Friday, 11 December 2009

सुबीर जी को शादी की सालगिरह की शुभकामनाएं और मेजर गौतम राजरिशी की दो ग़ज़लें

शादी की सालगिरह पर पंकज सुबीर जी और रेखा जी को
हमारी
और 'महावीर' तथा 'मंथन' ब्लॉग के सहयोगियों की ओर से हार्दिक शुभकामनाएं
कल (१० दिसंबर) सालगिरह के सुखद क्षणों के कुछ चित्र देखिये:

परिचय :
नाम - गौतम राजरिशी
जन्म - 10 मार्च 1976
जन्म-स्थल - सहरसा, बिहार
वृति - सैन्य अधिकारी
साहित्य-परिचय - उभरते ग़ज़लकार के रूप में पहचान। कई ग़ज़लें हंस, वागर्थ, कादंबिनी, लफ़्ज़, वर्तमान साहित्य, शेष, प्रयास, काव्या,नई ग़ज़ल,ग़ज़ल के बहाने आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित। जल्द ही एक कहानी भी मासीक पत्रिका पाखी में प्रकाशित होने जा रही हैं। कुछ वर्षों से ग़ज़ल के शिल्प और संरचना के गुरु, साहित्यकार श्री पंकज सुबीर से बारीकियां सीख रहें हैं.

ग़ज़ल

गौतम राजरिशी


एक मुद्‍दत से हुये हैं वो हमारे यूं तो

चाँद के साथ ही रहते हैं सितारे, यूं तो


तू नहीं तो न शिकायत कोई, सच कहता हूं

बिन तेरे वक्त ये गुजरे न गुजारे यूं तो


राह में संग चलूँ ये न गवारा उसको

दूर रहकर वो करे खूब इशारे यूं तो


नाम तेरा कभी आने न दिया होठों पर

हाँ, तेरे जिक्र से कुछ शेर सँवारे यूं तो


तुम हमें चाहो न चाहो, ये तुम्हारी मर्जी

हमने साँसों को किया नाम तुम्हारे यूं तो


ये अलग बात है तू हो नहीं पाया मेरा

हूँ युगों से तुझे आँखों में उतारे यूं तो


साथ लहरों के गया छोड़ के तू साहिल को

अब भी जपते हैं तेरा नाम किनारे यूं तो

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ग़ज़ल

गौतम राजरिशी


राह में चाँद उस रोज चलता मिला

दिल का मौसम चमकता, दमकता मिला


देखना छुप के जो देख इक दिन लिया

फिर वो जब भी मिला तो झिझकता मिला


जाने कैसी तपिश है तेरे जिस्म में

जो भी नजदीक आया पिघलता मिला


रूठ कर तुम गये छोड़ जब से मुझे

शह्‍र का कोना-कोना सिसकता मिला


किस अदा से ये कातिल ने खंजर लिया

कत्ल होने को दिल खुद मचलता मिला


चोट मुझको लगी थी मगर जाने क्यों

रात भर करवटें वो बदलता मिला


टूटती बारिशें उस पे यादें तेरी

छू के देखा तो हर दर्द रिसता मिला

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Friday, 4 December 2009

पंकज सुबीर की कविता - 'आदमी'


'आदमी' शीर्षक के अंतर्गत सुबीर जी की चार अनमोल रचनाओं में से
यह पहली रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ. अन्य तीन रचनाएं शीघ्र ही
इसी ब्लॉग पर पढ़कर आप आनन्दविभोर हो जायेंगे.
लीजिये यह है:

