Friday, 4 December 2009

पंकज सुबीर की कविता - 'आदमी'


'आदमी' शीर्षक के अंतर्गत सुबीर जी की चार अनमोल रचनाओं में से
यह पहली रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ. अन्य तीन रचनाएं शीघ्र ही
इसी ब्लॉग पर पढ़कर आप आनन्दविभोर हो जायेंगे.
लीजिये यह है:

आदमी -
बहुत से नाम हैं उनके
फलाने, ढिकाने, अमके, ढिमके,
सचमुच बहुत नाम हैं उनके,
एक फलाने का उद्बोधन
धो डालता है सारी पहचान को,
व्यक्तिगत पहचान को,
और कर देता हैं शामिल भीड़ में, फलानों की
बहुत पीड़ादायी होता है
अपनी सारी पहचान को खोकर
फलाना आदमी हो जाना
यँ ही नहीं कह देते हम किसी को,
फलाना आदमी,
वास्तव में वो एक साज़िश होती है हमारी,
किसी अच्छे खासे जीवन को
सिरे से ख़ारिज कर देने की,
यह जतलाने की,
कि आख़िरकार हो क्या तुम ...?
कुछ भी तो नहीं हो ...
तो तुम महात्मा गांधी हो
और वीरप्पन,
फिर क्यों उठाई जाए जहमत...?
तुम्हारा नाम याद रखने की,
जबकी भरी पड़ी है ये दुनिया,
रामलाल, श्याम लाल और गिरधारी लालों से,
लेकिन दुर्भाग्य या दुर्योग से
चूंकि तुम भी एक आदमी हो,
इसलिए अब तुम फलाने हो
एक भीड़, जिस का नाम फलाना है
जो कुछ भी नहीं है,
गांधी है वीरप्पन,
और ये फलानापन भी तुम्हारा नहीं है
यह तो हमारी सुविधा के लिए है,
ताकि जब तुम मरो , तो हम कह सकें
कि वो गंजा गंजा सा फलाना आदमी,
जो अब तक खुद को जिंदा समझता था
कल रात सचमुच में मर गया
वही लिजलिजा, सड़ांध मारता,
घिसट घिसट कर चलता,
लार, आंसू और पीब से बना
गंजा गंजा सा फलाना आदमी

पंकज सुबीर



अगला अंक:११ दिसम्बर २००९

मेजर राजरिशी गौतम

की दो ग़ज़ले

34 comments:

मनोज कुमार said...

कविता इतनी मार्मिक है कि सीधे दिल तक उतर आती है।

Dr. Sudha Om Dhingra said...

कई बार जब तारीफ के लिए शब्द नहीं मिलते तो पंजाबी में कहते हैं -मार डाला, सुबीर की इस कविता ने मार ही डाला है -हृदय को चीर कर निकल गई --याद रहेगी और सोचने पर मजबूर करती रहेगी,बधाई.

Udan Tashtari said...

कुछ पंक्तियां विचारों में आ गई - इसे पढ़ते गुरुदेव से बिना पूछे हिमाकत कर ही लेता हूँ...



मरे हुए जिन्दगी जीना,,,

या

मरे हुए का मर जाना...

अपनी पहचान को
खुद न पहचान पाना..

और

बन जाना फलाना..

कोई दुर्योग

या

करनी का फल

या

फिर गलत का प्रतिरोध न कर
उसे सही ठहरा देने में-
एक ऐसा योगदान करना..

मानो

बिना नींव की इमारत की
छत तनवाने में
बल्ली बन टिके रहने की
मशक्कत..

क्या क्या नहीं करता है ..

एक मरा हुआ जिन्दा आदमी..
मरने के इन्जार में..
जिन्दा रहने के लिए..

अपनी पहचान खो..

फलाना बने!!!


आह!!

वो फलाना

या

मैं

या

तुम!!!!

-कौन???

