
नव-वर्ष के शुभ अवसर पर नूतन वर्ष कवि-सम्मलेन का
आरम्भ वरिष्ठ ग़ज़लकार, कहानीकार और समीक्षक
प्राण शर्मा की ग़ज़ल से करते हैं:
पाकिस्तान से डॉ. ग़ुलाम मुर्तज़ा शरीफ़
नव वर्ष
नव वर्ष का स्वागत करो ,
भूलों का एहतेसाब करो ,
जो बीत गया , सो बीत गया ,
कल का सत्कार करो !
अपनी रूह को बेकरार करो ,
जज़्बात-ओ-ख्यालों का इज़हार करो ,
चुप रह कर सितम और भी बढ़ जाते हैं ,
कुछ तो बोलो खुदी से प्यार करो !
आज हर सिम्त उरयानी ही उरयानी है ,
बेहयाई फैशन बन के आई है ,
कल जो कोठे की थी जीनत,
आज घर घर में "कला" बन के छाई है !
उठो भोले-भाले गय्यूर जवानों
माओं-बहनों के सर की चादर संभालो ,
बचा लो बचा लो, बचा लो बचा लो ,
सिसकती हुई सभ्यता को बचा लो
डॉ. ग़ुलाम मुर्तज़ा शरीफ़
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आरम्भ वरिष्ठ ग़ज़लकार, कहानीकार और समीक्षक
प्राण शर्मा की ग़ज़ल से करते हैं:
साल नया है-
प्राण शर्मा
ढोल बजाओ ,धूम मचाओ ,साल नया है
क्यों ना ऐसा रंग जमाओ , साल नया है
खुल कर यारो हंसो-हंसाओ , साल नया है
चिंताओं से छुट्टी पाओ , साल नया है
इससे अब क्या लेना-देना मेरे यारो
यानी नफ़रत दूर भगाओ , साल नया है
मुँह लटकाए क्या बेठे हो मेरे यारो
झूमो, नाचो और लहराओ , साल नया है
आँखें क्या ,मन को भी ये सब बेहद भाये
यूँ अपना घर- बार सजाओ ,साल नया है
अपने को ही महकाया तो क्या महकाया
औरों को भी तुम महकाओ, साल नया है
अपना हो या हो बेगाना , याद करेगा
मुँह मीठा ए " प्राण " कराओ , साल नया है
प्राण शर्मा
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प्राण शर्मा
ढोल बजाओ ,धूम मचाओ ,साल नया है
क्यों ना ऐसा रंग जमाओ , साल नया है
खुल कर यारो हंसो-हंसाओ , साल नया है
चिंताओं से छुट्टी पाओ , साल नया है
इससे अब क्या लेना-देना मेरे यारो
यानी नफ़रत दूर भगाओ , साल नया है
मुँह लटकाए क्या बेठे हो मेरे यारो
झूमो, नाचो और लहराओ , साल नया है
आँखें क्या ,मन को भी ये सब बेहद भाये
यूँ अपना घर- बार सजाओ ,साल नया है
अपने को ही महकाया तो क्या महकाया
औरों को भी तुम महकाओ, साल नया है
अपना हो या हो बेगाना , याद करेगा
मुँह मीठा ए " प्राण " कराओ , साल नया है
प्राण शर्मा
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यू.के. से पुष्पा भार्गव
नव वर्ष अभिनन्दन
नव वर्ष अभिनन्दन
द्वार पर आहट हुई, लो
आज फिर नव वर्ष आया
गगनांचल को सजा कर
अर्ध रात्रि को लुभा कर
हर दिशा में गीत गा कर
आज फिर नव वर्ष आया नव
सृजन की साधना ले
शान्ति की सद्भावना ले
विश्व-सुख की कामना ले
आज फिर नव वर्ष आया
नई उमंगों को बिछा कर
आश के दीपक जला कर
कुछ नए सपने सजा कर
आज फिर नव वर्ष आया
मन क दृढ़ विशवास दे कर
डूबती नौका को खे कर
एक नया सन्देश ले कर
आज फिर नव वर्ष आया
आओ, अब छोड़ें सिसकना
खोले मन का द्वार अपना
द्वार पर आहट हुई, लो
आज फिर नव वर्ष आया
पुष्पा भार्गव
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नव वर्ष अभिनन्दन
नव वर्ष अभिनन्दन
द्वार पर आहट हुई, लो
आज फिर नव वर्ष आया
गगनांचल को सजा कर
अर्ध रात्रि को लुभा कर
हर दिशा में गीत गा कर
आज फिर नव वर्ष आया नव
सृजन की साधना ले
शान्ति की सद्भावना ले
विश्व-सुख की कामना ले
आज फिर नव वर्ष आया
नई उमंगों को बिछा कर
आश के दीपक जला कर
कुछ नए सपने सजा कर
आज फिर नव वर्ष आया
मन क दृढ़ विशवास दे कर
डूबती नौका को खे कर
एक नया सन्देश ले कर
आज फिर नव वर्ष आया
आओ, अब छोड़ें सिसकना
खोले मन का द्वार अपना
द्वार पर आहट हुई, लो
आज फिर नव वर्ष आया
पुष्पा भार्गव
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यू.के. से सोहन 'राही'
नव-वर्ष २०१० की शुभ-कामनाओं के साथ:
मिरे ख़्यालों को ईश्वर नए हवाले दे
मिरी क़लम की स्याही को कुछ उजाले दे !
तबाहियों के शिखर पर है दौर इन्सां का
जगाये नफ़रतें हर एक तौर इन्सां का
सरस्वती! मिरी तहज़ीब के अंधेरे को
मोहब्बतों में रची चांदनी के हाले दे
मिरी क़लम की स्याही को कुछ उजाले दे!
यह ख़ून रोती हुई अब के रोशनी क्या है
सितम की नोक पे लटकी यह ज़िंदगी क्या है
वरक़ वरक़ पे हैं दहशत की काली तहरीरें
मिरे ख़ुदा! हमें रोशन नज़र के भाले दे
मिरी क़लम की स्याही को कुछ उजाले दे!
सोहन 'राही'
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नव-वर्ष २०१० की शुभ-कामनाओं के साथ:
मिरे ख़्यालों को ईश्वर नए हवाले दे
मिरी क़लम की स्याही को कुछ उजाले दे !
तबाहियों के शिखर पर है दौर इन्सां का
जगाये नफ़रतें हर एक तौर इन्सां का
सरस्वती! मिरी तहज़ीब के अंधेरे को
मोहब्बतों में रची चांदनी के हाले दे
मिरी क़लम की स्याही को कुछ उजाले दे!
यह ख़ून रोती हुई अब के रोशनी क्या है
सितम की नोक पे लटकी यह ज़िंदगी क्या है
वरक़ वरक़ पे हैं दहशत की काली तहरीरें
मिरे ख़ुदा! हमें रोशन नज़र के भाले दे
मिरी क़लम की स्याही को कुछ उजाले दे!
सोहन 'राही'
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अमेरिका से लावण्या जी
'स्वागत नव वर्ष'
स्वागत नव वर्ष, है अपार हर्ष , है अपार हर्ष !
बीते दुख भरी निशा , प्रात : हो प्रतीत,
जन जन के भग्न ह्र्दय, होँ पुनः पुनीत
स्वागत नव वर्ष, है अपार हर्ष, है अपार हर्ष !
भेद कर तिमिराँचल फैले आलोकवरण,
भावी का स्वप्न जिये, हो धरा सुरभित
स्वागत नव वर्ष, है अपार हर्ष, है अपार हर्ष !
कोटी जन मनोकामना, हो पुनः विस्तिर्ण,
निर्मल मन शीतल हो , प्रेमानँद प्रमुदित
स्वागत नव वर्ष, है अपार हर्ष, है अपार हर्ष !
ज्योति कण फहरा दो, सुख स्वर्णिम बिखरा दो,
है भावना पुनीत, सदा कृपा करेँ ईश
स्वागत नव वर्ष, है अपार हर्ष, है अपार हर्ष !
