Saturday, 30 May 2009

यू. के. से पुष्पा भार्गव की दो कविताएं - दो रंग

संक्षिप्त परिचय:
नाम: पुष्पा भार्गव, जन्म: मथुरा (भारत), शिक्षा: १९५४ में अंग्रेज़ी साहित्य में एम. ए।

कार्य-क्षेत्र: 'नूपुर' पत्रिका का दो वर्षों तक संपादन, यू.के. में विभिन्न स्कूलों में अध्यापिका व गवर्नर, 'कला-ज्योति', हिंदू कल्चरल सोसाइटी, इंडियन ब्रिटिश मीडिया जैसी भारतीय संस्थाओं की पहली अध्यक्षा तथा अनेक संस्थाओं की प्रधान , सचिव, ट्रस्टी रह चुकी हैं। विदेश में ४० वर्षों से भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती आई हैं।

प्रकाशित कृतियाँ : 'अंतर्नाद', 'लहरें'।
'लहरें' का लोकार्पण रविवार, ३१ मई २००९ को बॉम्बे पैलेस, लन्दन में श्रीमती कपिला मोहता, मंत्री - कल्चर (भारतीय आयोग) और डायरेक्टर, नेहरु सेंटर, लन्दन द्वारा समपन्न होगा।


परदेसी मन

परदेसी मन ने झुक झुक कर
देखे देस के कितने सपने
अपना घर और सगे बन्धु जन
वह पल जो अब रहे अपने

दूरी के फैले पंखों से
सिहर उठा मन का स्पन्दन
व्यस्त व्यवस्था ने कर डाला
कितना कठिन प्यार का बन्धन

परिवर्तित जीवन में ढल कर
अब एक सभ्य देश का बासी
भूला निज भाषा संस्कृति को
बरबस हो कर मौन प्रवासी

उठती रहती अन्तस्तल में
बार-बार मन की जिज्ञासा
कैसी व्याकुल सी अकुलाती
अपने घर जाने की आशा

आंखों से सावन बरसा जब
स्मृति के घन घिर घिर आए
प्रबल विवशता में उलझे
पाँव कभी भी लौट पाए
पुष्पा भार्गव

******************

जीवन एक कहानी
नित नूतन संसृति का कण कण
गाथा बस एक पुरानी है
चलते चलते सुनता जा राही
जीवन एक कहानी है।

कहती नव कलियाँ पल्लव से
जीवन है मादकता का घर
बिखरे फूलों के पंख कहें
यह बीती हुई जवानी है।

हँस हँस कर फूल बिछाते हम
रो-रो कर उलझते काँटो में
सुख-दुख के इस बन उपवन में

यह किस्मत ही अनजानी है।

कुछ आज जले, कुछ जल के बुझे
जलना है इस जीवन की गति
मानवता के अरमानों की
यह जलती हुई निशानी है।

साहित्य बने कवियों के पद
संगीत बना इसका गायन
चिर युग से बहती गंगा सी
यह एक अनन्त कहानी है।
पुष्पा भार्गव

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आगामी अंक: ६ जून २००९
भारत से पिंगल आचार्य श्री आर. पी. शर्मा 'महरिष' की दो ग़ज़लें

20 comments:

Vijay Kumar Sappatti said...

aadarniya mahaveer ji aur pushpa ji ko pranaam ..

dono kavitayayen padhkar man aanand se jhoom utha .. kavitao ne beete hue sahityik dino ki yaad dila di ...waah ..kya khoob likha hua hai ..

आंखों से सावन बरसा जब
स्मृति के घन घिर घिर आए
प्रबल विवशता में उलझे
पाँव कभी भी लौट न पाए
aur ye bhi kitna philosphical hai ..

हँस हँस कर फूल बिछाते हम
रो-रो कर उलझते काँटो में
सुख-दुख के इस बन उपवन में
यह भाग्य बड़ा अनजानी है।


mera naman aur salaam pushpa ji ki lekhni ko ..

aapka
vijay

PRAN SHARMA said...

DONO STARIY KAVITAAYEN HAIN.PUSHPA
JEE KO MEREE HARDIK BADHAAEE.

SWAPN said...

donon kavitayen anupam, padhane ke liye aabhaar.

विनय said...

bahut hee sundar hain do rachnaayein, saadhuwaad

"अर्श" said...

DONO KAVITAON KA APNAA HI RAS HAI ... JISME GOTE LAGAATAA RAHAA MAIN TO ... EK ME APNE DESH KI PUKAAR AUR PYAAR TO DUSARE ME TAZURBAAKAARI KI BAATEN... DHERO BADHAAE ... AAPKO SAADAR PRANAAM...


ARSH

श्याम कोरी 'उदय' said...

... दोनों ही रचनाएँ अतिसुन्दर ... बधाई ... बधाई !!!!!!

गौतम राजरिशी said...

अच्छी कवितायें दोनों
पूरी लय में...सुंदर शब्द-संयोजन और भावपूर्ण

नीरज गोस्वामी said...