आदमी -
बहुत से नाम हैं उनके
फलाने, ढिकाने, अमके, ढिमके,
सचमुच बहुत नाम हैं उनके,
एक फलाने का उद्बोधन
धो डालता है सारी पहचान को,
व्यक्तिगत पहचान को,
और कर देता हैं शामिल भीड़ में, फलानों की
बहुत पीड़ादायी होता है
अपनी सारी पहचान को खोकर
फलाना आदमी हो जाना
यँ ही नहीं कह देते हम किसी को,
फलाना आदमी,
वास्तव में वो एक साज़िश होती है हमारी,
किसी अच्छे खासे जीवन को
सिरे से ख़ारिज कर देने की,
यह जतलाने की,
कि आख़िरकार हो क्या तुम ...?
कुछ भी तो नहीं हो ...
तो तुम महात्मा गांधी हो
और वीरप्पन,
फिर क्यों उठाई जाए जहमत...?
तुम्हारा नाम याद रखने की,
जबकी भरी पड़ी है ये दुनिया,
रामलाल, श्याम लाल और गिरधारी लालों से,
लेकिन दुर्भाग्य या दुर्योग से
चूंकि तुम भी एक आदमी हो,
इसलिए अब तुम फलाने हो
एक भीड़, जिस का नाम फलाना है
जो कुछ भी नहीं है,
गांधी है वीरप्पन,
और ये फलानापन भी तुम्हारा नहीं है
यह तो हमारी सुविधा के लिए है,
ताकि जब तुम मरो , तो हम कह सकें
कि वो गंजा गंजा सा फलाना आदमी,
जो अब तक खुद को जिंदा समझता था
कल रात सचमुच में मर गया
वही लिजलिजा, सड़ांध मारता,
घिसट घिसट कर चलता,
लार, आंसू और पीब से बना
गंजा गंजा सा फलाना आदमी

पंकज सुबीर



अगला अंक:११ दिसम्बर २००९

मेजर राजरिशी गौतम

की दो ग़ज़ले

Saturday, 28 November 2009

भारत से देवमणि पांडेय की दो ग़ज़लें


देवमणि पांडेय


ग़ज़ल
दर्द का इक फ़साना थी कल ज़िंदगी
तेरी निस्बत से है अब ग़ज़ल ज़िंदगी

एक मुद्दत से रूठी हुई है मगर
तुम जो मिलते तो जाती बहल ज़िंदगी

आजतक ज़िंदगी से जो महरूम हैं
काश उनको मिले एक पल ज़िंदगी

फूल से खेलती तितलियाँ देखकर
एक बच्चे सी जाए मचल ज़िंदगी

दुःख में हँसते रहो,ग़म भुलाकर जिओ
मुसकराहट के लाई है पल ज़िंदगी

प्यार से इसका दामन सजाते रहो
आज है हो न हो साथ कल ज़िंदगी

देवमणि पांडेय

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ग़ज़ल
डूब चुके हैं बार-बार हम इन आंखों के पानी में
नाम तलक न आया मेरा फिर भी किसी कहानी में

जीवन अपना बीत रहा है कुछ यूँ दुख के साए में
जैसे फूल खिला हो कोई कांटों की निगरानी में

छीन लिया दुनिया ने सब कुछ फिर भी मैं आबाद रहा
जब जब मुझको हंसते देखा लोग पड़े हैरानी में

जिसको देखो ढूँढ रहा है काश ज़िंदगी मिल जाए
जाने कैसी कशिश छुपी है इस पगली दीवानी में

दुनिया जिसको सुबह समझती तुम कहते हो शाम उसे
कुछ सच की गुंजाइश रक्खो अपनी साफ़ बयानी में


ख़ुदग़र्ज़ी और चालाकी में डूब गई है ये दुनिया
वरना सारा ज्ञान छुपा है बच्चों की नादानी में

देवमणि पांडेय

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अगला अंक: ४ दिसम्बर २००९
पंकज सुबीर की कविता
"आदमी"

Thursday, 26 November 2009

यू.के. से पुष्पा भार्गव की कविता - 'दर्द'

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२६ नवम्बर २००८ के दिन भारत के व्यवसायिक महानगर मुम्बई में बड़े पैमाने पर चरमपंथियों के हमले के कारण खून ही खून फैला हुआ था! इस घृणास्पद त्रास्पद घटना को सुनते ही मानवता कर्राह उठी थी. भारतवासियों और प्रवासियों के दिलों में एक ऐसा दर्द उठा था जो आज ठीक एक वर्ष के बाद भी कम न हुआ। भारत से हज़ारों मील दूर यू.के. से पुष्पा भार्गव वही 'दर्द' इस रचना में मार्मिक शब्दों में व्यक्त कर रहीं हैं।