- लावण्या
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'स्वागत नव वर्ष'
स्वागत नव वर्ष, है अपार हर्ष , है अपार हर्ष !
बीते दुख भरी निशा , प्रात : हो प्रतीत,
जन जन के भग्न ह्र्दय, होँ पुनः पुनीत
स्वागत नव वर्ष, है अपार हर्ष, है अपार हर्ष !
भेद कर तिमिराँचल फैले आलोकवरण,
भावी का स्वप्न जिये, हो धरा सुरभित
स्वागत नव वर्ष, है अपार हर्ष, है अपार हर्ष !
कोटी जन मनोकामना, हो पुनः विस्तिर्ण,
निर्मल मन शीतल हो , प्रेमानँद प्रमुदित
स्वागत नव वर्ष, है अपार हर्ष, है अपार हर्ष !
ज्योति कण फहरा दो, सुख स्वर्णिम बिखरा दो,
है भावना पुनीत, सदा कृपा करेँ ईश
स्वागत नव वर्ष, है अपार हर्ष, है अपार हर्ष !
- लावण्या
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भारत से डी.के. सचदेव 'मुफ़लिस'
नयी श्री , नए आसार , ओ साथी
सँवर जाने को हैं तैयार , ओ साथी
करें, मस्ती में हो सरशार, ओ साथी
नई इक सुबह का दीदार , ओ साथी
नया साल आये , तो ऐसा ही अब आये
मने हर दिल में इक त्यौहार , ओ साथी
हर इक आँगन में महकें आस के बूटे
सजे ख़ुशबू से हर घर-द्वार , ओ साथी
चलो, नफ़रत का हर जज़्बा मिटा कर हम
मुहोब्बत का करें इज़हार , ओ साथी
जियें इंसान सब इंसान ही बन कर
बहुत अब हो चुके अवतार, ओ साथी
करें कोशिश यही, हर ख़्वाब हो पूरा
मिले हर सोच को आकार , ओ साथी
लगन, मेहनत की राहें सख्त हैं, माना
कभी मानें नहीं हम हार , ओ साथी
करें 'मुफ़लिस' यही अब प्रार्थना मिल कर
चमन अपना रहे गुलज़ार , ओ साथी
डी.के. सचदेव 'मुफ़लिस'
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नयी श्री , नए आसार , ओ साथी
सँवर जाने को हैं तैयार , ओ साथी
करें, मस्ती में हो सरशार, ओ साथी
नई इक सुबह का दीदार , ओ साथी
नया साल आये , तो ऐसा ही अब आये
मने हर दिल में इक त्यौहार , ओ साथी
हर इक आँगन में महकें आस के बूटे
सजे ख़ुशबू से हर घर-द्वार , ओ साथी
चलो, नफ़रत का हर जज़्बा मिटा कर हम
मुहोब्बत का करें इज़हार , ओ साथी
जियें इंसान सब इंसान ही बन कर
बहुत अब हो चुके अवतार, ओ साथी
करें कोशिश यही, हर ख़्वाब हो पूरा
मिले हर सोच को आकार , ओ साथी
लगन, मेहनत की राहें सख्त हैं, माना
कभी मानें नहीं हम हार , ओ साथी
करें 'मुफ़लिस' यही अब प्रार्थना मिल कर
चमन अपना रहे गुलज़ार , ओ साथी
डी.के. सचदेव 'मुफ़लिस'
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यू.के. से कथाकार, कवि और समीक्षक तेजेंद्र शर्मा
नव वर्ष की पूर्व-संध्या पर
प्रत्येक नव वर्ष
की पूर्व-संध्या पर
लेता हूं नए प्रण
अपने को बदलने के
और
समाज को भी।
पचपन प्रण ले चुका हूं
लेकिन
प्रण रह गये प्रण ही
न जाने कब
बनेंगे ये प्रण
मेरे प्राण।
कितने अरबों प्रण
जुड़ जाते हैं
हर वर्ष‚ नववर्ष
के आने पर
और बह जाते हैं
नव वर्ष की पूर्व संध्या
पर बहती सुरा में।
डरता भी हूं
जब देखता हूं
मेरे प्रण
खड़े हैं
कतार के पीछे .
मॉरीशस‚ लंदन‚ सूरीनाम
के प्रस्ताव
या फिर दिल्ली सरकार
की योजना... उसके भी पीछे।
चाहता हूं
जीवन, जो बचा है
बिता सकूं
पहले लिए प्रणों को
कार्यान्वित करने
और उन्हें पूरा होते
देखने में।... भूल जाऊं
नये प्रण ।
तेजेंद्र शर्मा
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नव वर्ष की पूर्व-संध्या पर
प्रत्येक नव वर्ष
की पूर्व-संध्या पर
लेता हूं नए प्रण
अपने को बदलने के
और
समाज को भी।
पचपन प्रण ले चुका हूं
लेकिन
प्रण रह गये प्रण ही
न जाने कब
बनेंगे ये प्रण
मेरे प्राण।
कितने अरबों प्रण
जुड़ जाते हैं
हर वर्ष‚ नववर्ष
के आने पर
और बह जाते हैं
नव वर्ष की पूर्व संध्या
पर बहती सुरा में।
डरता भी हूं
जब देखता हूं
मेरे प्रण
खड़े हैं
कतार के पीछे .
मॉरीशस‚ लंदन‚ सूरीनाम
के प्रस्ताव
या फिर दिल्ली सरकार
की योजना... उसके भी पीछे।
चाहता हूं
जीवन, जो बचा है
बिता सकूं
पहले लिए प्रणों को
कार्यान्वित करने
और उन्हें पूरा होते
देखने में।... भूल जाऊं
नये प्रण ।
तेजेंद्र शर्मा
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कनाडा से समीर लाल ‘समीर’
देखा कैसे चल दिया, बिना कहे यह साल
देखा कैसे चल दिया, बिना कहे यह साल
बरसों बीते देखते, इसका ऐसा हाल...
अबकी उसके साथ था, मन्दी का इक दौर
लोग राह तकते रहे, मिल जाये कहीं ठौर
जाने कितनों को किया, उसने है बेहाल...
देखा कैसे चल दिया, बिना कहे यह साल....
सूखे ने दिखला दिया,महंगाई का नाच
पण्डित बैठा झूठ ही, रहा किस्मतें बांच
कहीं बाढ़ आती रही, खाने का आकाल
देखा कैसे चल दिया, बिना कहे यह साल....
मेहनत से हम न डरें, खुद पर हो विश्वास
विपदा से हम लड़ सकें, हिम्मत रखना पास
गुजर गया है जान लो, संकट का ये काल
देखा कैसे चल दिया, बिना कहे यह साल....
इक आशा हैं पालते, नये बरस के साथ
दे जाये हमको नई, खुशियों की सौगात
हाथों में लेकर खड़े, आरत का यह थाल
देखो वो है आ रहा, नया नवेला साल...
देखा कैसे चल दिया, बिना कहे यह साल
बरसों बीते देखते, इसका ऐसा हाल...
-समीर लाल ’समीर’
उड़न तश्तरी http://udantashtari.blogspot.com/
*********************************
देखा कैसे चल दिया, बिना कहे यह साल
देखा कैसे चल दिया, बिना कहे यह साल
बरसों बीते देखते, इसका ऐसा हाल...
अबकी उसके साथ था, मन्दी का इक दौर
लोग राह तकते रहे, मिल जाये कहीं ठौर
जाने कितनों को किया, उसने है बेहाल...
देखा कैसे चल दिया, बिना कहे यह साल....
सूखे ने दिखला दिया,महंगाई का नाच
पण्डित बैठा झूठ ही, रहा किस्मतें बांच
कहीं बाढ़ आती रही, खाने का आकाल
देखा कैसे चल दिया, बिना कहे यह साल....
मेहनत से हम न डरें, खुद पर हो विश्वास
विपदा से हम लड़ सकें, हिम्मत रखना पास
गुजर गया है जान लो, संकट का ये काल
देखा कैसे चल दिया, बिना कहे यह साल....
