Saturday, 27 February 2010

रिफ़त शमीम की दो ग़ज़लें

गले से गले को लगाती रहे : लुभाती रहे मन सुहाती रहे
सदा होली रंगीं बनाती रही : सदा होली रंगीं बनाती रहे
प्राण शर्मा


यू.के. के कवियों की रचनाओं की शृंखला में "रिफ़त शमीम" की दो ग़ज़लें

रिफ़त शमीम
जन्म : अलीगढ़, यू.पी., भारत.
शिक्षा : आरंभिक शिक्षा अलीगढ़ में ही हुई और इसी बीच में माता पिता के साथ मुंबई आगये जहाँ जेविअर्स कॉलेज (मुंबई यूनिवर्सिटी) से उर्दू और अंग्रेज़ी भाषा में एम ए की डिग्रियां प्राप्त की. वह कहते हैं कि उन्हें शायरी का रोग लग गया था जिसका अभी तक कोई उपाय नहीं हो सका.
थियेटर, रेडियो और फ़िल्मी दुनिया : कॉलेज के दिनों में ही नाटक लिखे और प्रस्तुत किये. रेडियो सीलोन और कुछ एडवर्टाइज़िंग एजेंसियों में फ्रीलांस स्क्रिप्ट राईटिंग का काम किया. बाद में फ़िल्मी दुनिया में कालजयी प्रड्यूसर, डायरेक्टर, एक्टर गुरु दत्त फ़िल्म्स से जे जुड़ गए. अबरार अल्वी की अलहैदगी के समय उन्होंने राईटर की हैसियत से फ़िल्म स्क्रिप्ट पर काम किया. गुरु दत्त की मृत्यु के बाद रवेल प्रोडक्शन में डायलोग-राईटर के तौर पर काम करते रहे और "बदनाम फ़रिश्ते" के डायलोग लिखे. फ़िल्मी कल्चर रास न होने के कारण फ़िल्मी करियर से अलग होकर अपनी एडवर्टाइज़िंग कंपनी आरंभ करदी.
प्रवास : १९६८ में वह लन्दन चले गए, शादी के बाद फिर वहीं के हो कर रह गए.
साहित्यिक रचनाएँ : 'एक अंश धूप का" (काव्य-संग्रह), नाटकों की अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें से "यह ज़िंदगी यह तमाशे", "शीशे के खिलोने", "घर के चिराग़", दरवाज़ा खुला है", "कल देखेंगे" और "इस मंझदार में" लन्दन के अनेक उच्च श्रेणी के मंचों पर खेले जा चुके हैं. एक नाटक "Friendly Fire" सिंगापोर में खेला जारहा है. नाटकों के निर्देशन-क्षेत्र में भी आपका नाम सम्मान से लिया जाता है.
पश्चिम में रह कर भी वह अपनी भारतीय संस्कृति और विचारधारा को नहीं त्याग सके. उनकी रचनाओं में देस की मिट्टी की सुगंध को महसूस किया जा सकता है.


ग़ज़ल
रिफ़त शमीम

बीच दीवार है सो उस को गिरा देते हैं
दिल को अब उनकी गुज़र गाह बना देते हैं

घर बनाते हैं जो आशाओं का अपने दिल में
दिल के अंदेशे ही फिर उस को गिरा देते हैं

जीते रहते हैं यहाँ क़ैद में दीवारों की
बंद कमरे में ही दिन रात गंवा देते हैं

शाम होती है तो यादों के शनासा चेहरे
दिल के वीराने में मेला सा लगा देते हैं

कितनी शंकाओं के पर्दों में छुपे बैठे हैं
कब वो दुनिया को हक़ीक़त का पता देते हैं
******************************

किस के दर पर सदा लगाओगे
बे सदा घर सभी के पाओगे

ज़िंदगी सिलसिला है बरसों का
पल में यादों की भीड़ पाओगे

अब के बिखरा हूँ टूट कर ऐसे
जोड़ कर भी अधूरा पाओगे

इतने चेहरे लगाए फिरते हो
ख़ुद ही इक दिन फ़रेब खाओगे

तुम तो सोये हो रात ढलने तक
रात जागोगे और जगाओगे
रिफ़त शमीम
***********************

15 comments:

श्याम कोरी 'उदय' said...

इतने चेहरे लगाए फिरते हो
ख़ुद ही इक दिन फ़रेब खाओगे
.....बहुत खूब !!
घर बनाते हैं जो आशाओं का अपने दिल में
दिल के अंदेशे ही फिर उस को गिरा देते हैं
.......प्रभावशाली अभिव्यक्ति !!!

तिलक राज कपूर said...

रिफ़त साहब की ग़ज़ल समर्थन करती हैं इस बात का कि अच्‍छी ग़ज़ल कहने के लिये शब्‍दों के जाल में उलझना जरूरी नहीं। हर शब्‍द अपनी बात पूरी शिद्दत से कहता है अगर सही जगह हो।
दो शेर विशेष रूप से पसंद आये:

घर बनाते हैं जो आशाओं ...
और अब के बिखरा हूँ ....