दर्द

पुष्पा भार्गव


मैं खेल रहा था खेल

और मस्त था खाने पीने में

तभी अचानक दर्द उठा मेरे सीने में

मैं तड़प उठा

उस दर्द से जीने में।


वह दर्द नहीं था दिल के दौरे का

वह दर्द नहीं था नासूर या किसी फोड़े का

वह दर्द नहीं था भूके पेट फिरने का

वह दर्द नहीं था शेयर्स के गिरने का

वह दर्द नहीं था शरीर के दुखने का

वह दर्द नहीं था काँटों के चुभने का

वह दर्द नहीं था खेल में हारे जाने का

वह दर्द नहीं था भाग्य से मार खाने का


वह दर्द था आतंकवादियों के काले कारनामों का

वह दर्द था आतंक में दिल धड़कने का

वह दर्द था गोली लगे पंछियों के फड़कने का

वह दर्द था नन्हीं सी जान के माँ बाप मारे जाने का

वह दर्द था बेमौत मारे जाने की खबर प्रियजनों को सुनाने का

वह दर्द था निहत्थे, निर्दोषों की कराहों का

वह दर्द था मरते दम में ज़िंदगी की चाहों का

वह दर्द था अत्याचारों की बिजली चमकने का

वह दर्द था मासूमों के तड़पने का

वह दर्द था बम के धमाकों का

वह दर्द था जलने वाले लाखों का

वह दर्द था संगीन गोलियां चलने का

वह दर्द था भारत की शान, ताज के जलने का

वह दर्द था जो उठा हज़ारों के सीने में

जिससे हज़ारों तड़प उठे उस दर्द से जीने में

पुष्पा भार्गव

Friday, 20 November 2009

भारत से प्रकाश सिंह 'अर्श' की नज़्म और ग़ज़ल

प्रकाश सिंह 'अर्श' कुछ वर्षों से ग़ज़ल के शिल्प और संरचना के गुरु, साहित्यकार श्री पंक सुबीर से बारीकियां सीखने में रत हैं. इसके अतिरिक्त, अर्श जी को समय समय पर वरिष्ठ ग़ज़लकार, समीक्षक और कहानीकार श्री प्राण शर्मा जी का आशीर्वाद भी मिलता रहा है. आजकल ब्लॉग की दुनिया में उनकी ग़ज़लें और दूसरी रचनाएं काव्य-प्रेमियों को आकर्षित कर रही हैं. 'अर्श' मूलत: बिहार से हैं, प्रारम्भिक पढ़ाई झारकंड में हुई, मुज़फ्फरपुर में विज्ञान की शिक्षा और दिल्ली से एम.बी.ए. करने के बाद अब एक प्रतिष्ठित कंपनी में सीनियर मेनेजर के पद पर कार्यरत हैं.
हमारी यही कामना है कि 'अर्श' ग़ज़ल की दुनियां में अपना विशिष्ट स्थान बना कर नाम रोशन करें.


नज़्म
सूखी धरती सूनापन खलिहानों में
आँगन अब तब्दील हुए शमशानों में
बूढ़ा पीपल रो रो कर यह कहता है
नीम अभागा बचपन से दुःख सहता है
सावन अबके हार गया है बूंदों से
कतरा क्या होता है पूछो रिन्दों से
आँख बरसती है सब देख इंसानों में
सुखी धरती सूनापन खलिहानों में ...
बाबा अबकी सोच रहे थे लाडो की
डोली उसकी उठवायेंगे वादो की
छुटकी तो बस नाचेगी जी भर के रे
संग सहेली छेड़ें आते जाते रे
क्या सन्देश नहीं पहुंचा भगवानों में
सुखी धरती सूनापन खलिहानों में

प्रकाश सिंह 'अर्श'
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ग़ज़ल
इश्क मोहब्बत आवारापन।
संग हुए जब छूटा बचपन
मैं माँ से जब दूर हुआ तो ,
रोया घर, आँचल और आँगन
शीशे के किरचे बिखरे हैं ,
उसने देखा होगा दर्पण
परदे के पीछे बज-बज कर ,
आमंत्रित करते हैं कंगन
चन्दा ,सूरज ,पर्वत, झरना ,
पावन पावन पावन पावन
बिकता हुस्न है बाज़ारों में ,
प्यार मिले है दामन दामन
कौन कहे बिगड़े संगत से ,
देता सर्प को खुश्बू चंदन
दुनिया उसको रब कहती है ,
मैं कहता हूँ उसको साजन॥