इक आशा हैं पालते, नये बरस के साथ
दे जाये हमको नई, खुशियों की सौगात
हाथों में लेकर खड़े, आरत का यह थाल
देखो वो है आ रहा, नया नवेला साल...
देखा कैसे चल दिया, बिना कहे यह साल
बरसों बीते देखते, इसका ऐसा हाल...
-समीर लाल ’समीर’
उड़न तश्तरी http://udantashtari.blogspot.com/
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भारत से ग़ज़लकार सतपाल ख़याल
नये साल की शुभकामनाएँ!
वक़्त ने फिर पन्ना पलटा है
अफ़साने में आगे क्या है?
घर में हाल बजुर्गों का अब
पीतल के वरतन जैसा है
कोहरे में लिपटी है बस्ती
सूरज भी जुगनू लगता है
जन्मों-जन्मों से पागल दिल
किस बिछुड़े को ढूँढ रहा है?
जो मांगो वो कब मिलता है
अबके हमने दुख मांगा है
रोके से ये कब रुकता है
वक़्त का पहिया घूम रहा है
आज "ख़याल" आया फिर उसका
मन माज़ी में डूब गया है
हमने साल नया अब घर की
दीवारों पर टांग दिया है
सतपाल ख़याल
******************
नये साल की शुभकामनाएँ!
वक़्त ने फिर पन्ना पलटा है
अफ़साने में आगे क्या है?
घर में हाल बजुर्गों का अब
पीतल के वरतन जैसा है
कोहरे में लिपटी है बस्ती
सूरज भी जुगनू लगता है
जन्मों-जन्मों से पागल दिल
किस बिछुड़े को ढूँढ रहा है?
जो मांगो वो कब मिलता है
अबके हमने दुख मांगा है
रोके से ये कब रुकता है
वक़्त का पहिया घूम रहा है
आज "ख़याल" आया फिर उसका
मन माज़ी में डूब गया है
हमने साल नया अब घर की
दीवारों पर टांग दिया है
सतपाल ख़याल
******************

अमेरिका से 'देवी' नागरानी
नया साल
नया साल इस साल शुभ ऐसा आए
जो निष्ठा से सरे जहाँ से निभाए
करे हमसे वादे नये कुछ तो वो भी
नमी आंख में साल भर फिर न आए
वो खुशहाली ऐसी दिलों में भरे,जो
अमन चैन की नीद तकियों को आए
जहाँ पर हो नफ़रत के खारों की बाढ़ी
वहीँ प्यार के अनगिनत गुल खिलाए
न हो दहशतें रक्सां देवी जहाँ पर
उसी सर ज़मीं को वो आंगन में लाए
देवी नागरानी
**********************
नया साल
नया साल इस साल शुभ ऐसा आए
जो निष्ठा से सरे जहाँ से निभाए
करे हमसे वादे नये कुछ तो वो भी
नमी आंख में साल भर फिर न आए
वो खुशहाली ऐसी दिलों में भरे,जो
अमन चैन की नीद तकियों को आए
जहाँ पर हो नफ़रत के खारों की बाढ़ी
वहीँ प्यार के अनगिनत गुल खिलाए
न हो दहशतें रक्सां देवी जहाँ पर
उसी सर ज़मीं को वो आंगन में लाए
देवी नागरानी
**********************
अमेरिका से श्री राकेश खंडेलवाल
'इस नये वर्ष का आओ स्वागत करें’
चाँदनी से बना अल्पना द्वार पर
इस नये वर्ष का आओ स्वागत करें
आस सपने नये आस के रच रही
कोई क्रम फिर न दुहराये गत वर्ष का
वो अनिश्चय, वो संशय की काली घटा
हर निमिष यों लगा युद्ध का पर्व था
अर्थ की नीतियों की जड़ें खोखली
फिर न रह पायें बीते दिनों की तरह
दीप विश्वास के प्रज्ज्वलित कर उगे
इस नये वर्ष की दीप्तिमय हो सुबह
आओ धुंधले पड़े जितने आकार हैं
रंग भर कर उन्हें इन्द्रधनुषी करें
कामना सज रही है ह्रदय में नई
इस नये वर्ष की भोर की रश्मियां
वॄष्टि बन कर सुधा की बरस जायें औ’
शांत हों हर तरफ़ जल रही अग्नियाँ
कर रही है विभाजित ह्रदय की गली
चन्द रेखायें दीवार जो खींचकर
भोर उनका तिमिर पी उजेरा करे
स्नह के एक संकल्प से सींचकर
आओ गत वर्ष की याद के पल उठा
विस्मृति के कलश में संजो कर भरें
इस नये वर्ष में फूल जो भी खिले
गंध केवल लुटाता रहे प्रीत की
रागिनी सरगमें छेड़ती बस रहे
फ़ाग की और मल्हार की गीत की
शब्द ओढ़ें नई भूमिका फिर लिखें
इक कथानक नया, एक अध्याय का
पंक्तियों में झलकता रहे आ जहां
भाव अपनत्व के सिर्फ़ पर्याय का।
आओ हर नैन के कैनवस पर यही
चित्र रंगीन हम मिलके चित्रित करें.
राकेश खंडेलवाल
*******************
'इस नये वर्ष का आओ स्वागत करें’
चाँदनी से बना अल्पना द्वार पर
इस नये वर्ष का आओ स्वागत करें
आस सपने नये आस के रच रही
कोई क्रम फिर न दुहराये गत वर्ष का
वो अनिश्चय, वो संशय की काली घटा
हर निमिष यों लगा युद्ध का पर्व था
अर्थ की नीतियों की जड़ें खोखली
फिर न रह पायें बीते दिनों की तरह
दीप विश्वास के प्रज्ज्वलित कर उगे
इस नये वर्ष की दीप्तिमय हो सुबह
आओ धुंधले पड़े जितने आकार हैं
रंग भर कर उन्हें इन्द्रधनुषी करें
कामना सज रही है ह्रदय में नई
इस नये वर्ष की भोर की रश्मियां
वॄष्टि बन कर सुधा की बरस जायें औ’
शांत हों हर तरफ़ जल रही अग्नियाँ
कर रही है विभाजित ह्रदय की गली
चन्द रेखायें दीवार जो खींचकर
भोर उनका तिमिर पी उजेरा करे
स्नह के एक संकल्प से सींचकर
आओ गत वर्ष की याद के पल उठा
विस्मृति के कलश में संजो कर भरें
इस नये वर्ष में फूल जो भी खिले
गंध केवल लुटाता रहे प्रीत की
रागिनी सरगमें छेड़ती बस रहे
फ़ाग की और मल्हार की गीत की
शब्द ओढ़ें नई भूमिका फिर लिखें
इक कथानक नया, एक अध्याय का
पंक्तियों में झलकता रहे आ जहां
भाव अपनत्व के सिर्फ़ पर्याय का।
आओ हर नैन के कैनवस पर यही
चित्र रंगीन हम मिलके चित्रित करें.