-समीर लाल ’समीर’





---एक बेहतरीन रचना...कई घाव कुरेदती...बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती!!!


मास्साब पंकज जी कुछ लिखें और हम हिल न जायें..ऐसा कब हो सकता है. एक सशक्त लेखनी!!


प्रणाम और आपका आभार!!

रविकांत पाण्डेय said...

सदी का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है मनुष्य का असंवेदनशील होते जाना और परिणामस्वरूप रिश्तों में बढ़ता खारापन। एक ही सांस में पढ़ गया पूरी कविता-आम आदमी का दर्द बखूबी बयां किया है आदरणीय पंकज सुबीर जी ने। सचमुच कितना कष्टदायी है अपनी निजता खोकर एक भीड़ का हिस्सा बन जाना।

ताऊ रामपुरिया said...

एक ओर जहाँ पंकज सुबीर जी रचना दिल छू जाती है, वहीं समीर जी की कमेंट मे आई रचना भी दिल भेद गई...इसे तो आपके ब्लॉग पर एक पोस्ट का स्थान मिलना चाहिये. मुझे लगता है कि इतनी उत्कृष्ट रचना मात्र टिप्पणी में रह जाना इस रचना के साथ अन्याय ही कहलायेगा. महावीर जी से निवेदन है कि वो इस ओर ध्यान देंगे. बहुत आभार इस पोस्ट और ऐसी टिप्पणी पढ़वाने का. मन खुश हो गया...मार्मिकता के बावजूद उत्कॄष्टता देख.

निर्मला कपिला said...

बहुत पीड़ादायी होता है
अपनी सारी पहचान को खोकर
फलाना आदमी हो जाना ।
यँ ही नहीं कह देते हम किसी को,
फलाना आदमी,
वास्तव में वो एक साज़िश होती है हमारी,
किसी अच्छे खासे जीवन को
सिरे से ख़ारिज कर देने की,
ओह कितना पीडादायी होता है किसी के अस्तित्व का नकारा जाना। सच मे हम खुद को साबित करने के लिये किसी को कई बार कितना पराया कर देते हैं फलाना कह कर । सुबीर जी की संवेदनशीलता पर हैरान होती हूँ आम आदमी से जुडी छोटी से छोटी बात भी उनके दिल को गहरे छू जाती है। जिसे खूबसूरती से शब्दों मे उतार देते हैं ।
न तो तुम महात्मा गांधी हो
और न वीरप्पन,
फिर क्यों उठाई जाए जहमत...?
तुम्हारा नाम याद रखने की,
जबकी भरी पड़ी है ये दुनिया,
आज की दुनिया का सच बखूबी इन पंक्तिओं मे उतार दिया। आम आदमी की कीमत ही क्या रह गयी है?
बहुत मार्मिक अभिव्यक्ति है। जो सुबीर जी जैसे पार्खी की कलम से ही सम्भव है। सुबीर जी को बधाई और शुभकामनायें

पी.सी.गोदियाल said...

कि वो गंजा गंजा सा फलाना आदमी,
जो अब तक खुद को जिंदा समझता था
कल रात सचमुच में मर गया
वही लिजलिजा, सड़ांध मारता,
घिसट घिसट कर चलता,
लार, आंसू और पीब से बना
गंजा गंजा सा फलाना आदमी ।

मार्मिक अभिव्यक्ति !

seema gupta said...

बेहद ही मार्मिक और सम्वेदनशील ....

regards

रश्मि प्रभा... said...

एक भीड़, जिस का नाम फलाना है
जो कुछ भी नहीं है,
न गांधी है न वीरप्पन,
और ये फलानापन भी तुम्हारा नहीं है
यह तो हमारी सुविधा के लिए है,
ताकि जब तुम मरो , तो हम कह सकें
कि वो गंजा गंजा सा फलाना आदमी,
जो अब तक खुद को जिंदा समझता था
कल रात सचमुच में मर गया......वाह

दिगम्बर नासवा said...

