'महावीर' और 'मंथन' की टीम की ओर से दीपावली के शुभ अवसर पर
आपको और आपके परिवार को हार्दिक शुभकामनाएं



आज दीपावली का उत्सव स्व. महाकवि पंडित नरेंद्र शर्मा की इन पंक्तियों से आरम्भ करते हैं:
‘शुभकामना’
" सुख सुहाग की दीव्य ज्योति से , घर आँगन मुस्काये
ज्योति चरण घर कर दीवाली , घर आँगन नित आये "
......
लावण्या जी के सौजन्य से उनके पिताश्री स्व. पंडित नरेंद्र शर्मा के अप्रकाशित संकलन "बिंदु" से कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं:
दीपक ( अप्रकाशित )
" दीपक दीपक , जले अँधेरा
काजल बन कर पले अँधेरा
निगले उगले , जिसको दीपक
है दीपक के तले अँधेरा "
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उषा राजे सक्सेना, यू.के.
दिए सा वो माना जलता रहा है
मगर आँधियों में संभलता रहा है
जला साथ सबके वो जीवन में वर्ना
अकेला ही सब ओर चलता रहा है
कभी तो बदल जायेगी इसकी किस्मत
इसी आस में दीप जलता रहा है
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डॉ. सुधा ओम ढींगरा, यू.एस.ए.
मैं दीप बाँटती हूँ.....
इनमें तेल है मुहब्बत का
बाती है प्यार की
और लौ है प्रेम की
रौशन करती है जो
हर अंधियारे
हृदय औ' मस्तिष्क को.
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लावण्या शाह, यू.एस. ए
जय किसान
" सबके आँगन आयी दिवाली, मेरे आँगन बैल किसान
घर-द्वार गली, झिलमिल, जले मेरा नन्हा दिया महान
धूम धडाका बाजे पटाखा , रून झुन है, बैलों का हार ,
नभ सर्वस्व तारा गण मंडित , वही रवि बिखेरे चहूँ ओर प्रकाश ............"
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देवी नागरानी, यू.एस.ए
बड़ी खुशनुमा याद की ताज़गी है
वो मुरझाए फूलों को फिर से खिलाए
दिवाली का त्यौहार सब को मुबारक
ये त्यौहार ख़ुशियों का हर साल आए
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डॉ. गुलाम मुर्तजा शरीफ, पाकिस्तान
लो आ गयी दीपावली , मुबारक हो ,
दीप से दीप जले , रोशनी मुबारक हो !
मेरी दुआ है , भाई-चारा सलामत रहे ,
नई सुबह , नई किरण, मुबारक हो !
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जश्न-ए-दिवाली
डा.अहमद अली बर्क़ी आज़मी, भारत
अपने घरों मे दिए जलाऐँ
जश्न-ए-दिवाली मिल के मनाऐँ
बच्चे बूढे नर और नारी
अपना है जो फ़र्ज़ निभाऐँ
हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई
सब को बर्क़ी गले लगाऐँ
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सोहन 'राही', यू.के.
आँगन आँगन रूप धूप की उषा जैसी लाली है
दीपक दीपक जोत जले और जोत बड़ी मतवाली है
घर घर की चौखट पे रौशन दीपों की वो पाली है
भारत की सुन्दर धरती पर उतरी रात निराली है
पूनम की रातों पर भारी अपनी एक दिवाली है.
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आचार्य संजीव 'सलिल', भारत
तन माटी का दीप है, जलती बाती श्वास.
आत्मा उर्मिल वर्तिका, घृत अंतर की आस..
मन-मन्दिर में हो 'सलिल', निश-दिन धवल उजास.
पर सेवा की प्रसारित, जो तू करे सुवास.
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पंकज सुबीर, सीहोर, भारत
दीप के हौसलों की कहानी है ये
रात भर की भले जिंदगानी है ये
हर तरफ दीप हैं हर तरफ रोशनी
रात दीपावली की सुहानी है ये
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पंकज सुबीर, सीहोर, भारत
बधाई गाइये रघुवर अयोध्या लौट कर आये
सुमन अंबर से अगवानी में हैं देवों ने बरसाये
सजीं देहरी पे रांगोली, बंधे तोरण हैं द्वारे पर
अमावस हो गई पूनम हजारों दीप मुस्काये
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राकेश खंडेलवाल, यू.एस.ए.