प्रकाश सिंह 'अर्श'
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'महावीर' का आगामी अंक:
2६ नवम्बर २००९:

यू.के. से पुष्पा भार्गव की रचना

Sunday, 15 November 2009

दो ग़ज़ल - दो रंग: प्राण शर्मा

ग़ज़ल:
हर तरह के फूल का बूटा लगाया जाता है
घर के आँगन को सदा सुन्दर बनाया जाता है

आसमां तक कब भला उसको उठाया जाता है
मिट्टी का घर भी कहीं ऊंचा बनाया जाता है

धीरे- धीरे मुँह बना कर देखना सबको तेरा
इतना तो बतला कि ये किसको चिढ़ाया जाता है

प्यार के धागे में अब तो बाँध ले मुझको सनम
एक बच्चे सा मुझे क्यों बरगलाया जाता है

कैसी उलझन, कैसे अड़चन, कैसी है ये चुपचुपी
हाल दिल का अपने को कुछ तो सुनाया जाता है
प्राण शर्मा
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एक धुँधला सुबह का तारा लगा तो क्या हुआ
गर मुसाफिर कुछ थका-हारा लगा तो क्या हुआ

चाँद-तारों की तरह न्यारा लगा तो क्या हुआ
हर बशर मुझको बड़ा प्यारा लगा तो क्या हुआ

मेरे साथी, चलो कुछ प्यास तो अपनी बुझी
पानी सागर का अगर खारा लगा तो क्या हुआ

काश, उसके दिल के अन्दर झांक कर तुम देखते
देखने में कोई हत्यारा लगा तो क्या हुआ

"प्राण" मैं चलता रहा इसको उठा कर हर तरफ
जिंदगी का बोझ कुछ भारा लगा तो क्या हुआ
प्राण शर्मा
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अगला अंक २० नवम्बर २००९


प्रकाश सिंह "अर्श" के


दो रंग - ग़ज़ल और नज़्म



Sunday, 8 November 2009

महावीर शर्मा की दो ग़ज़लें

ग़ज़ल
अदा देखो, नक़ाबे-हुस्न वो कैसे उठाते हैं,
अभी तो पी नहीं हम ने, क़दम क्यों डगमगाते हैं?

ये अब अंदाज़ तो देखो त'आल्लुक तोड़ कर भी वो
हमारे दिल का ख़ूँ करके, वो मेहंदी भी रचाते हैं


हमें मञ्ज़ूर है गर, ग़ैर से भी प्यार हो जाए,
कमज़कम सीख जाएंगे कि दिल कैसे लगाते हैं।

सुना है आज वो हम से ख़फ़ा हैं, बेरुख़ी भी है,
नज़र से फिर नज़र हर बार क्यों हम से मिलाते हैं?

हमारी क्या ख़ता है, आज जो ऐसी सज़ा दी है,
ज़रा सा होश आता है मगर फिर भी पिलाते हैं

निगाहे-नाज़ से अब आग कुछ ऎसी लगा दी है
बुझे ना ज़िन्दगी भर, रात दिन दिल को जलाते हैं


वफ़ा के इम्तिहां में जान ली, ये भी नहीं देखा
वो मेरी लाश के पहलू में खंजर भूल जाते हैं।


महावीर शर्मा
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याद जब आई कभी, आंसू निकल कर बह गये
क्या कहें इस दिल की हालत, शिद्दते-ग़म सह गए

गुफ़्तगू में फूल झड़ते थे किसी के होंट से
याद उनकी ख़ार बन, दिल में चुभो के रह गए

जब मिले मुझ से कभी, इक अजनबी की ही तरह
पर निगाहों से मिरे दिल की कहानी कह गये।


प्यार के थे कुछ लम्हे, यादों के नग़मे बन गए
वो ही नग़मे साज़े-ग़म पर गुनगुना कर रह गए