अपने अस्तित्व को अपने स्व के एहसास को अपने सामने ही मरता हुवा देखना बहुत ही पीड़ादायक होता है .....
बहुत ही मार्मिक, स्तब्ध कर देने वाली रचना ............ गुरु देव के शब्द बहुत कम पढ़ने को मिलते हैं और आज तो पूरी रचना ........ सच में कोई ख़ज़ाना हाथ आ गया आज तो रचना के रूप में ....... प्रणाम है मेरा उनकी लेखनी को ...........

वन्दना said...

जो अब तक खुद को जिंदा समझता था
कल रात सचमुच में मर गया
वही लिजलिजा, सड़ांध मारता,
घिसट घिसट कर चलता,
लार, आंसू और पीब से बना
गंजा गंजा सा फलाना आदमी ।

aadmi jo khud ko aadmi samajhta hai uska kitna sahi chitran kiya hai pankaj ji ne........kitni peeda chupi hai .........naman hai us lekhni ko.
एक मरा हुआ जिन्दा आदमी..
मरने के इन्जार में..
जिन्दा रहने के लिए..

अपनी पहचान खो..

फलाना बने!!!


आह!!

वो फलाना

या

मैं

या

तुम!!!!

-कौन???

sameer ji ne to ye likhkar is rachna mein aur chaar chand laga diye hain.........atulniya.

अंकित "सफ़र" said...

नमस्कार महावीर जी,
गुरु जी की इस रचना को पढवाने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद
@ गुरु जी, इस कविता को पढ़कर आपकी कहानी "शायद जोशी" की याद आ गयी.
ये रचना बेहद उम्दा ढंग से विचारों को समेटे है और खूबसूरती से बयाँ कर रही है कमज़ोर हो रहे आपसी रिश्तों का दर्द भी.
एक हकीकत से रूबरू करवा रही है कि हम मतलब ख़त्म होते ही रिश्ते और आदमी दोनों को भूल जाते हैं और फिर बन जाते हैं दुसरे के लिए "फलाना आदमी".

अमिताभ श्रीवास्तव said...

aadmi...
pankajji ne marm par seedhe apni rachna ko udel diya. unke dvara pesh ki jaa rahi rachna is dour me saahity ko bahut badaa teka he..is teke ke sahare bahut se log khadaa hona seekh rahe he, yah kyaa kam rachnatmak kaary he jo pankajji apratkshya tour par nibhaa rahe he.

Suman said...

nice

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

किसी अच्छे खासे जीवन को
सिरे से ख़ारिज कर देने की,
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
मनुष्य एकमात्र ऐसा प्राणी है जिसके ह्रदय में अनगिनत भावों की पेचीदा भूलभूलैया
का पूरा बीहड़ फैला रहता है ..
आज उसी से साक्षात्कार करवा दिया पंकज भाई आप ने ........
और किसी की बेबस मौत और
किसीके उपेक्षा भरे कटु वचनों की सारी कडवाहट को
एकबारगी ,
रास्ते पर खडा कर दिया --
ऐसा धारदार , सशक्त लेखन ,
ईश्वर आप पर कृपा कर , करवातें रहें
ये आपकी बड़ी बहन की दुआ भी है और
मौन प्रार्थना भी ..........
बहुत स्नेह के साथ आशिष ,
मेरे अनुज भाई के लिए
- लावण्या

Tilak Raj said...

मुझे सबसे कठिन काम लगता है गद्य-कविता कहना। जहॉं छन्‍दों का बन्‍धन न हो, पूर्ण स्‍वतंत्रता हो शब्‍दों के मोती चुनने की और उन्‍हें विचार के धागे में पिरोने की, वहॉं उस धागे में कहीं गॉंठ न पड़े और सही मोती सही जगह आये यह तो पूरी तरह कवि का दायित्‍व हो लेकिन हर सुनने/पढ़ने वाले को माला में कोई दोष प्रतीत न हो; बहुत दुष्‍कर है। ऐसे में आदमी को सटीक शब्‍दों के साथ गद्य-कविता में पिरो ले जाना! यह विकट कार्य बड़ी सहजता से कर दिखाया है आपने। बधाई।

तिलक राज कपूर

चंदन कुमार झा said...

