Tuesday, 26 January 2010

यू.के. के कवियों की रचनाओं की शृंखला में पुष्पा भार्गव की रचना - "प्रवासी"

गणतंत्र दिवस पर "महावीर" और "मंथन" की ओर से
शुभ कामनाएं

Indian Flag

प्रवासी


पुष्पा भार्गव


भारत मेरा देश है और मैं

था एक भारतवासी

अब कागज़ के टुकड़े कहते

मैं हूँ एक प्रवासी !

जिस मिट्टी से बनी यह काया

जिस धरती पर खेला

राम, बुद्ध की जन्म भूमि

जहँ लगे कुम्भ का मेला

जहँ गंग-जमुन जलधार बहे

मैं उसी देश का वासी

यह कागज़ के टुकड़े कहते

मैं हूँ एक प्रवासी !

बचपन याद दिलाये मुझे जो

था वः आँगन प्यारा

लन्दन की गलियों में खोजूँ

मैं अपना गलियारा

रोज़ रात सपनों में पहुँचू

मैं मथुरा व् काशी

यह कागज़ के टुकड़े कहते

मैं हूँ एक प्रवासी !

याद आयें सावन के झूले

बैठ के कजरी गाऊँ

देवकीनन्दन की गीता का

कर्मयोग अपनाऊँ

रहे सदा मेरी आँखें

भारत दर्शन की प्यासी

यह कागज़ के टुकड़े कहते

मैं हूँ एक प्रवासी !

समझ न पाया भारत जाकर

अदला-बदली यह कैसी

भारत में रह कर भी

भारतवासी बना विदेसी

खान-पान और रहन-सहन

फ़ैशन में देखो तेज़ी

अपनी भाषा छोड़ के बोले

हर बच्चा अंग्रेज़ी

यह विडम्बना देख देश की

मुझ को आती हाँसी

जब........यह कागज़ के टुकड़े कहते

मैं हूँ एक प्रवासी !

ऊँचे आदर्शों की चितवन

अमर प्रेम की ज्योती

जहाँ संतवाणी शान्ति की

माला सदा पिरोती

छोड़ के अपना देश बना मैं

आज एक बनवासी

यह कागज़ के टुकड़े कहते

मैं हूँ एक प्रवासी !

पुष्पा भार्गव, यू.के.

15 comments:

Udan Tashtari said...

दिल को छूती प्रवासी के हृदय के उदगार..बहुत बढ़िया.


गणतंत्र दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

KAVITA RAWAT said...

deshprem se ot-prot rachna, desh ke dard ko ujagar karti bolti kavita dil chhu gayee..
गणतन्त्र दिवस की शुभकामनायें

ashok andrey said...

kitni kashtdayak hoti hai isthiti jab kisi vaykti ki desh prem ki bhavnaa ko ek chhota sa kagaj ka tukdaa pravaasee ghoshit kar detaa hai kyonki veh kinheen vishesh pristhiti vansh oose videsh gaman karnaa pad jaata hai mai gantantr divas ke shubh avsar par unki iss dard bharee rachnaa ko salaam kartaa hoon ore oonke mun ki bhavnaa ko samajh saktaa hoon

दिगम्बर नासवा said...

दिल को छू रही है यह कविता .......... सत्य की बेहद करीब है ..........

आप सब को गणतंत्र दिवस की बहुत बहुत बधाई .........

"अर्श" said...

इस ब्यथा को मैं सिर्फ एक कविता नहीं कहूँगा ... जिस पीड़ा को इन्होने शब्दों के माध्यम से कविता रुपी कटोरे में रखा है झांकने में शक्ल सभी को अपनी अपनी नज़र आती है ... पुष्पा जी को सलाम मेरा ...



अर्श

shikha varshney said...

प्रवासी दिल कि व्यथा और भावनाएं उजागर करती उत्कृष्ट रचना.पुष्प जी !

PRAN SHARMA said...

PUSHPA BHARGAV JEE KEE KAVITA
" MAIN HOON EK PRAVAASEE" APNEE
SAHAJ ABHIVYAKTI SE HRIDAY KO
CHHOO GAYEE HAI.BAHUT-BAHUT BADHAAEE.

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

पुष्पा जी, आदाब
गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं
यह कागज़ के टुकड़े.....
चाहे कुछ भी कहते रहें...
लेकिन, आपके 'जज्बात' से साफ़ है..
कि...
'फ़िर भी दिल है हिन्दुस्तानी'.
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' said...

marmsparshee.

Devi Nangrani said...

