Monday, 27 July 2009

अमेरिका से डॉ.सुधा ओम ढींगरा और लावण्या शाह की कविताएं


संक्षिप्त परिचय:
पंजाब के जालंधर शहर में जन्मी डॉ. सुधा ओम ढींगरा हिन्दी और पंजाबी की सम्मानित लेखिका हैं। वर्तमान में वे अमेरिका में रहकर हिन्दी
के प्रचार-प्रसार हेतु कार्यरत हैं।
प्रकाशित साहित्य: मेरा दावा है (काव्य संग्रह) ,तलाश पहचान की (काव्य संग्रह ) ,परिक्रमा (पंजाबी से अनुवादित हिन्दी उपन्यास), वसूली (कथा- संग्रह ), सफर यादों का (काव्य संग्रह), माँ ने कहा था (काव्य सी .डी ), पैरां दे पड़ाह , (पंजाबी में काव्य संग्रह ), संदली बूआ (पंजाबी में संस्मरण ), १२ प्रवासी संग्रहों में कविताएँ, कहानियाँ प्रकाशित।
सम्मान: अमेरिका में हिन्दी के प्रचार-प्रसार हेतु एवं सामाजिक कार्यों के लिए वॉशिंगटन डी.सी. में तत्कालीन राजदूत श्री नरेश चन्द्र द्वारा सम्मानित" और विभिन्न संस्थाओं द्वारा तथा हिंदी उत्सवों में "अक्षरम प्रवासी मीडिया सम्मान". "सर्वोत्तम कवियत्री २००६", "२००३ नागरिक अभिनन्दन" आदि अनेक सम्मानों से सम्मानित की
यीं हैं.

विस्तृत परिचय के लिए यहाँ क्लिक कीजिए:
डॉ. सुधा ओम ढींगरा

अच्छा लगता है ......
बचपन में,
गर्मियों की रातों में,
खुली छत पर
सफेद चादरों से
ढकी चारपाइयों पर
लेटकर किस्से- कहानियाँ सुनना
और तारों भरे आकाश में
सप्तऋषि और ध्रुव तारा ढूँढना
अच्छा लगता था......

चंद्रमा में छिपी आकृति
आकार लेती नज़र आती,
कभी उसकी माँ सूत कातती लगती
तो कभी हमारी दादी दिखती.
मरणोपरांत लोग तारे हो जाते हैं
बड़े- बूढ़ों की बात को सच मान
तारों में अपने बजुर्गों को ढूँढना
वो दादा, वो दादी और वो नानी को देखना
अच्छा लगता था......

विज्ञान,
बौद्धिक विकास
और भौतिक संवाद ने
बचपन की छोटी-छोटी
खुशियाँ छीन लीं.
बचपन का विश्वास
परिपक्वता का अविश्वास बन
अच्छा नहीं लगता है....

हर इन्सान में,
एक बच्चा बसता है.
अपनी होंद का एहसास दिला
कभी -कभी वह
बचपन में लौट जाने,
बचपन दोहराने को
मजबूर करता है.
वो मासूमियत, वो भोलापन
फिर से ओढ़ लेने को जी चाहता है.
तारों भरे आकाश में
बिछुड़ गए अपनों को फिर से
ढूँढना अच्छा लगता है.....

मेरे शहर में तारे,
कभी -कभी झलक दिखलाते हैं.
खुले आकाश में फैले तारों को,
हम तरस -तरस जाते हैं.
जब कभी निकलते हैं तो
फीकी सी मुस्कान दे इठलाते हैं.
पराये-पराये से लगते हैं,
फिर भी उनमें अपनों को
खोजना अच्छा लगता है.......


सुधा ओम ढींगरा

*********************

मेरी ग़लती से सुधा ओम ढींगरा जी की कविता अधूरी ही प्रकाशित हो गई थी

जिसके लिए मुझे खेद है। कविता अब ठीक कर दी गई है।

महावीर शर्मा

संक्षिप्त परिचय:
लावण्या शाह सुप्रसिद्ध कवि स्व० श्री नरेन्द्र शर्मा जी की सुपुत्री हैं और वर्तमान में अमेरिका में रह कर अपने पिता से प्राप्त काव्य-परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। समाजशा्स्त्र और मनोविज्ञान में बी.ए.(आनर्स) की उपाधि प्राप्त लावण्या जी प्रसिद्ध पौराणिक धारावाहिक "महाभारत" के लिये कुछ दोहे भी लिख चुकी हैं। इनकी कुछ रचनायें और स्व० नरेन्द्र शर्मा और स्वर-साम्राज्ञी लता मंगेशकर से जुड़े संस्मरण रेडियो से भी प्रसारित हो चुके हैं। इनकी एक पुस्तक "फिर गा उठा प्रवासी" प्रकाशित हो चुकी है जो इन्होंने अपने पिता जी की प्रसिद्ध कृति "प्रवासी के गीत" को श्रद्धांजलि देते हुये लिखी है।