दो क़दम ही दूर थे, मंज़िल को जाने क्या हुआ
फ़ासले बढ़ते गये, नक्शे-क़दम ही रह गए


दिल के आईने में उसका, सिर्फ़ उसका अक्स था
शीशा--दिल तोड़ डाला, ये सितम भी सह गए

ख़्वाब में दीदार हो जाता तेरी तस्वीर का
नींद भी आती नहीं, ख़्वाबी-महल भी ढह गये।
महावीर शर्मा

अगला अंक: १५ नवम्बर २००९
यू.के. से वरिष्ठ ग़ज़लकार, समीक्षक, कहानीकार 'प्राण शर्मा' की दो ग़ज़लें

Thursday, 29 October 2009

अमेरिका से 'देवी' नागरानी की दो ग़ज़लें

देवी नागरानी
ग़ज़लः
चमन में ख़ुद को ख़ारों से बचाना है बहुत मुश्किल
बिना उलझे गुलों की बू को पाना है बहुत मुश्किल

किसी भी माहरू* पर दिल का आना है बहुत आसाँ
किसी के नाज़ नख़रों को उठाना है बहुत मुश्किल

छोड़ी चोर ने चोरी, छोड़ा सांप ने डसना
ये फ़ितरत है तो फ़ितरत को बदलना है बहुत मुश्किल

किसी को करके वो बरबाद ख़ुद आबाद हो कैसे
चुरा कर चैन औरों का तो जीना है बहुत मुश्किल

गले में झूठ का पत्थर कुछ अटका इस तरहदेवी
निगलना है बहुत मुशकिल, उगलना है बहुत मुश्किल
(*माहरू: चाँद जैसे चेहरे वाला)
'देवी' नागरानी
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ग़ज़लः

कभी महसूस की गुलशन में तुमने ख़ार की ख़ुशबू
कहीं कागज़ के फूलों से है आती प्यार की ख़ुशबू

कहा किसने कि कोरे काग़ज़ों से कुछ नहीं मिलता
कहानी पढ़ने से आये कभी किरदार की ख़ुशबू

कभी ऐसा भी होता है पराये अपने लगते हैं
जहां अपनों में हम है ढूंढते आधार की ख़ुशबू

ज़रा सी बात दिल दिल से कभी तोड़े, कभी जोड़े
अगर दरकार है दिल को तो बस सहकार की ख़ुशबू

कभी इनकार करता दिल, कभी इकरार करता दिल
अजब उस प्यार से आती है अब इज़हार की ख़ुशबू

महकती रात की उस तीरगी में जागना देवी
सहर सांसों में भर देगी वो गीता सार की ख़ुशबू

बजी घट में वो शहनाई, हुई झंकार वीणा की
उसी मदहोश आलम से उठी मल्हार की ख़ुशबू

छवि जिसके तसव्वुर की बसी है आँख में देवी
है दिल में जुस्तजू बस ये, मिले दीदार की ख़ुशबू
'देवी' नागरानी
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अगला अंक:
8 नवम्बर 2009
महावीर शर्मा
की दो ग़ज़लें

Sunday, 25 October 2009

यू.के. से उषा राजे सक्सेना की दो ग़ज़लें

ग़ज़ल:
-उषा राजे सक्सेना

जिंदगी को स्वार्थ का नश्तर लगा
ढेर था ईंटों का उसको घर लगा

हादसा यह क्या हुआ, इस शहर में
आते-जाते को बड़ा ही डर लगा

जब कहीं भी प्यार की मैयत उठी
मेला नफरत का वहां अक्सर लगा

उफ़, हमारे दौर की ये सभ्यता
दिल में आता है, उसे ठोकर लगा

दिन में चलकर थक गई है तू "उषा"
रात हो आयी है, चल बिस्तर लगा
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ग़ज़ल:

चाहत जब दौलत तक आयी
समझो वो फितरत तक आयी

साजिश, साजिश केवल साजिश
उनकी हर आदत तक आयी

मानव खुद जब बम बन बैठा
ये दुनिया दहशत तक आयी

ऊंचे महलों की कीरत से
ये दुनिया गुरबत तक आयी

टकराई फिर जमकर बरसी
बदली जब परबत तक आयी

उषा राजे सक्सेना

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अगला अंक: नवम्बर २००९
अमेरिका से 'देवी' नागरानी की दो ग़ज़लें
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Friday, 16 October 2009

