

महावीर said...

अख़्तर शीरानी की एक लंबी नज़्म है, इसी लिए इसे तीन भागों में दी जा रही है। वतन से दूर प्रवासी के दिल में एक छटपटाहट सी महसूस होती है, वह इस नज़्म में बड़ी खूबसूरती से बयान की है।
प्राण शर्मा जी की इस ख़ूबसूरत ग़ज़ल को जब मैंने १९९६ में कादम्बिनी में पढ़ी थी, जब से ही अपनी फ़ाइल में सहेजे रखी हुई है। अपने ब्लॉग पर पोस्ट करने से मुझे गर्व होता है। कुछ रचनाएं कालजयी होती हैं। शर्मा जी की यह ग़ज़ल कालजयी ही मानी जायेगी। १९९६ से अब तक कितनी ही बार पढ़ चुका हूं लेकिन इसका आनंद अभी भी वैसा ही है, भाव हृदय को वैसे ही उद्वेलित करते हैं। बधाई हो।

NirjharNeer said...

marmsparshi bhaav
yakinan daad ke kabil
jitne sundar or dilkash bhaav utni hi khoobsurat bayangii
sabdoN ka be-jod sangam
baNdhai
aapko padhna khushi ki baat hai