Aadarniy Mahaveer Ji aap ka bahut bahut dhanyvaad aapne apne blog ke maadhyam se pushpa ji ki behad khoobsurat rachnayen padhne ka mauka diya...

Neeraj

योगेन्द्र मौदगिल said...

दोनो कविताएं पसंद आई पुष्पा जी को बहुत बहुत बधाई आपकी प्रस्तुति के लिये साधुवाद

बलराम अग्रवाल said...

हृदय की पीड़ा को व्यक्त करते खूबसूरत गीत। बहुत-बहुत बधाई!

Divine India said...

प्रणाम सर,
काफी व्यस्तता होने की वजह से ब्लाग पर आ ही नहीं पा रहा था… इसकारण आपका द्वार भी छूटा जा रहा था…।
अभी मैं नरसंहार के उपर पटकथा में व्यस्त हूँ थोड़ा काम और बचा है बस जल्द ही पूरा हो जाएगा…।
पुष्पा जी की दोनों कवितायें अवर्णीय हैं… मैंने बस पढ़ा समझा और कुछ सीखा भी… अभिव्यक्ति का सुंदर बहाव।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

लँदन मेँ ३१ मई का
आदरणीया पुष्पा जी की कृति का सम्मान हो चुका होगा
उन्हँ अनेकोँ बधाईयाँ -
आज आपके सौजन्य से
हम उनकी २ उत्कृष्ट रचनाओँ का आनँद ले पाये
उसके लिये आपका आभार भी प्रकट करती हूँ पूज्य महावीर जी
सादर,
- लावण्या

पंकज सुबीर said...

पुष्‍पा जी ने हिंदी गीत की परंपरा का खूब निर्वाह किया है । ये परंपरा भले ही आज लुप्‍त प्राय है किन्‍तु मेरा विश्‍वास है कि अंत में यही परंपरा फिर लौटेगी और खूब लोकप्रिय होगी । पुष्‍पा जी जैसे साहित्‍यकार इस बात का भरोसा देते हैं कि अभी सब कुछ खत्‍म नहीं हुआ है । संयोग से मैं भी भार्गव हूं ।

Devi Nangrani said...

Pushpa bhargav ki donon kavitayein jeevan ras se paripoorn hain , jeevan ke tajurbaat ko anubhavi lekhani se kagaz par laan ek nishta hai

हँस हँस कर फूल बिछाते हम
रो-रो कर उलझते काँटो में
सुख-दुख के इस बन उपवन में
यह भाग्य बड़ा अनजानी है।
Devi nangrani

परमजीत बाली said...

बढिया रचनाएं प्रेषित की हैं।आभार।

देव मणि पाण्डेय (ई मेल द्वारा) said...

पुष्पा भार्गव की दोनों कविताओं में प्रवासी मन का एहसास बहुत सुंदर तरीके से अभिव्यक्त हुआ है ।

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' (ई मेल द्वारा) said...

रचनाएँ अच्छी हैं.'यह भाग्य बड़ा अनजानी है।' में लिंग दोष है. भाग्य पुल्लिंग है- यथा: 'भाग्य ही खोटा है'.'अनजान'शब्द के साथ 'बड़ा' विशेषण? क्या बड़ा अनजान, छोटा अनजान ठीक प्रयोग होंगे? 'यह किस्मत ही अनजानी है' कहने से उक्त दोनों दोषों का निराकरण होता है.गलत हो तो क्षमाप्रार्थी हूँ.
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

महावीर said...

आचार्य 'सलिल' जी
मैं आपके प्रति आभार प्रदर्शित करता हूँ कि आप समय समय पर गंभीरता से त्रुटियों से अवगत कराते रहें हैं. पुष्पा जी की कविता में आपके सुझाव के अनुसार त्रुटि दूर कर दी गयी है और उन्हें भी ई मेल द्वारा अवगत करा दिया जाएगा.

टिप्पणियों में इस प्रकार के सुझावों का स्वागत करना चाहिए. इसमें अन्य लेखकों के भी ज्ञानवृद्धि में ही नहीं बल्कि रचनाओं के सौष्ठव में भी सहायता मिलती है. आशा है इसी प्रकार आपका मार्ग-दर्शन मिलता रहेगा.
महावीर शर्मा

Dr. Ghulam Murtaza Shareef said...

Pushpaji, Namskar.

PRAWASI KI GATI PRAWASI JANEY,
KI JIN PRAWASI HOEY.
Apki kavita ham prawasi logon ke dil ki tarjumani karti hai.

Dr. Shareef
Karachi (Pakistan)
gms_checkmate@yahoo.com

Anonymous said...

namaste,

pushpa ji ki rachnay kafi aachi hain. main jyada to nahi janta par jo padhne main aacha ho or lekhni sanskarit ho to aacha lagta hai jaise pushap ji likhti hai.

mai bhi kahaniya likhta hu. jurnlism se juda hu. one time national award or ek bar state award mila hai 2007 mai. aapki aagya ho to mai aapko apni kahaniya bhej sakta hu. marg darshan chata hu.