राकेश खंडेलवाल
*******************

भारत से डा. अहमद अली बर्क़ी आज़मी
'नया साल ख़ुशियोँ का पैग़ाम लाए'
नया साल ख़ुशियोँ का पैग़ाम लाए
ख़ुशी वह जो आए तो आकर न जाए
ख़ुशी यह हर एक व्यक्ति को रास आए
मोहब्बत के नग़मे सभी को सुनाए
रहे जज़बए ख़ैर ख़्वाही सलामत
रहैँ साथ मिल जुल के अपने पराए
जो हैँ इन दिनोँ दूर अपने वतन से
न उनको कभी यादे ग़ुर्बत सताए
नहीँ ख़िदमते ख़ल्क़ से कुछ भी बेहतर
जहाँ जो भी है फ़र्ज़ अपना निभाए
मुहबबत की शमएँ फ़रोज़ाँ होँ हर सू
दिया अमन और सुल्ह का जगमगाए
रहेँ लोग मिल जुल के आपस मँ ‘बर्क़ी’
सभी के दिलोँ से कुदूरत मिटाए
अहमद अली बर्क़ी आज़मी
************************
'नया साल ख़ुशियोँ का पैग़ाम लाए'
नया साल ख़ुशियोँ का पैग़ाम लाए
ख़ुशी वह जो आए तो आकर न जाए
ख़ुशी यह हर एक व्यक्ति को रास आए
मोहब्बत के नग़मे सभी को सुनाए
रहे जज़बए ख़ैर ख़्वाही सलामत
रहैँ साथ मिल जुल के अपने पराए
जो हैँ इन दिनोँ दूर अपने वतन से
न उनको कभी यादे ग़ुर्बत सताए
नहीँ ख़िदमते ख़ल्क़ से कुछ भी बेहतर
जहाँ जो भी है फ़र्ज़ अपना निभाए
मुहबबत की शमएँ फ़रोज़ाँ होँ हर सू
दिया अमन और सुल्ह का जगमगाए
रहेँ लोग मिल जुल के आपस मँ ‘बर्क़ी’
सभी के दिलोँ से कुदूरत मिटाए
अहमद अली बर्क़ी आज़मी
************************

भारत से कवि कुलवंत सिंह
नूतन वर्ष
समय का अविरल यतन, नव वर्ष तुझको नमन .
फैला कर बाहें कर रहे,
हम सभी स्वागत तेरा,
दे खुशी शाश्वत सभी को,
बस यही अभीष्ट मेरा .
अपने अपनों से न बिछुड़ें, शुरु कर दो यह प्रथा,
इसी मांग में मगन, नव वर्ष तुझको नमन .
किसान को अनाज हो,
मृत्यु का न हो वरण,
पुष्प में सुवास हो,
तितलियों का हो भ्रमण,
खुशी के गीत हर अधर, हो न जीवन में व्यथा,
पवन हो सुरभित चमन, नव वर्ष तुझको नमन .
पेट की भूख से अब,
प्रज्ज्वलित ज्वाला न हो,
आतंक और नक्सलों का,
देश पर साया न हो,
नव वर्ष सब को दिखाओ सुखमय जीवन की कथा,
विश्व में बस हो अमन, नव वर्ष तुझको नमन .
कवि कुलवंत सिंह
********************
नूतन वर्ष
समय का अविरल यतन, नव वर्ष तुझको नमन .
फैला कर बाहें कर रहे,
हम सभी स्वागत तेरा,
दे खुशी शाश्वत सभी को,
बस यही अभीष्ट मेरा .
अपने अपनों से न बिछुड़ें, शुरु कर दो यह प्रथा,
इसी मांग में मगन, नव वर्ष तुझको नमन .
किसान को अनाज हो,
मृत्यु का न हो वरण,
पुष्प में सुवास हो,
तितलियों का हो भ्रमण,
खुशी के गीत हर अधर, हो न जीवन में व्यथा,
पवन हो सुरभित चमन, नव वर्ष तुझको नमन .
पेट की भूख से अब,
प्रज्ज्वलित ज्वाला न हो,
आतंक और नक्सलों का,
देश पर साया न हो,
नव वर्ष सब को दिखाओ सुखमय जीवन की कथा,
विश्व में बस हो अमन, नव वर्ष तुझको नमन .
कवि कुलवंत सिंह
********************

यू.के.से डॉ. गौतम सचदेव
नया साल ?
बदल गई तारीख़ न बदले जीवन के सुर ताल ।
वही पुराने बैर लड़ाई पंच वही चौपाल ।।
वही पुराने तौर-तरीक़े वही पुरानी लीक ।
वही पुराने झगड़े-टंटे हुआ न कुछ भी ठीक ।।
करुणा प्रेम अहिंसा का है केवल झूठा शोर ।
हत्यारे हर ओर फिरें या मानव आदमख़ोर ।।
शमशानों में मुर्दे बिकते क़ब्रों में कंकाल
जानें तक बिक जाएँ, क्या है इनसानों की खाल।।
लोग न बदलें नीयत जब तक करें नहीं दिल साफ़ ।
नये बधाई सन्देशों से होगा क्या इन्साफ़ ।।
सिर्फ़ साल के पहले दिन ही दिखती नई उमंग ।
बाक़ी पूरा साल पुराने धंधे और कुढंग ।।
नये साल के पहले दिन ही नहीं करो संकल्प ।
जीवन के हर दिन को मानो सुन्दर नया विकल्प ।।
नया न अच्छा सभी पुराना सभी नहीं बेकार ।
अच्छा चुन लो दोनों में से करके सोच-विचार ।।*
(*अन्तिम दो पंक्तियाँ महाकवि कालिदास के सुभाषित से प्रेरित)
गौतम सचदेव
******************
नया साल ?
बदल गई तारीख़ न बदले जीवन के सुर ताल ।
वही पुराने बैर लड़ाई पंच वही चौपाल ।।
वही पुराने तौर-तरीक़े वही पुरानी लीक ।
वही पुराने झगड़े-टंटे हुआ न कुछ भी ठीक ।।
करुणा प्रेम अहिंसा का है केवल झूठा शोर ।
हत्यारे हर ओर फिरें या मानव आदमख़ोर ।।
शमशानों में मुर्दे बिकते क़ब्रों में कंकाल
जानें तक बिक जाएँ, क्या है इनसानों की खाल।।
लोग न बदलें नीयत जब तक करें नहीं दिल साफ़ ।
नये बधाई सन्देशों से होगा क्या इन्साफ़ ।।
सिर्फ़ साल के पहले दिन ही दिखती नई उमंग ।
बाक़ी पूरा साल पुराने धंधे और कुढंग ।।
नये साल के पहले दिन ही नहीं करो संकल्प ।
जीवन के हर दिन को मानो सुन्दर नया विकल्प ।।
नया न अच्छा सभी पुराना सभी नहीं बेकार ।
अच्छा चुन लो दोनों में से करके सोच-विचार ।।*
(*अन्तिम दो पंक्तियाँ महाकवि कालिदास के सुभाषित से प्रेरित)
गौतम सचदेव
******************

भारत से श्री अशोक आंद्रे
'हे ! नव वर्ष'
हे ! नव वर्ष
तुम्हारा स्वागत है मेरी देहलीज पर
जहां खड़े होकर दस्तक देने के लिए आओगे कल.
इन्तजार करता हूँ हर साल एक बेचैनी लिए
और सोचता हूँ कि
इस बार शायद कुछ नया हो ,
लेकिन गुजरते हुए समय के साथ
छोड़ जाते हो कुछ खालीपन.
घर के पास फैली झोपड़ियों से
छनकरआती आवाज घुटी -घुटी सी
चहलकदमी करती है मेरे कानो में
जहां निविड़ अन्धकार
उनके चित्रों को उकेरने में असफल हो जाते हैं .
क्योंकि हर साल उनके सपने
पैबंद लगे कपड़ों में दुबक कर
ऊंची - ऊंची अट्टालिकाओं के गिर्द
निःस्पंद हो जाते हैं .
मैं फिर भी अपनी देहलीज पर
ठीक दरवाजे के पीछे खड़ा .
तुम्हारा इन्तजार करता हूँ
विश्वास है कि तुम इस बार
उनके सपनो को साकार करोगे -
क्योंकि उनके सपनो में
मेरे भी कुछ सपने निहित पड़े
कुछ आकार लेने के लिए
कुलबुलाते रहते हैं तथा
तुम्हारे आगमन पर
विश्वास के नये घरोंदो का निर्माण करने लगते हैं .
हे नव वर्ष !
तुम्हारा स्वागत है इस बार एक निवेदन के साथ
ताकि पिछले वर्षों की तरह न आना
क्योंकि हमलोग उम्मीदों की झरी लगाये खड़े हैं तुम्हारे स्वागत में
हे नव वर्ष !
