Sunday, 11 December 2011

भारत से चर्चित गज़लकार श्री नीरज गोस्वामी जी की दो ग़ज़लें


लीजिये आज पढ़िएगा भारत के चर्चित गज़लकार श्री नीरज गोस्वामी जी की दो अलग-अलग रंगों की बड़ी ही प्यारी ग़ज़लें.. पहली ग़ज़ल जहाँ एक ओर प्यार में खो जाने को उकसाती है तो दूसरी अपने देश को रहने की एक बेहतर जगह बनाने में गंभीरतापूर्वक अपना योगदान देने के लिए जगाती है..







१-

मान लूँ मैं ये करिश्मा प्यार का कैसे नहीं

वो सुनाई दे रहा सब जो कहा तुमने नहीं

इश्क का मैं ये सलीका जानता सब से सही

जान दे दो इस तरह की हो कहीं चरचे नहीं

तल्ख़ बातों को जुबाँ से दूर रखना सीखिए

घाव कर जाती हैं गहरे जो कभी भरते नहीं

अब्र लेकर घूमता है ढेर-सा पानी मगर

फ़ायदा कोई कहाँ गर प्यास पे बरसे नहीं

छोड़ देते मुस्कुरा कर भीड़ के संग दौडना

लोग ऐसे ज़िंदगी में हाथ फिर मलते नहीं

खुशबुएँ बाहर से 'नीरज' लौट वापस जाएँगी

घर के दरवाज़े अगर तुमने खुले रक्खे नहीं


२.

देश के हालात बदतर हैं, सभी ने ये कहा

पर नहीं बतला सका, कोई भी अपनी भूमिका

झूठ, मक्कारी, कमीनी हरकतें अखबार में

रोज पढ़ते हैं सुबह, पर शाम को देते भुला

बस गया शहरों में इंसां, फर्क लेकिन क्या पड़ा

आदतें अब भी हैं वैसी, जब बसेरा थी गुफा

इस कदर धीमा, हमारे मुल्क का कानून है

फैसला आने तलक, मुजरिम की भूलें हम खता

छोड़िये फितरत समझना, दूसरे इंसान की

खुद हमें अपनी समझ आती कहाँ है, सच बता

दौड़ता तितली के पीछे, अब कोई बच्चा नहीं

लुत्फ़ बचपन का वो सारा, होड़ में है खो दिया

दूसरों के दुःख से 'नीरज' जो बशर अनजान है

उसको अपना दुःख हमेशा ही लगा सबसे बड़ा


प्रस्तोता-

दीपक मशाल

5 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

नीरजजी की रचनाओं का नयापन आनन्दित करता है। आभार पढ़वाने का।

PRAN SHARMA said...

NEERAJ GOSWAMI KEE DONO GAZALON KAA
ANDAZ BADAA HEE PYARA HAI . SHERON
MEIN TAAZGEE HAI . BADHAAEE .

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' said...

नीरज जी की इन दोनों ग़ज़लों की खासियत यह है कि वे बहुत सादगी से अपनी बात कह जाते हैं.

खुशबुएँ बाहर से 'नीरज' लौट वापस जाएँगी

घर के दरवाज़े अगर तुमने खुले रक्खे नहीं


दौड़ता तितली के पीछे, अब कोई बच्चा नहीं

लुत्फ़ बचपन का वो सारा, होड़ में है खो दिया


ऐसे अशआर मन पर नक्श हो जाते हैं. बधाई.

Navin C. Chaturvedi said...

आ. नीरज भाई को पढ़ना हमेशा ही एक सुखद एहसास का बायस होता है। दीपक भाई ये सफ़र ज़ारी रहे।

प्रदीप कांत said...

खुशबुएँ बाहर से 'नीरज' लौट वापस जाएँगी

घर के दरवाज़े अगर तुमने खुले रक्खे नहीं