दीपावली-उत्सव

'महावीर' और 'मंथन' की टीम की ओर से दीपावली के शुभ अवसर पर

आपको और आपके परिवार को हार्दिक शुभकामनाएं

diwali lamps



आज दीपावली का उत्सव स्व. महाकवि पंडित नरेंद्र शर्मा की इन पंक्तियों से आरम्भ करते हैं:

शुभकामना
" सुख सुहाग की दीव्य ज्योति से , घर आँगन मुस्काये
ज्योति चरण घर कर दीवाली , घर आँगन नित आये "
......
लावण्या जी के सौजन्य से उनके पिताश्री स्व. पंडित नरेंद्र शर्मा के अप्रकाशित संकलन "बिंदु" से कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं:
दीपक ( अप्रकाशित )

" दीपक दीपक , जले अँधेरा
काजल बन कर पले अँधेरा
निगले उगले , जिसको दीपक
है दीपक के तले अँधेरा "
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उषा राजे सक्सेना, यू.के.

दिए सा वो माना जलता रहा है
मगर आँधियों में संभलता रहा है
जला साथ सबके वो जीवन में वर्ना
अकेला ही सब ओर चलता रहा है
कभी तो बदल जायेगी इसकी किस्मत
इसी आस में दीप जलता रहा है
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डॉ. सुधा ओम ढींगरा, यू.एस..

मैं दीप बाँटती हूँ.....
इनमें तेल है मुहब्बत का
बाती है प्यार की
और लौ है प्रेम की
रौशन करती है जो
हर अंधियारे
हृदय ' मस्तिष्क को.
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लावण्या शाह, यू.एस.

जय किसान
" सबके आँगन आयी दिवाली, मेरे आँगन बैल किसान
घर-द्वार गली, झिलमिल, जले मेरा नन्हा दिया महान
धूम धडाका बाजे पटाखा , रून झुन है, बैलों का हार ,
नभ सर्वस्व तारा गण मंडित , वही रवि बिखेरे चहूँ ओर प्रकाश ............"
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देवी नागरानी, यू.एस.

बड़ी खुशनुमा याद की ताज़गी है
वो मुरझाए फूलों को फिर से खिलाए
दिवाली का त्यौहार सब को मुबारक
ये त्यौहार ख़ुशियों का हर साल आए
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डॉ. गुलाम मुर्तजा शरीफ, पाकिस्तान

लो गयी दीपावली , मुबारक हो ,
दीप से दीप जले , रोशनी मुबारक हो !
मेरी दुआ है , भाई-चारा सलामत रहे ,
नई सुबह , नई किरण, मुबारक हो !
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जश्न--दिवाली
डा.अहमद अली बर्क़ी आज़मी, भारत

अपने घरों मे दिए जलाऐँ
जश्न--दिवाली मिल के मनाऐँ

बच्चे बूढे नर और नारी
अपना है जो फ़र्ज़ निभाऐँ

हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई
सब को बर्क़ी गले लगाऐँ
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सोहन 'राही', यू.के.

आँगन आँगन रूप धूप की उषा जैसी लाली है
दीपक दीपक जोत जले और जोत बड़ी मतवाली है
घर घर की चौखट पे रौशन दीपों की वो पाली है
भारत की सुन्दर धरती पर उतरी रात निराली है
पूनम की रातों पर भारी अपनी एक दिवाली है.
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आचार्य संजीव 'सलिल', भारत


तन माटी का दीप है, जलती बाती श्वास.
आत्मा उर्मिल वर्तिका, घृत अंतर की आस..

मन-मन्दिर में हो 'सलिल', निश-दिन धवल उजास.
पर सेवा की प्रसारित, जो तू करे सुवास.
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पंकज सुबीर, सीहोर, भारत

दीप के हौसलों की कहानी है ये
रात भर की भले जिंदगानी है ये
हर तरफ दीप हैं हर तरफ रोशनी
रात दीपावली की सुहानी है ये
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पंकज सुबीर, सीहोर, भारत

बधाई गाइये रघुवर अयोध्या लौट कर आये
सुमन अंबर से अगवानी में हैं देवों ने बरसाये
सजीं देहरी पे रांगोली, बंधे तोरण हैं द्वारे पर
अमावस हो गई पूनम हजारों दीप मुस्काये
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राकेश खंडेलवाल, यू.एस..