नये आकार देकर पल्लवित करने आओ सभी के सपनो को
ताकि उनके विश्वासों के घरोंदे बिखर न पाएं .
अशोक आंद्रे
************************
'हे ! नव वर्ष'
हे ! नव वर्ष
तुम्हारा स्वागत है मेरी देहलीज पर
जहां खड़े होकर दस्तक देने के लिए आओगे कल.
इन्तजार करता हूँ हर साल एक बेचैनी लिए
और सोचता हूँ कि
इस बार शायद कुछ नया हो ,
लेकिन गुजरते हुए समय के साथ
छोड़ जाते हो कुछ खालीपन.
घर के पास फैली झोपड़ियों से
छनकरआती आवाज घुटी -घुटी सी
चहलकदमी करती है मेरे कानो में
जहां निविड़ अन्धकार
उनके चित्रों को उकेरने में असफल हो जाते हैं .
क्योंकि हर साल उनके सपने
पैबंद लगे कपड़ों में दुबक कर
ऊंची - ऊंची अट्टालिकाओं के गिर्द
निःस्पंद हो जाते हैं .
मैं फिर भी अपनी देहलीज पर
ठीक दरवाजे के पीछे खड़ा .
तुम्हारा इन्तजार करता हूँ
विश्वास है कि तुम इस बार
उनके सपनो को साकार करोगे -
क्योंकि उनके सपनो में
मेरे भी कुछ सपने निहित पड़े
कुछ आकार लेने के लिए
कुलबुलाते रहते हैं तथा
तुम्हारे आगमन पर
विश्वास के नये घरोंदो का निर्माण करने लगते हैं .
हे नव वर्ष !
तुम्हारा स्वागत है इस बार एक निवेदन के साथ
ताकि पिछले वर्षों की तरह न आना
क्योंकि हमलोग उम्मीदों की झरी लगाये खड़े हैं तुम्हारे स्वागत में
हे नव वर्ष !
नये आकार देकर पल्लवित करने आओ सभी के सपनो को
ताकि उनके विश्वासों के घरोंदे बिखर न पाएं .
अशोक आंद्रे
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भारत से तिलक राज कपूर, 'राही' ग्वालियरी
मैनें अपनी ऑंख से देखा है गुज़रे साल में,
भेड़िये भी आ छुपे हैं, आदमी की खाल में।
एक चिड़िया फाँस ली उसने सुनहरी जाल में
क्या कहूँ वो छोड़कर उसको गया किस हाल में।
एक बिटिया खेलती थी, कल तलक अंगना में जो
जल गयी जिंदा वही, बनके बहू, ससुराल में।
कोई खिड़की की जरूरत ही नजर आती नहीं,
हर तरफ अब छेद इतने हो गये दीवाल में ।
सोच लें इक बार तो फिर ज़िद प अड़ जाते हैं ये,
पीछे हटने की तबीयत ना मिली अत्फ़ाल में।
एक गुब्बारे से क्या हासिल हुआ मत पूछिये
उसके ख़ुश होने पे दो गढ्ढे पड़े थे गाल में।
फ़ितरतन जयचंद हैं कुछ लोग तो इस देश में,
और कुछ नादॉं फँसे हैं, दुश्मनों की चाल में।
क्यूँ मुहब्बत औ इबादत छोड़कर हैं देखते
क्या सजाकर लोग लाये और है किस थाल में।
मौसमों की मार से कैसे बचाया था तना
व्यक्त करती सिलवटें हैं पेड़ की इस छाल में।
जानते थे आप कि कुछ साथ ना ले जायेंगे
फिर भी क्यूँ फँसते रहे, दुनिया के इस जंजाल में।
इक कलेवर फिर नया धारण किये वो आ गये
हमको कुछ ज्यादा ही काला दिख रहा है दाल में।
हम तो इक ‘राही’ बने, चलते रहे, सोचा नहीं,
क्या मिला, क्या न मिला, हमको गुज़श्ता साल में।
तिलक राज कपूर, 'राही' ग्वालियरी
******************************
मैनें अपनी ऑंख से देखा है गुज़रे साल में,
भेड़िये भी आ छुपे हैं, आदमी की खाल में।
एक चिड़िया फाँस ली उसने सुनहरी जाल में
क्या कहूँ वो छोड़कर उसको गया किस हाल में।
एक बिटिया खेलती थी, कल तलक अंगना में जो
जल गयी जिंदा वही, बनके बहू, ससुराल में।
कोई खिड़की की जरूरत ही नजर आती नहीं,
हर तरफ अब छेद इतने हो गये दीवाल में ।
सोच लें इक बार तो फिर ज़िद प अड़ जाते हैं ये,
पीछे हटने की तबीयत ना मिली अत्फ़ाल में।
एक गुब्बारे से क्या हासिल हुआ मत पूछिये
उसके ख़ुश होने पे दो गढ्ढे पड़े थे गाल में।
फ़ितरतन जयचंद हैं कुछ लोग तो इस देश में,
और कुछ नादॉं फँसे हैं, दुश्मनों की चाल में।
क्यूँ मुहब्बत औ इबादत छोड़कर हैं देखते
क्या सजाकर लोग लाये और है किस थाल में।
मौसमों की मार से कैसे बचाया था तना
व्यक्त करती सिलवटें हैं पेड़ की इस छाल में।
जानते थे आप कि कुछ साथ ना ले जायेंगे
फिर भी क्यूँ फँसते रहे, दुनिया के इस जंजाल में।
इक कलेवर फिर नया धारण किये वो आ गये
हमको कुछ ज्यादा ही काला दिख रहा है दाल में।
हम तो इक ‘राही’ बने, चलते रहे, सोचा नहीं,
क्या मिला, क्या न मिला, हमको गुज़श्ता साल में।
तिलक राज कपूर, 'राही' ग्वालियरी
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पाकिस्तान से डॉ. ग़ुलाम मुर्तज़ा शरीफ़
नव वर्ष
नव वर्ष का स्वागत करो ,
भूलों का एहतेसाब करो ,
जो बीत गया , सो बीत गया ,
कल का सत्कार करो !
अपनी रूह को बेकरार करो ,
जज़्बात-ओ-ख्यालों का इज़हार करो ,
चुप रह कर सितम और भी बढ़ जाते हैं ,
कुछ तो बोलो खुदी से प्यार करो !
आज हर सिम्त उरयानी ही उरयानी है ,
बेहयाई फैशन बन के आई है ,
कल जो कोठे की थी जीनत,
आज घर घर में "कला" बन के छाई है !
उठो भोले-भाले गय्यूर जवानों
माओं-बहनों के सर की चादर संभालो ,
बचा लो बचा लो, बचा लो बचा लो ,
सिसकती हुई सभ्यता को बचा लो
डॉ. ग़ुलाम मुर्तज़ा शरीफ़
*****************

आचार्य संजीव “सलिल”, भारत
शुभ कामनाएं सभी को...
शुभकामनायें सभी को, आगत नवोदित साल की.
शुभ की करें सब साधना,चाहत समय खुशहाल की..
शुभ 'सत्य' होता स्मरण कर, आत्म अवलोकन करें.
शुभ प्राप्य तब जब स्वेद-सीकर राष्ट्र को अर्पण करें..
शुभ 'शिव' बना, हमको गरल के पान की सामर्थ्य दे.
शुभ सृजन कर, कंकर से शंकर, भारती को अर्ध्य दें..
शुभ वही 'सुन्दर' जो जनगण को मृदुल मुस्कान दे.
शुभ वही स्वर, कंठ हर अवरुद्ध को जो ज्ञान दे..
शुभ तंत्र 'जन' का तभी जब हर आँख को अपना मिले.
शुभ तंत्र 'गण' का तभी जब साकार हर सपना मिले.
शुभ तंत्र वह जिसमें, 'प्रजा' राजा बने, चाकर नहीं.
शुभ तंत्र रच दे 'लोक' नव, मिलकर- मदद पाकर नहीं..
शुभ चेतना की वंदना, दायित्व को पहचान लें.