खील अक्षत लिये,,रंग गेरू घुले,अल्पनायें निरन्तर बनाते रहें
दीप मिल कर गले दीप से दीप्त हौं और बिखरे तिमिर को हटाते रहें
ॠद्धि के सिद्धि के साथ में लक्ष्मियाँ, पंथ भरती रहें स्वर्ण आभाओं से
कामना है यही आपके शीश पर सारे नक्षत्र आ जगमगाते रहें.
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समीर लाल ’समीर’, कनाडा
प्रीत का दीपक जलाना
दूर नफरत को भगाना
सच्चाई का हाथ थामकर
जीवन पथ पर चलते जाना...
अबकी आती दिवाली का
ऐसे ही तुम जश्न मनाना..
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नीरज गोस्वामी, भारत
"जला मन में बसा रावण, मनानी गर दिवाली है
दिलों से दूर कर अनबन, मनानी गर दिवाली है
धरा पर रौशनी करना दिवाली है कहा किसने ?
करो तुम सोच को रोशन, मनानी गर दिवाली है"
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मेजर गौतम राजरिशी, भारत
आ के रंजिश भूल जायें, दोस्ती की बात हो
जगमगाते दीप की औ’ रौशनी की बात हो
धूप के तेवर तो बढ़ते जा रहे हैं दिन-ब-दिन
कुछ रहम धरती पे हो, अब कुछ नमी की बात हो
द्वेष से, टकराव से होता है क्या हासिल कहो
प्यार की बातें करो, दीवानगी की बात हो
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प्राण शर्मा, यू.के.
पथ की विपदाएं उससे क्या टकरायेंगीं
जिसकी गोदी में विपदाएं ख़ुद पलती हैं
उस घर में अंधियारा कैसे रह सकता है
जिस घर में दीपावलियाँ हर पल जलती हैं
केवल इक दीपक काफ़ी है अंधियारे में
तू क्यों ना अपने मन का दीप जलाता चल
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प्राण शर्मा, यू.के.
रौशनी हर तरफ ही लुटाते रहें
लौ से अपनी सभी को लुभाते रहें
हर किसी की तमन्ना है अब दोस्तो
दीप जलते रहें झिलमिलाते रहें.
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महावीर शर्मा, यू.के
कविता
दीवाली के शुभ अवसर पर दीप से दीप जलाते रहना
मन के गहरे अंधियारे में प्रेम का दीप जलाते रहना
नफ़रत का नारा दफ़ना कर ईद हो या हो फिर दीवाली
हिंदू, मुस्लिम, सिख ईसाई प्रेम की ज्योत जलाते रहना
शान्ति-दूत के स्वप्नों की अभिलाषा पूरी करनी है
अस्तित्व न हो कोई दुःख का समता दीप जलाते रहना
शिशु हैं भावी की आशा बीच राह में भटक न जाएँ
दीपक का सन्देश सुना कर अंतर्ज्योति जलाते रहना
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अभिषेक
डॉ. महेंद्र भटनागर
माना अमावस की अँधेरी रात है,
पर, भीत होने की अरे क्या बात है ?
एक पल में लो अभी
जगमग नये आलोक के दीपक जलाता हूँ !
.
माना, अशोभन, प्रिय धरा का वेष है,
मन में पराजय की व्यथा ही शेष है,
पर,निमिष में लो अभी
अभिनव कला से फिर नयी दुलहिन सजाता हूँ !
.
कह दो अँधेरे से प्रभा का राज है,
हर दीप के सिर पर सुशोभित ताज है,
कुछ क्षणों में लो अभी
अभिषेक आयोजन दिशाओं में रचाता हूँ !
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'महावीर'
अगला अंक: २४ अक्टूबर 2009
यू.के. से उषा राजे सक्सेना की दो ग़ज़लें
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'मंथन
पर पंकज सुबीर की कहानी
'जब दीप जले आना'
अवश्य पढ़िये.
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