एक संवेदनशील एव भावपूर्ण रचना जो सजह ही मन पर अपनी छाप छोड़ जाती है ।

राज भाटिय़ा said...

संवेदनशील ओर बहुत सुंदर रचना

प्रकाश पाखी said...

और ये फलानापन भी तुम्हारा नहीं है
यह तो हमारी सुविधा के लिए है,
ताकि जब तुम मरो , तो हम कह सकें
कि वो गंजा गंजा सा फलाना आदमी,
जो अब तक खुद को जिंदा समझता था
कल रात सचमुच में मर गया
इन पंक्तियों ने मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया

venus kesari said...

मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा

समझ मे नही आता आज के समय मे ये बात कितनी प्रसन्गिक रह गई है

हर वो आपमी जिस्से कोइ स्वार्थ सिध्द होना है उसके सुर से सुर को मिलाया जाता है वरना तो हर आदमी को इसी कोटे मे रखा जाता है

फ़लाने आदमी के कोटे मे


-वीनस

PRAN SHARMA said...

PANKAJ SUBEER JEE KEE KAVITAAON KO
PADHNA GOYA AANAND KE SAAGAR MEIN
DUBKEE LAGAANAA HAI.AADMEE JAESEE
ANMOL V ADBHUT KAVITA SUBEER JEE
HEE KAH SAKTE HAIN.UNHEN BADHAAEE
AUR SHUBH KAMNA

पंकज सुबीर said...

सभी को आभार कविता को पसंद करने के लिये । और आभार परम आदरणीय दादा भाई को कि उन्‍होंने कविता को इस योग्‍य समझा कि उसे ब्‍लाग पर लगाया जा सके । दादा भाई कि सबसे बड़ी विशेषता ये है कि वे रचनाकारों को इतने प्रभावशाली तरीके से प्रस्‍तुत करते हैं कि उसके बाद रचनाकार के लिये दाद मिलना स्‍वभाविक बात होती है । सभी को आभार ।

श्याम कोरी 'उदय' said...

ताकि जब तुम मरो , तो हम कह सकें
कि वो गंजा गंजा सा फलाना आदमी,
जो अब तक खुद को जिंदा समझता था
कल रात सचमुच में मर गया
.... बेहद प्रसंशनीय अभिव्यक्ति !!!!

योगेन्द्र मौदगिल said...

BEHTREEN.....shabdchitra...

sadhuwad..sadhuwad..

हरकीरत ' हीर' said...

अभी तक ''महुआ घटवारिन '' के शब्द दिमाग में घूम रहे हैं....मेल खोला तो महावीर जी की मेल एक और शुभ समाचार लिए खड़ी मिली .....पंकज सुबीर की मर्मस्पर्शी कविता "आदमी" पढ़िये 'महावीर' ब्लॉग पर .....ब्लाग पर पहुंची तो देखी उनकी तस्वीर .....कहीं नर्मदा की आँखों में गहरे तक खोई हुई सी ...कुछ नमी सी लगी आँखों में .... नहीं .....ये ' फलां' आदमी तो हरगिज़ नहीं हो सकता ...जरुर किसी की साज़िश रही होगी ...या फिर जो मर गया वो फलां रहा होगा ....जो आज है वो साहित्य जगत का एक सशक्त हस्ताक्षर है .....नमन .....!!

Shardula said...