शुभ जागृति की प्रार्थना, कर्त्तव्य को सम्मान दें..
शुभ अर्चना अधिकार की, होकर विनत दे प्यार लें.
शुभ भावना बलिदान की, दुश्मन को फिर ललकार दें.
शुभ वर्ष नव आओ! मिली निर्माण की आशा नयी.
शुभ काल की जयकार हो, पुष्पा सके भाषा नयी..
शुभ किरण की सुषमा, बने 'मावस भी पूनम अब 'सलिल'.
शुभ वरण राजिव-चरण धर, क्षिप्रा बने जनमत विमल..
शुभ मंजुला आभा उषा, विधि भारती की आरती.
शुभ कीर्ति मोहिनी दीप्तिमय, संध्या-निशा उतारती..
शुभ नर्मदा है नेह की, अवगाह देह विदेह हो.
शुभ वर्मदा कर गेह की, किंचित नहीं संदेह हो..
शुभ 'सत-चित-आनंद' है, शुभ नाद लय स्वर छंद है.
शुभ साम-ऋग-यजु-अथर्वद, वैराग-राग अमंद है.
शुभ करें अंकित काल के इस पृष्ट पर, मिलकर सभी.
शुभ रहे वन्दित कल न कल, पर आज इस पल औ' अभी..
शुभ मन्त्र का गायन- अजर अक्षर अमर कविता करे.
शुभ यंत्र यह स्वाधीनता का, 'सलिल' जन-मंगल वरे..
आचार्य संजीव “सलिल”
*******************
शुभ कामनाएं सभी को...
शुभकामनायें सभी को, आगत नवोदित साल की.
शुभ की करें सब साधना,चाहत समय खुशहाल की..
शुभ 'सत्य' होता स्मरण कर, आत्म अवलोकन करें.
शुभ प्राप्य तब जब स्वेद-सीकर राष्ट्र को अर्पण करें..
शुभ 'शिव' बना, हमको गरल के पान की सामर्थ्य दे.
शुभ सृजन कर, कंकर से शंकर, भारती को अर्ध्य दें..
शुभ वही 'सुन्दर' जो जनगण को मृदुल मुस्कान दे.
शुभ वही स्वर, कंठ हर अवरुद्ध को जो ज्ञान दे..
शुभ तंत्र 'जन' का तभी जब हर आँख को अपना मिले.
शुभ तंत्र 'गण' का तभी जब साकार हर सपना मिले.
शुभ तंत्र वह जिसमें, 'प्रजा' राजा बने, चाकर नहीं.
शुभ तंत्र रच दे 'लोक' नव, मिलकर- मदद पाकर नहीं..
शुभ चेतना की वंदना, दायित्व को पहचान लें.
शुभ जागृति की प्रार्थना, कर्त्तव्य को सम्मान दें..
शुभ अर्चना अधिकार की, होकर विनत दे प्यार लें.
शुभ भावना बलिदान की, दुश्मन को फिर ललकार दें.
शुभ वर्ष नव आओ! मिली निर्माण की आशा नयी.
शुभ काल की जयकार हो, पुष्पा सके भाषा नयी..
शुभ किरण की सुषमा, बने 'मावस भी पूनम अब 'सलिल'.
शुभ वरण राजिव-चरण धर, क्षिप्रा बने जनमत विमल..
शुभ मंजुला आभा उषा, विधि भारती की आरती.
शुभ कीर्ति मोहिनी दीप्तिमय, संध्या-निशा उतारती..
शुभ नर्मदा है नेह की, अवगाह देह विदेह हो.
शुभ वर्मदा कर गेह की, किंचित नहीं संदेह हो..
शुभ 'सत-चित-आनंद' है, शुभ नाद लय स्वर छंद है.
शुभ साम-ऋग-यजु-अथर्वद, वैराग-राग अमंद है.
शुभ करें अंकित काल के इस पृष्ट पर, मिलकर सभी.
शुभ रहे वन्दित कल न कल, पर आज इस पल औ' अभी..
शुभ मन्त्र का गायन- अजर अक्षर अमर कविता करे.
शुभ यंत्र यह स्वाधीनता का, 'सलिल' जन-मंगल वरे..
आचार्य संजीव “सलिल”
*******************
भारत से प्रकाश सिंह "अर्श"
नव वर्ष पर...
नव आगमन शुभ आगमन
पुलकित है मन हर्षित चमन
तू भूल जा सब द्वेष को
अब छोड़ दे हर क्लेश को
मिल के सभी कर लें वरन
नव आगमन शुभ आगमन
प्रकाश सिंह "अर्श"
*********************************
नव वर्ष पर...
नव आगमन शुभ आगमन
पुलकित है मन हर्षित चमन
तू भूल जा सब द्वेष को
अब छोड़ दे हर क्लेश को
मिल के सभी कर लें वरन
नव आगमन शुभ आगमन
प्रकाश सिंह "अर्श"
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भारत से योगेन्द्र मौदगिल
नये साल के स्वागत में
दूरदर्शिनी स्वप्न-कथाएं, नये साल के स्वागत में.
घर-घर में फैशन चर्चाएं, नये साल के स्वागत में।
इंटरनेट-केबल लगवाएं, नये साल के स्वागत में.
कम्प्यूटर पर इश्क लड़ाएं, नये साल के स्वागत में।
जोगी, साधु, पंडित, मुल्ला, नेता, अभिनेता, वेश्या,
खुल कर खेलें, खुल कर खाएं, नये साल के स्वागत में।
दारू की मस्ती का आलम, देख दंग है दादा जी,
रोज शाम पोते घुड़काएं, नये साल के स्वागत में।
हमें पता है उनकी फितरत, धोखा, तिकड़म, मक्कारी,
दाएं-बाएं, दसों दिसाएं, नये साल के स्वागत में।
महंगाई ने सीना-सीना, छलनी-छलनी कर डाला,
घर-घर में अश्रुगाथाएं, नये साल के स्वागत में।
दया, धर्म, मोह, माया, ममता, गायब हुए ज़माने से,
अंधी पीसे, कुत्ते खाएं, नये साल के स्वागत में।
चोरी, हेराफेरी, दंगा, उत्पीड़न, देह का धंदा,
सीखें और सबको सिखलाएं, नये साल के स्वागत में।
संभव हो तो रखो, बचा कर, थोड़ी शर्म उजाले की,
अंधेरे आकर समझाएं नये साल के स्वागत में.
--योगेन्द्र मौदगिल
**********************
नये साल के स्वागत में
दूरदर्शिनी स्वप्न-कथाएं, नये साल के स्वागत में.
घर-घर में फैशन चर्चाएं, नये साल के स्वागत में।
इंटरनेट-केबल लगवाएं, नये साल के स्वागत में.
कम्प्यूटर पर इश्क लड़ाएं, नये साल के स्वागत में।
जोगी, साधु, पंडित, मुल्ला, नेता, अभिनेता, वेश्या,
खुल कर खेलें, खुल कर खाएं, नये साल के स्वागत में।
दारू की मस्ती का आलम, देख दंग है दादा जी,
रोज शाम पोते घुड़काएं, नये साल के स्वागत में।
हमें पता है उनकी फितरत, धोखा, तिकड़म, मक्कारी,
दाएं-बाएं, दसों दिसाएं, नये साल के स्वागत में।
महंगाई ने सीना-सीना, छलनी-छलनी कर डाला,
घर-घर में अश्रुगाथाएं, नये साल के स्वागत में।
दया, धर्म, मोह, माया, ममता, गायब हुए ज़माने से,
अंधी पीसे, कुत्ते खाएं, नये साल के स्वागत में।
चोरी, हेराफेरी, दंगा, उत्पीड़न, देह का धंदा,
सीखें और सबको सिखलाएं, नये साल के स्वागत में।
संभव हो तो रखो, बचा कर, थोड़ी शर्म उजाले की,
अंधेरे आकर समझाएं नये साल के स्वागत में.