आदरनीय महावीरजी, प्राण शर्मा जी तथा यु.के. के सभी रचनाकारों को मेरी हार्दिक बधाई. यह श्रंखला एक तरह से यु.के के साहित्यकारों से परिचय पाने का माध्यम है. अभी और कई जाने माने हस्ताक्षर हैं जो कड़ी से कड़ी बनकर जुड़ेंगे. आपका यह प्रयास साहित्य के जगत को एक नयी दिशा और पहचान दे पायेगा इसमें कोई शक नहीं.



पुष्पा भार्गव जी कहती हैं:

अब कागज़ के टुकड़े कहते

मैं हूँ एक प्रवासी !

**

डॉ. गौतम सचदेव का कहना :


आफतें बरसीं, गिरीं फिर संकटों की बिजलियाँ
था ज़माना बेमेहर घर छोड़कर जब हम चले


**

महावीर शर्मा जी का कथन:

प्रेम डगरिया ही ऐसी है जहां न लुटने का ग़म होगा
नयन सजल ढल जाएँ लेकिन अश्रु-कोष नहीं कम होगा
**

प्राण शर्मा जी की प्रेनात्मक सक्रियता:

मुँह लटकाए क्या बेठे हो मेरे यारो
झूमो, नाचो और लहराओ , साल नया है


सोहन 'राही' जी के विचारों में पाई पारदर्शी सोच:

मिरे ख़्यालों को ईश्वर नए हवाले दे
मिरी क़लम की स्याही को कुछ उजाले दे !

अब और इंतज़ार है इस सिलसिले की रौनक का

मंगल कामनाओं सहित

निर्मला कपिला said...

समझ न पाया भारत जाकर

अदला-बदली यह कैसी

भारत में रह कर भी

भारतवासी बना विदेसी

खान-पान और रहन-सहन

फ़ैशन में देखो तेज़ी

अपनी भाषा छोड़ के बोले

हर बच्चा अंग्रेज़ी

यह विडम्बना देख देश की

मुझ को आती हाँसी
पुश्पा जी की रचना एक प्रवासी की नहीं शायद सभी प्रवासोयों के दिल की आवाज है। बहुत सुन्दर रचना है उन्हें बहुत बहुत बधाई

तिलक राज कपूर said...

प्रश्‍न अनिवासी, प्रवासी, शरणार्थी आदि का न होकर सहज स्‍वीकार्यता का है। जब हमने सहज भाव से किसी स्थिति को स्‍वीकारा तो उस स्थिति का पूर्ण आनंद लेना ही श्रेयस्‍कर है। अगर कोई बाध्‍यता रही है तो भी उसे सहजता में परिवर्तित करना ही होगा अन्‍यथा बंधन का एहसास ही छटपटाहट का कारण बना रहेगा।
विदेश में कोई संबंधी होना एक सामान्‍य भारतीय के लिये आज भी गर्व की बात होती है (कुछ विपरीत उदाहरण हो सकते हैं) लेकिन विदेश से आने वाले संबंधी को आज तोहफों के कारण नहीं उसके प्रेम-स्‍नेह आदि के साथ जाना जाता है, उसके संस्‍कारों के लिये जाना जाता है। इस विषय में अधिकॉंश भारतवंशी भाग्‍यशाली हैं कि वे कितनी भी लंबी अवधि से विदेशों में हों अपने मूल संस्‍कारों से अलग नहीं हो पाये।
काग़ज़ के टुकड़े, कागज़ी पहचान के लिये हैं मन की पहचान के लिये मन।
पुष्‍पा भार्गव जी के चित्र को सतह पर देखें या गहराई से देखें पूरी तरह से एक भारतीय मॉं
समक्ष में है।
एक भारतीय मॉं की इस रचना को शत्- शत् प्रणाम।

kavi kulwant said...

Bharat bhumi se judi saarthak rachana..

महावीर said...

पुष्पा भार्गव जी की कविता में लिखे भाव हर प्रवासी पर लागू होते हैं जो किसी भी विदेश में रहते हों. पढ़कर दिल भर आता है:

ऊँचे आदर्शों की चितवन
अमर प्रेम की ज्योती
जहाँ संतवाणी शान्ति की
माला सदा पिरोती
छोड़ के अपना देश बना मैं
आज एक बनवासी
बहुत सुंदर.

'महावीर' ब्लॉग की टीम ऎसी सुन्दर रचना के लिए पुष्पा भार्गव जी के आभारी हैं.

संजय भास्कर said...

दिल को छू रही है यह कविता .......... सत्य की बेहद करीब है ..........