सुभाष नीरव said...

शाम होती है तो यादों के शनासा चेहरे
दिल के वीराने में मेला सा लगा देते हैं

बहुत खूब !

ashok andrey said...

Riphat jee ki pehli gajal ne mere dil aur dimaag par gehraa asar kiya hei-
ghar banate hein jo aashaon ka apne dil men
dil ke andeshe hi phir uss ko giraa dete hein tathaa,
Jindagee silsila hei barson ka
pal men yaadon ki bheed paaoge.
oonki iss umdaa gajal ko padvaane ke liye mei aapka tathaa Riphat jee ka aabhar vayakt kartaa hoon bhavishya me bhee oonki aur oomda gajlen padne ko milengee

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

श्रद्धेय महावीर जी, सादर प्रणाम
सबसे पहले आप सभी को होली के पावन पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं
रिफ़त शमीम साहब की बेहतरीन ग़ज़लें पढ़वाने के लिये आभार...

बीच दीवार है सो उस को गिरा देते हैं
दिल को अब उनकी गुज़र गाह बना देते हैं...

कितनी शंकाओं के पर्दों में छुपे बैठे हैं
कब वो दुनिया को हक़ीक़त का पता देते हैं
बहुत खूब......

इतने चेहरे लगाए फिरते हो
ख़ुद ही इक दिन फ़रेब खाओगे...
वाह...वाह

PRAN SHARMA said...

DONON GAZALEN KHOOB KAHEE HAIN
SHAMEEM SAHIB NE.BAHUT-BAHUT BADHAAEE UNHEN.

Babli said...

आपको और आपके परिवार को होली पर्व की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!

Pushpa Bhargava said...

Vah Shamim ji,
Bahut sunder ghazals hain.
Aapki kalam chalti raheh tao
ghazlon ka bhandar barhega.
Happy Holi
Pushpa Bhargava

Anonymous said...
This comment has been removed by a blog administrator.
Mrs. Asha Joglekar said...

महावीर जी रिफ्त साहब की खूबसूरत गज़लें पठवाने का शुक्रिया ।
बीच दीवार है सो उस को गिरा देते हैं
दिल को अब उनकी गुज़र गाह बना देते हैं।
और ये
घर बनाते हैं जो आशाओं का अपने दिल में
दिल के अंदेशे ही फिर उस को गिरा देते हैं
बहोत खूब ।

निर्मला कपिला said...

कितनी शंकाओं के पर्दों में छुपे बैठे हैं
कब वो दुनिया को हक़ीक़त का पता देते हैं
शाम होती है तो यादों के शनासा चेहरे
दिल के वीराने में मेला सा लगा देते हैं
इतने चेहरे लगाए फिरते हो
ख़ुद ही इक दिन फ़रेब खाओगे...
दोनो गज़लें बहुत अच्छी लगी शमीम जी को बधाई । आपका धन्यवाद्

महावीर said...

जनाब रिफ़त शमीम साहब का 'महावीर' ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है.
नायाब अशार कहने वाले जनाब रिफ़त शमीम साहब को मेरा पुर-खुलूस आदाब. एक एक शेअर में दिली जज़्बात का इज़हार झलकता है. इन दोनों ख़ूबसूरत ग़ज़लों पर दिली मुबारकबाद क़बूल करें.

sunil gajjani said...

adar jog mahaveer saab,
sadar pranam
जीते रहते हैं यहाँ क़ैद में दीवारों की
बंद कमरे में ही दिन रात गंवा देते हैं
shameem saab ka har sher accha hai , maagar is shae ke liye oonko salaam .
,

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

महावीर जी, संवाद सम्मान के सम्बंध में आपसे आवश्यक बात करती है, कृपया मेरे मेल आई डी zakirlko@gmail.com पर सम्पर्क करने का कष्ट करें।

महावीर said...

जनाब रिफ़त शमीम साहब का "महावीर" ब्लॉग पर स्वागत है.
इतनी ख़ूबसूरत ग़ज़लें इनायत करने के लिए दिली दाद, मुबारक और शुक्रिया क़ुबूल कीजिएगा. आपकी ग़ज़लों को बार बार पढ़ा है और हर दफ़ा पहले से ज़्यादा लुत्फ़ आया. बहुत ही ख़ूबसूरत ख़यालात और रवा सुख़ून हैं. यूं तो दोनों ग़ज़लों के सारे ही अशाअर बहुत उम्दा हैं लेकिन नाचीज़ को ये अशाअर ख़ासतौर से पसंद आये:
घर बनाते हैं जो आशाओं का अपने दिल में
दिल के अंदेशे ही फिर उस को गिरा देते हैं

जीते रहते हैं यहाँ क़ैद में दीवारों की
बंद कमरे में ही दिन रात गंवा देते हैं
सच फ़रमाया है आपने!
ज़िंदगी सिलसिला है बरसों का
पल में यादों की भीड़ पाओगे

इतने चेहरे लगाए फिरते हो
ख़ुद ही इक दिन फ़रेब खाओगे
बहुत ख़ूब!
ख़ाकसार
महावीर शर्मा