Thursday, 26 November 2009

यू.के. से पुष्पा भार्गव की कविता - 'दर्द'

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२६ नवम्बर २००८ के दिन भारत के व्यवसायिक महानगर मुम्बई में बड़े पैमाने पर चरमपंथियों के हमले के कारण खून ही खून फैला हुआ था! इस घृणास्पद त्रास्पद घटना को सुनते ही मानवता कर्राह उठी थी. भारतवासियों और प्रवासियों के दिलों में एक ऐसा दर्द उठा था जो आज ठीक एक वर्ष के बाद भी कम न हुआ। भारत से हज़ारों मील दूर यू.के. से पुष्पा भार्गव वही 'दर्द' इस रचना में मार्मिक शब्दों में व्यक्त कर रहीं हैं।

दर्द

पुष्पा भार्गव


मैं खेल रहा था खेल

और मस्त था खाने पीने में

तभी अचानक दर्द उठा मेरे सीने में

मैं तड़प उठा

उस दर्द से जीने में।


वह दर्द नहीं था दिल के दौरे का

वह दर्द नहीं था नासूर या किसी फोड़े का

वह दर्द नहीं था भूके पेट फिरने का

वह दर्द नहीं था शेयर्स के गिरने का

वह दर्द नहीं था शरीर के दुखने का

वह दर्द नहीं था काँटों के चुभने का

वह दर्द नहीं था खेल में हारे जाने का

वह दर्द नहीं था भाग्य से मार खाने का


वह दर्द था आतंकवादियों के काले कारनामों का

वह दर्द था आतंक में दिल धड़कने का

वह दर्द था गोली लगे पंछियों के फड़कने का

वह दर्द था नन्हीं सी जान के माँ बाप मारे जाने का

वह दर्द था बेमौत मारे जाने की खबर प्रियजनों को सुनाने का

वह दर्द था निहत्थे, निर्दोषों की कराहों का

वह दर्द था मरते दम में ज़िंदगी की चाहों का

वह दर्द था अत्याचारों की बिजली चमकने का

वह दर्द था मासूमों के तड़पने का

वह दर्द था बम के धमाकों का

वह दर्द था जलने वाले लाखों का

वह दर्द था संगीन गोलियां चलने का

वह दर्द था भारत की शान, ताज के जलने का

वह दर्द था जो उठा हज़ारों के सीने में

जिससे हज़ारों तड़प उठे उस दर्द से जीने में

पुष्पा भार्गव

14 comments:

Udan Tashtari said...

उस रोज का पूरा दर्द उकेर दिया इस रचना में..शायद हर संवेदनशील हृदय ने यही दर्द महसूस किया होगा.

पंकज सुबीर said...

वह दर्द हर हिन्‍दुतानी के मन में हैं और आपकी इस कविता ने उस दर्द को स्‍वर प्रदान किया है । पूरी कविता ने दर्द की अभिव्‍यक्ति करने में सफलता प्राप्‍त की है । ये दर्द तो पूरी मानवता का ही है । हर तरफ मानवता एक ही प्रश्‍न पूछ रही है कि जब ईश्‍वर ने इन्‍सान के लिये पंछी, झरने, नदियां, पहाड़, फूल बनाये तो फिर भला इन्‍सान को क्‍या आवश्‍यकता आन पडी बारूद बनाने की । ये दर्द ही हम सबके मन में है ।

MANVINDER BHIMBER said...

दिल आज भी दुखने लगता है। उन लोगों के लिए जो इस दिन ‘ाहीद हो गये, असमय मृत्यु को प्राप्त हो गए(

नीरज गोस्वामी said...

आपने हम सब के दिलों में उठते दर्द को शब्द दे दिए हैं...

नीरज

मनोज कुमार said...

इस कविता की व्याख्या नहीं की जा सकती । कोई टीका नहीं लिखी जा सकती । सिर्फ महसूस की जा सकती है ।

Nirmla Kapila said...

ये दर्द हम सब का दर्द है मगर उन कातिलों के सीने मे शायद दिल नहीं पत्थर थे बहुत मार्मिक अभिव्यक्ति है पुश्पा जी को बहुत बहुत शुभकामनायें

श्याम कोरी 'उदय' said...

... अत्यंत प्रभावशाली रचना, बधाईंया !!!!

Babli said...

आपने बहुत ही सुन्दरता से हर एक शब्दों में उस मार्मिक घटना को प्रस्तुत किया है ! इस भयानक हादसे में आज ही के दिन पिछले साल मासूम लोगों की जान चली गई! आज भी दिल में दर्द होता है उन सभी लोगों के लिए जिन्होंने बिना कारण आपनी जान गवा बैठे!

Tilak Raj said...

इस ब्‍लॉंग पर पहले भी एक बार आया था लकिन कुछ समयाभाव के साथ। आज जब पढ़ा, तो आद्यान्‍त पढ़ गया। अभिव्‍यक्ति की संपूर्णता लिये हुए साहित्‍यिक परिपक्‍वता का एक से बढ़कर उदाहरण समक्ष में है। आयुवर्ग के ऐसे विस्‍तीर्ण पटल पर विविधता का ऐसा संयोजन मैंने और कहीं नहीं पाया। मेरा पहला आभार इंटरनैट के जनक को, दूसरा ब्‍लॉंग परंपरा के जनक को और तीसरा आभार ब्‍लॉग संचालनकर्ता को और फिर आभारों की एक कतार उन र‍चयिताओं के लिये जिन्‍होंने इसे सुशोभित किया।

तिलक राज कपूर

पी.सी.गोदियाल said...

वह दर्द था संगीन गोलियां चलने का

वह दर्द था भारत की शान, ताज के जलने का

वह दर्द था जो उठा हज़ारों के सीने में

जिससे हज़ारों तड़प उठे उस दर्द से जीने में

Bahut Laajabaab !

"अर्श" said...

एक ना भूल पाने वाला दर्द.. जो हमेशा ही टीस देता रहेगा हर भाररतीय को
कुरेदने की जरुरत भी नहीं होगी ... और इस पुरे दर्द को आपने जो अल्फाज
दी है वो कमाल की बात है कविता ने मन को थोडा हल्का किया है
वो ऐसे के दर्द को आपने बांटा है , बहुत ही सुन्दर कवितावो की रचना की है आपने
बधाई कबूल करें ..


अर्श

ashok andrey said...

pushpaa jee ne us bhayanak haadhse ko jo mumbai me ghataa thaa ko- jis tarah apne andar oothte dard ko sahaj abhivayktee dee hai veh kaabile taareeph hai-
veh dard thaa jo oothaa hajaaron ke seene men
jisse hajaaron tadap oothe us dard se jeene men
bahut khoob mei unhen badhai deta hoon
ashok andrey

kavi kulwant said...

bahut khoob... Dard ko bhulane ko kaha jata hai normally..lekin kuch dard yaad rakhane chahiyen...

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

आ. पुष्पा जी ने समस्त मानव जाती के दर्द को शब्दों का बाना पहना दिया है और अब ये दर्द साझा हुआ
ना जाने, हम कब सुसभ्य बनेंगें ? :-(
आभार ...इसे पढवाने का
विनीत ,
- लावण्या