--योगेन्द्र मौदगिल
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भारत से विजय सपत्ति
आया नव वर्ष
आया नव वर्ष ,आया आपके द्वार
दे रहा है ये दस्तक , बार बार !
बीते बरस की बातों को , दे बिसार
लेकर आया है ये , खुशियाँ और प्यार !
खुले बाहों से स्वागत कर ,इसका यार
और मान ,अपने ईश्वर का आभार !
आओ , कुछ नया संकल्प करें यार
मिटायें ,आपसी बैर ,भेदभाव ,यार !
लोगो में बाटें ,दोस्ती का उपहार
और दिलो में भरे , बस प्यार ही प्यार !
अपने घर, समाज, और देश से करें प्यार
हम सब एक है , ये दुनिया को बता दे यार !
कोई नया हूनर ,आओ सीखें यार
जमाने को बता दे , हम क्या है यार !
आप सबको ,है विजय का प्यारा सा नमस्कार
नव वर्ष मंगलमय हो ,यही है मेरी मंगलकामना यार !
आया नव वर्ष ,आया आपके द्वार
दे रहा है ये दस्तक , बार बार !
विजय सपत्ति
**********************
आया नव वर्ष
आया नव वर्ष ,आया आपके द्वार
दे रहा है ये दस्तक , बार बार !
बीते बरस की बातों को , दे बिसार
लेकर आया है ये , खुशियाँ और प्यार !
खुले बाहों से स्वागत कर ,इसका यार
और मान ,अपने ईश्वर का आभार !
आओ , कुछ नया संकल्प करें यार
मिटायें ,आपसी बैर ,भेदभाव ,यार !
लोगो में बाटें ,दोस्ती का उपहार
और दिलो में भरे , बस प्यार ही प्यार !
अपने घर, समाज, और देश से करें प्यार
हम सब एक है , ये दुनिया को बता दे यार !
कोई नया हूनर ,आओ सीखें यार
जमाने को बता दे , हम क्या है यार !
आप सबको ,है विजय का प्यारा सा नमस्कार
नव वर्ष मंगलमय हो ,यही है मेरी मंगलकामना यार !
आया नव वर्ष ,आया आपके द्वार
दे रहा है ये दस्तक , बार बार !
विजय सपत्ति
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भारत से सीमा गुप्ता
"अलविदा दोस्तों "
मै २००९
आज लेता हूँ
तुमसे विदा दोस्तों......
अलविदा अलविदा अलविदा दोस्तों
हो रहा हूँ मै तुमसे जुदा दोस्तों
अलविदा अलविदा ....
कितने आंसू दिए मैंने
सदमे दिए
सीने में उनकी करहाटे लिए
जा रहा हूँ मैं देके दुआ दोस्तों
अलविदा अलविदा ....
सिसकियों से भरी मैंने
राते सही,
जिनके उजड़े हैं घर उनकी
बाते सही
अब ना आऊंगा मुड के कभी दोस्तों
अलविदा अलविदा......
खुशियों से भरी सबको
दुनिया मिले
जिलमिलाते सितारों से
सबकी झोली भरे
आनेवाला हो वर्ष इतना शुभ दोस्तों
अलविदा अलविदा.....
अलविदा अलविदा अलविदा दोस्तों
सीमा गुप्ता
************************
"अलविदा दोस्तों "
मै २००९
आज लेता हूँ
तुमसे विदा दोस्तों......
अलविदा अलविदा अलविदा दोस्तों
हो रहा हूँ मै तुमसे जुदा दोस्तों
अलविदा अलविदा ....
कितने आंसू दिए मैंने
सदमे दिए
सीने में उनकी करहाटे लिए
जा रहा हूँ मैं देके दुआ दोस्तों
अलविदा अलविदा ....
सिसकियों से भरी मैंने
राते सही,
जिनके उजड़े हैं घर उनकी
बाते सही
अब ना आऊंगा मुड के कभी दोस्तों
अलविदा अलविदा......
खुशियों से भरी सबको
दुनिया मिले
जिलमिलाते सितारों से
सबकी झोली भरे
आनेवाला हो वर्ष इतना शुभ दोस्तों
अलविदा अलविदा.....
अलविदा अलविदा अलविदा दोस्तों
सीमा गुप्ता
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यू. के. से महावीर शर्मा
मिले हैं प्यार के आसार नूतन वर्ष में यारो
मिला दुश्मन भी जैसे यार नूतन वर्ष में यारो
मुहब्बत की नज़र से देखिये सारे ज़माने को
न हो फिर आपसी तक़रार नूतन वर्ष में यारो
कोई भूका कहीं भी हाथ फैलाए न सड़कों पर
न इन्सां हो कोई लाचार नूतन वर्ष में यारो
मिटा कर नफ़रतें दिल से बनाएं स्वर्ग धरती को
न होंगे हाथ में हथियार नूतन वर्ष में यारो
अधूरे रह गए हैं जो पुराने साल में सपने
उन्हीं को हम करें साकार नूतन वर्ष में यारो
ज़माना होगया देखे बिना बिछड़े हुए साथी
कहीं हो जायेगा दीदार नूतन वर्ष में यारो
महावीर शर्मा
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मिले हैं प्यार के आसार नूतन वर्ष में यारो
मिला दुश्मन भी जैसे यार नूतन वर्ष में यारो
मुहब्बत की नज़र से देखिये सारे ज़माने को
न हो फिर आपसी तक़रार नूतन वर्ष में यारो
कोई भूका कहीं भी हाथ फैलाए न सड़कों पर
न इन्सां हो कोई लाचार नूतन वर्ष में यारो
मिटा कर नफ़रतें दिल से बनाएं स्वर्ग धरती को
न होंगे हाथ में हथियार नूतन वर्ष में यारो
अधूरे रह गए हैं जो पुराने साल में सपने
उन्हीं को हम करें साकार नूतन वर्ष में यारो
ज़माना होगया देखे बिना बिछड़े हुए साथी
कहीं हो जायेगा दीदार नूतन वर्ष में यारो
महावीर शर्मा
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28 comments:
Wishing you sky…
…एक आसमान ...
And the shore . . .
.एक साहिल
Wishing you meadows…
…एक वादी
Where flowers galore…
महकती फूलों से
Wishing you company . .
प्रियजन का संग साथ
And solace . . .
और कुछ ..एकांत
Lots of happiness …
and lots of grace !
Wishing you sky…एक आसमान ...
And the shore . . .एक साहिल
Wishing you meadows…एक वादी
Where flowers galore… महकती फूलों से
Wishing you company . . .प्रियजन का संग साथ
And solace . . .और कुछ ..एकांत
Lots of happiness …
खुशियों का समंदर
और हसीं हुस्न की बहार
All this and more for you in New year and always. . .
And some more : )
ये सभी और भी बहुत सारा , इस नये साल में भी और हमेशा
हमारे सभी साथियों को नये साल के मंगल पर्व पर,
हार्दिक मंगल कामनाएं ......
आ. महावीर जी , प्राण भाई सा'ब, ...आभार आज जश्न की रात और ये महफ़िल
बस वल्लाह ................
सादर, स - स्नेह,
- लावण्या
दादा भाई बहुत ही सुंदर मेहफिल सजाई है । आपको और प्राण जी दोनों को ही ढेरों बधाई । मैं अपने को ही दोष देता हूं कि समय से सूचना होने के बाद भी कवि सम्मेलन में भाग नहीं ले पाया । व्यस्तता का बहाना नहीं करूंगा । क्योंकि व्यस्तता के बावजूद भी हम बाकी के काम तो करते ही हैं । मैं अपराधी हूं कि आपने मेरे नाम की घोषणा भी कर रखी थी फिर भी नहीं शामिल हो पाया । कवि सम्मेलन खूब जम रहा है । सारे कवि रंग में हैं । सभीको नये साल की ये मंगल कामनाएं कि नये साल में सभीकी क़लम में और जोर आये तथा साहित्य की सेवा इसी प्रकार करते रहें ।
आपको और आपके परिवार को नव वर्ष मंगलमय हो!
