Monday, 16 February 2009

अख़्तर शीरानी की नज़्म (भाग ३) और 'देवी' नागरानी की ग़ज़ल


अख़्तर शीरानी की नज़्म का अंतिम भाग:


ओ देस से आने वाले बता

क्या आम के ऊंचे पेड़ों पर
अब भी वो पपीहे बोलते हैं
शाख़ों की हरेरी पर्दों में (हरेरी: रेश्मी)
नग़मों के ख़ज़ाने खोलते हैं
सावन के रसीले गीतों से
तालाब में आमरस बोलते हैं
ओ देस से आने वाले बता

क्या अब भी किसी के सीने में
बाक़ी है हमारी चाह बता
क्या याद हमें भी करता है अब
यारों में कोई आह बता
ओ देस से आने वाले बता
लिल्ल्हा बता लिल्लहा बता
ओ देस से आने मेरे बता


क्या गाँव में अब भी वैसी ही

मस्ती भरी रातें होती हैं
देहात की कमसिन माहवशें (माहवशें: चाँद की तरह)
तालाब की जानिब जाती हैं
चांद की सादा रौशनी में
रंगीन तराने गाती है
ओ देस से आने वाले बता


क्या अब भी गजरदम चरवाहे (गजरदम: तड़के, उषाकाल)
रेवड़ को चराने जाते हैं
शाम के धुंधले सायों के
हमराह घरों को जाते हैं
अपनी रसीली बांसुरियों में
इश्क़ के नग़मे गाते हैं
ओ देस से आन वाले बता


क्या गाँव में अब भी सावन में
बरखा की बहारें छाती हैं
मासूम घरों से भोर भयी
चक्की की सदायें आती हैं
याद में अपने मायके की
बिछड़ी हुई सखियां गाती हैं
ओ देस से आने वाले बता


दरया का वो ख़्वाब आलूदा
उसकी फ़ज़ायें कैसी हैं
वो गांव, वो मंदिर, वो तालाब
उसकी हवाएं कैसी हैं
वो खेत, वो जंगल, वो चिड़ियां
उनकी सदाएं कैसी हैं
ओ देस से आने वाले बता


आख़िर में ये हसरत है कि बता
वो ग़ारतें ईमां कैसी हैं (गारतें ईमां: ईमान को नाश करने वाली)
बचपन में जो आफ़त ढाती थी
वो आफ़ते-दौरां कैसी है
हम दोनों थे जिसके परवाने
वो शम-ए-सबिश्तां कैसी है

ओ देस से आने वाले बता...

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'देवी' नागरानी की एक ग़ज़ल:

मेरे वतन की खुश्बू.....

बादे-सहर वतन की चन्दन सी आरही है,
यादों के पालने में मुझको झुला रही है।


ये जानकर भी अरमाँ होते नहीं हैं पूरे,
पलकों में ख़्वाब 'देवी' फिर भी सजा रही है।


कोई कमी नहीं है मुझको मिला है सब कुछ,
दूरी मगर वतन की मुझको रुला रही है।


शादाब मेरे दिल में इक याद है वतन की,
तेरी भी याद उसमें घुलमिल के आ रही है।


'देवी' महक है इसमें मिट्टी की सौंधी-सौंधी,
मेरे वतन की ख़ुश्बू केसर लुटा रही है।

'देवी' नागरानी





8 comments:

अमिताभ श्रीवास्तव said...

kya khoob likhte he janab shirani saheb..lafz nahi rah jaate kuchh kahne ke liye, dooje devi nagrani ji ki gazal waah..,
dhnyavad mahavirji, aapke is karya ke liye me tahe dil se shukrgujaar hu..jo behtreen rachnaye padhne ko milti he..
dhnyavaad.

Harkirat Haqeer said...

ओ देस से आने वाले बता

क्या आम के ऊंचे पेड़ों पर
अब भी वो पपीहे बोलते हैं
शाख़ों की हरेरी पर्दों में (हरेरी: रेश्मी)
नग़मों के ख़ज़ाने खोलते हैं
सावन के रसीले गीतों से
तालाब में आमरस बोलते हैं
ओ देस से आने वाले बता.....waah bhot sunder bhav....sadhuvad ! nagrani ji padhna sukhad lga mujhe yaad hai jab Subhash Nirav ji ne apne blog pe meri kavitayen chapi thin to pehla comt inhi ka tha ...!!

गौतम राजरिशी said...

वाह....देवी जी की खूबसूरत गज़ल खास कर ये शेर "कोई कमी नहीं है मुझको मिला है सब कुछ/दूरी मगर वतन की मुझको रुला रही है"
वाह...
और अख्तर साब की नज़्म तो-क्या कहने

शुक्रिया महावीर जी-बहुत बहुत शुक्रिया

PRAN SHARMA said...

AKHTAR SHEERAANI KEE NAZM AUR
DEVI NAAGRAANI KEE GAZAL DONO
HEE KAA JAADOO SAR PAR CHADH KAR
BOL RAHAA HAI.RAHNAAON KEE PRASTUTI
LAAJWAAB HAI.AADARNIY MAHAVIR JEE
KO NAANAA BADHAAEEYAN.

hemjyotsana said...

आदरणीय सर ,
हमेशा की तरह बहुत अच्छी नज्म और गज़ल पडी़ यहाँ ,
शुक्रिया ,

सादर

दिगम्बर नासवा said...

अभी अभी देश की मिट्टी......हवाओं की खुशबू......सर्दी की धुप ले कर लौटा हूँ और आपके ब्लॉग पर ये रचना पढ़ कर मन भरी सो हो गया है, देश की यादों में लौट गया है.

शुक्रिया ऐसी बेहतरीन रचनाओं के लिए
प्रणाम है आपको

"अर्श" said...

akhtar sahab ki nazm aur devi ji ki gazal ke kya kahane ...... bahot khub rahi aapki prastuti bhi ... shandar maza aagaya padhke ... dhero badhai ........

apani nai gazal pe aapko aamantrit karata hun.. jarur aayen...

arsh

Devi Nangrani said...

AAj is blog se guzarte hue ek soonapan aankhon mein bhar aaya hai...
Vo yaad ke angan ki shakein
kyon har pal sooni sooni hai..

Devi