खील अक्षत लिये,,रंग गेरू घुले,अल्पनायें निरन्तर बनाते रहें
दीप मिल कर गले दीप से दीप्त हौं और बिखरे तिमिर को हटाते रहें
ॠद्धि के सिद्धि के साथ में लक्ष्मियाँ, पंथ भरती रहें स्वर्ण आभाओं से
कामना है यही आपके शीश पर सारे नक्षत्र जगमगाते रहें.
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समीर लालसमीर’, कनाडा

प्रीत का दीपक जलाना
दूर नफरत को भगाना
सच्चाई का हाथ थामकर
जीवन पथ पर चलते जाना...
अबकी आती दिवाली का
ऐसे ही तुम जश्न मनाना..
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नीरज गोस्वामी, भारत

"जला मन में बसा रावण, मनानी गर दिवाली है
दिलों से दूर कर अनबन, मनानी गर दिवाली है

धरा पर रौशनी करना दिवाली है कहा किसने ?
करो तुम सोच को रोशन, मनानी गर दिवाली है"
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मेजर गौतम राजरिशी, भारत

के रंजिश भूल जायें, दोस्ती की बात हो

जगमगाते दीप की रौशनी की बात हो

धूप के तेवर तो बढ़ते जा रहे हैं दिन--दिन

कुछ रहम धरती पे हो, अब कुछ नमी की बात हो

द्वेष से, टकराव से होता है क्या हासिल कहो

प्यार की बातें करो, दीवानगी की बात हो

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प्राण शर्मा, यू.के.

पथ की विपदाएं उससे क्या टकरायेंगीं

जिसकी गोदी में विपदाएं ख़ुद पलती हैं

उस घर में अंधियारा कैसे रह सकता है

जिस घर में दीपावलियाँ हर पल जलती हैं

केवल इक दीपक काफ़ी है अंधियारे में

तू क्यों ना अपने मन का दीप जलाता चल

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प्राण शर्मा, यू.के.
रौशनी हर तरफ ही लुटाते रहें

लौ से अपनी सभी को लुभाते रहें

हर किसी की तमन्ना है अब दोस्तो

दीप जलते रहें झिलमिलाते रहें.

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महावीर शर्मा, यू.के
कविता

दीवाली के शुभ अवसर पर दीप से दीप जलाते रहना
मन के गहरे अंधियारे में प्रेम का दीप जलाते रहना
नफ़रत का नारा दफ़ना कर ईद हो या हो फिर दीवाली
हिंदू, मुस्लिम, सिख ईसाई प्रेम की ज्योत जलाते रहना
शान्ति-दूत के स्वप्नों की अभिलाषा पूरी करनी है
अस्तित्व न हो कोई दुःख का समता दीप जलाते रहना
शिशु हैं भावी की आशा बीच राह में भटक न जाएँ
दीपक का सन्देश सुना कर अंतर्ज्योति जलाते रहना
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अभिषेक

डॉ. महेंद्र भटनागर

माना अमावस की अँधेरी रात है,

पर, भीत होने की अरे क्या बात है ?

एक पल में लो अभी

जगमग नये आलोक के दीपक जलाता हूँ !

.

माना, अशोभन, प्रिय धरा का वेष है,

मन में पराजय की व्यथा ही शेष है,

पर,निमिष में लो अभी

अभिनव कला से फिर नयी दुलहिन सजाता हूँ !

.

कह दो अँधेरे से प्रभा का राज है,

हर दीप के सिर पर सुशोभित ताज है,

कुछ क्षणों में लो अभी

अभिषेक आयोजन दिशाओं में रचाता हूँ !

********************

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'महावीर'

अगला अंक: २४ अक्टूबर 2009
यू.के. से उषा राजे सक्सेना की दो ग़ज़लें
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'मंथन
पर पंकज सुबीर की कहानी
'जब दीप जले आना'
अवश्य पढ़िये.
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