आपको और आपके परिजनों मित्रो को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाये... नया साल आपके लिए नयी नयी खुशियाँ ले कर आए ..... आप नयी नयी उचाईयों को छुए .....
regards
Adarneey mahavirji
aur Pran sharnma ji
Is nav varsh ki mehfil ko Gulashan-e-bahar ki tarah pesh karne ke liye aapka aabhar,
mangalkamnaon sahit
Devi Nangrani
AADARNIYA MAHAVEER JI AUR PRAN JI , AAPKO PRANAMM TATHA ANYA SAARE GURUJANO AUR MITRO KO NAMASKAR .
IS KAVITA GOSTHI ME ITNI ACHI KAVITAYE PADHNE KO MILI , JO HUM SAB KO NAYE VARSH KE AANAAD SE BHAR DETI HAI AUR EK UTSAAH SA CHA JAATA HAI JEEVNA KE PRATI ....
MAIN MERE PARIWAR KI TARAF SE AAP SABHI KO NUTAN VARSH KA ABHINANDAN KARTA HOON...
NAMASKAR
AAPKA
VIJAY
ई-कवि सम्मेलन का यह अभिनव प्रयोग और इसका सफलतापूर्वक संचालन बधाई के पात्र हैं।
ईश्वर से हृदय से प्रार्थना है कि इस वर्ष के अंत तक किसी पर भी कहने को यह न हो कि
'ज़माना होगया देखे बिना बिछड़े हुए साथी
कहीं हो जायेगा दीदार नूतन वर्ष में यारो'
इस वर्ष सबको दीदार हो बिछुड़े हुए साथियों का इन्हीं कामनाओं के साथ।
तिलक राज कपूर
sab ko naye saal ki mubarakbaad aur
Pran ji, Mahavir ji ko dhanyavaad is sam'melan me shaamil karne ke liye.
कोई भूका कहीं भी हाथ फैलाए न सड़कों पर
न इन्सां हो कोई लाचार नूतन वर्ष में यारो
aameen!!
SAB KEE RACHNAAYEN SUNDAR ,ATI
SUNDAR.SABKO BADHAAEE AUR SHUBH
KAMNA.
नये साल के साथ, बहुत खूब रंग जमा है...
हर कविता बोल रही है
इसे ही कहते हैं मंगलमयी शुरुवात
नये साल का कवित्तमय आगाज़!!
मजा आ गया..आपकी मेहनत रंग लाई.
आप सभी को एवं आपके परिवार को नव वर्ष की हार्दिक बधाई एवं अनेक शुभकामनाएँ.
सादर
समीर लाल
aadarniya Mahavir Sharma jee tathaa priya bhai Pran Sharma jee aapne milkar jis tarah iss nav varsh par sashakt dhang se kaveesammelan ka aayojan kiyaa hai veh vakeii adbhut evam kaabeele taareeph hai tathaa sabhee kaveeyon kee rachnaayen bhee apne ghehre bhaavon ke sath prastut hui hain mai aapko iss saphal aayojan ke liye badhai aur Nav varsh kee shubh kamnaaye detaa hoon
नए साल २०१० की
नयी सुबः को रौशन करने के लिए
सभी रचनाकारों ने आशा की
नयी किरणें बिखरा दी हैं
सभी ने पाक सन्देश दिए हैं ,,,
आह्वान किया है....
और...
इस शम्म-ए-फिरोज़ाँ की यह लौ
सारा साल झिलमिलाती रहे
यही दुआ करता हूँ
सम्माननीय महावीर जी का
अद्भुत, अनूठा , अनुपम प्रयास
बहुत ही सफल रहा .....
ढेरों बधाई
नये साल का आगाज़ इससे बेहतर और क्या हो सकता था...
नव-वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें, महावीर जी!
सुन्दर संकलन.
यहाँ उपस्थित सभी कवियों और पाठकों को भी नववर्ष मंगलमय हो!
श्रधेय महावीर जी और ग़ज़ल पितामह प्राण शर्मा जी को इस नव वर्ष पर इस अदना के तरफ से ढेरो बधाईयाँ और शुभकामनाएं , ऊपर वाला खूब बढ़िया सेहत बख्शे आप दोनों को ..
नव वर्ष पर इससे बेहतर शुरुआत की और क्या उम्मीद की जाए, दुनिया भर के उस्ताद शईरों के बिच मुझे रख कर आपने जो मेरा मान बढ़ाया है उसके लिए मैं रिनी हूँ... और आपका आभार ब्यक्त करता हूँ, इस सम्मलेन के शईरों और लेखको को मेरा सलाम और नव वर्ष की सप्रेम बधाईयाँ और शुभकामनाएं..
आपका
अर्श
वाह मुझे तो इस मुशायरे का पता ही नहीं छला आपका और आदर्णीय भाई प्राण शर्मा जी का ये प्रयास सराहणीय रहा। सभी
गज़लें और कवितायें बहुत सुन्दर हैं । सभी को बधाई
अभिनव
अनुकरणीय
सफल
सुन्दर प्रयास
सभी को नये साल की शुभकामनाएं
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद
तबाहियों के शिखर पर है दौर इन्सां का
जगाये नफ़रतें हर एक तौर इन्सां का
सरस्वती! मिरी तहज़ीब के अंधेरे को
मोहब्बतों में रची चांदनी के हाले दे
मिरी क़लम की स्याही को कुछ उजाले दे!
क्या कहने, अति सुन्दर !
बहुत अच्छी रचनाएं। नया साल मुबारक हो।
सरस, सफल सारस्वत अभियान हेतु साधुवाद.
नए वर्ष का
हर नूतन दिन
अमल-धवल यश
कीर्ति-विमल दे.
एक साथ इतनी शानदार रचनाएं, मजा ही आ गया।
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बारिश की वो सोंधी खुश्बू क्या कहती है?
क्या सुरक्षा के लिए इज्जत को तार तार करना जरूरी है?
बधाईयों का सिलसिला जारी रहे, नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं, सभी को बधाई !!!
नूतन वर्ष की इतनी धमाकेदार शुरुआत ........... बहुत ही देरी से आया ....... कुछ दिनों से नेट के संपर्क में नही था ........ पर इतनी बेहतरीन और लाजवाब रचनाओं को पूरा पढ़ने के बाद ही कुछ कहना चाहता था तो और भी देरी हो गयी ......... इतने सारे वरिष्ट और बेहतरीन रचनाकारों को एक मंच पर लाने का आपका भागीरथ प्रयास सफल हुवा ......... आपको बहुत बहुत धन्यवाद और मेरी शुभकामनाय ..........
सब रचनाएँ जैसे अलग अलग खुश्बू बिखेर रहीं है .......... अलग अलग रंग के इंद्रधनुष खिल रहें आज ब्लॉग पर ........ और इस आनंद में मैं गोते लगा रहा हूँ ..........
आपको नये साल की बहुत बहुत शुभकामनाएँ ..........
नूतन वर्ष कवि सम्मलेन में भाग लेने वाले सभी कवि-गण का 'महावीर' ब्लॉग आभार मानता है.
इतने सारे एक से बढ़कर एक अद्भुद रचनाओं के रसास्वादन ने मन आँखों को ऐसा तृप्त कर दिया है कि मन निःशब्द हो गया है.....प्रतिक्रिया के समस्त शब्द न जाने कहाँ जाकर छुप गए हैं....
इस अद्वितीय संकलन के प्रस्तुति के लिए कोटि कोटि आभार...
mahavir ji bahut bahut badhai ho nutan varsh ki is ghazal aur nutan varsh ke liye
कोई भूका कहीं भी हाथ फैलाए न सड़कों पर
न इन्सां हो कोई लाचार नूतन वर्ष में यारो
मिटा कर नफ़रतें दिल से बनाएं स्वर्ग धरती को
न होंगे हाथ में हथियार नूतन वर्ष में यारो.
in ash'ar ka to jawab nahin hai.
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 01 जनवरी 2022 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद! !
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