आदरणीय महावीर जी, जब भी आपके ब्लॉग पे आती हूँ, पाती हूँ कि आप चुन-चुन के मोती ढूँढ लाते हैं.
आपकी पारखी नज़र को नमन और हार्दिक धन्यवाद !
सुबीर जी, बहुत ही सशक्त कविता! दूसरों को गौण समझने की हमारी प्रवृति को कड़क तंमाचा लगाते हुए...
"किसी अच्छे खासे जीवन को
सिरे से ख़ारिज कर देने की,
यह जतलाने की,
कि आख़िरकार हो क्या तुम ...?"
....
और ये फलानापन भी तुम्हारा नहीं है
यह तो हमारी सुविधा के लिए है,
ताकि जब तुम मरो , तो हम कह सकें
कि वो गंजा गंजा सा फलाना आदमी,
जो अब तक खुद को जिंदा समझता था
----
सुबीर जी, बेहद तीखा, बहुत असरदार!!

Meenu Khare said...

बहुत ही मार्मिक रचना लगी. सुबीर जी को बधाई. महावीर जी को धन्यवाद इसे पढ्वाने के लिए.

Devi Nangrani said...

सुबीर की वाक वाणी में एक चुम्बक है जो कहीं न कहीं उन तमाम अनचाहे धातुओं को अपने दयिरे की सीमा में लाकर खड़ा कर देता है.
सोच का चुनाव करने की कोई दुश्वारी नहीं, उन्वान लिया है और कलम की रवानी बाकी काम कर देती है. चश्मेबद दूर. यह
कविता एक दस्तावेज़ है. ऐसे फलां आदमी से कई बार रूबरू होने का अवसर मिला है..हो बहू ऐसा ही!
देवी नागरानी

वाणी गीत said...

फलाने, ढिकाने, अमके, ढिमके,...नाम रखे ....
कि मरने पर याद किया जा सके एक नाम ले कर ...

पंकज जी पर टिपण्णी करने की बिसात नहीं ....इस लिए सिर्फ आभार ....!!

"अर्श" said...

आदरणीय महावीर जी को सादर प्रणाम,
इस मर्मस्पर्शी कविता को तो उसी दिन पढ़ चुका था मगर मैं अपने आराध्य देव और गुरु जी के इस अद्वितीय कविता पर कोई भी टिपण्णी करने के लिए अपने को सार्थक नहीं पा रहा था .... शब्दों का चयन कैसे करूँ के कुछ लिखूं , आज भी जब लिख रहा हूँ तो शब्द जैसे मेरे जहाँ से फिसलते जा रहे है ... कुछ कहने के लायक तो हूँ ही नहीं ,.. कितनी की बुनियादी तरीके से गुरु जी ने अपने भाव पक्ष को रखा है सबके सामने दुनिया के सबसे संवेदनशील चीज के असंवेदनशीलता को .. बस इनको और इनके लेखनी को प्रणाम करता चलूँ... यही इक्षा है ....

आपका
अर्श

गौतम राजरिशी said...

एक कालजयी कृति।

जैसा कि ऊपर तिलक राज जी ने कहा है...सचमुच !

पहले भी जब गुरूदेव की ये आदमी सीरीज वाली कवितायें पढ़ी थी, तो अवाक रह गया था। सोचते-महसूसते त्प सब हैं लेकिन उन सोचों को यूं लय-प्रवाह में ढ़ाल कर कविता का रूप दे देना बस गुरूदेव जैसे माननिय कवियों के वश की बात है।

शुक्रिया महावीर जी इस प्रस्तुति के लिये।

रंजना said...

IS PAR TO AB KYA TIPPANI KARUN......

BAS MANTRAMUGDH HUN IS APRATIM ABHIVYAKTI PAR...

नीरज गोस्वामी said...

क्या कहूँ?..अद्वितीय...
नीरज

ashok andrey said...

vakei aadmee kee pehchaan ek samasyaa hai aakhir ise kaise barkraar rakkhaa jaae-
laar ganjaa saa phlaanaa aadmee.
yeh line hamee jhinjhor detee hai apnee hee pehchaan ke liye
adbhut rachnaa hai meree ore se badhai sweekaren

ashok andrey