उनके अपने ही शब्दों में परिचय के लिए यहाँ क्लिक कीजिए: "परिचय"
लावण्या जी की 'रेडियो-वार्ता' सुनने के लिए यहाँ क्लिक कीजिए:
Remembering Pt. Narendra Sharma

कौन ?
लावण्या शाह

( ये कविता - छवि, उषा और संध्या के नभ को समर्पित है -

संधि काल, जहां रात्रि और दिवस मिलते हैं, उसी से प्रेरित )

कौन वह,

दबे पाँव आती ?

गगन विहारिणी ,

सुन्दरी ,

मधू हास् का सौरभ ,

कम कम कण बरसाती ,

कौन है वह

सुन्दरी ?


उषा की लजाई लाली लिए,

कर पाश में ,

अमृत घट लिए,

छलकाती अम्बर पे

रागिनी ,

अल्हड, प्रीती - सी

उन्मादिनी ,

कौन है वह सुन्दरी ?


संध्या की

सजीली सेज पर ,

ह्रदय वीणा को

झंकृत किये,

ह्रदय के पाश

आकर खोलती ,

मधू भार

मुझ पर डालती ,

कौन ..वह,

सम्मोहिनी ?

लावण्य शाह

***********

अगला अंक: अगुस्त २००९
पंकज सुबीर का
एक मार्मिक गीत

25 comments:

ताऊ रामपुरिया said...

डॉ.सुधा ओम ढींगरा, लावण्या शाह जी, दोनों की ही लाजवाब रचनाओं के लिये आपको बहुत धन्यवाद. बहुत ही नायाब रचनाएं.

रामराम.

Dr. Sudha Om Dhingra said...

मेरी सारी कविता कट गई है, इसकी तो कोई सैंस नहीं बनती. जो मैं कहना चाहती हूँ वह तो आया ही नहीं है.

रूपसिंह चन्देल said...

सुधा ओम ढींगरा ’मुझे अच्छा लगता है’ और लावणया शाह की ’कौन’ सुन्दर रचनाएं हैं. सुधा जी का अमेरिका में छत की गर्मियों की रातों को याद करना स्वाभाविक लगा. प्रकृति के इतने सुन्दर चित्रण के लिए सुधा जी को बधाई . लेकिन कविता क्यों कट गयी यह स्पष्टीकरण शर्मा जी को देना चाहिए.

लावण्या जी की कविता का रिदम मोहता है.

पुनः दोनों कवयित्रियों को बधाई.

रूपसिंह चन्देल

तेजेन्द्र शर्मा said...

भाई महावीर जी

लावण्या जी की कविता के शब्दों से मैं सम्मोहति होता रहता हूं। आज की हिन्दी कविता शायद हिन्दुस्तानी कविता अधिक है।

सुधा जी की यह कविता मैनें पूरी पढ़ रखी है। शायद ठीक से अपलोड नहीं हो पाई। इस कविता में पूरी बात नहीं आ पाई है।

मुझे उम्मीद है कि सभी नेट-पाठकों को आप पूरी कविता पढ़वा देंगे।

तेजेन्द्र शर्मा
कथा यूके, लंदन

Udan Tashtari said...

सुधा जी रचना हमें भी बहा कर पने बचपन की छत पर ले गई-यही रचना की सफलता है:

जब कभी निकलते हैं तो
फीकी सी मुस्कान दे इठलाते हैं.
पराये-पराये से लगते हैं,
फिर भी उनमें अपनों को
खोजना अच्छा लगता है.......

-अद्भुत!! बधाई


लावण्या दी की रचना भी बहुत पसंद आई:

मधू भार

मुझ पर डालती ,

कौन ..वह,

सम्मोहिनी ?

-वाह!

Nirmla Kapila said...

लावण्या और सुधा जी को पहले भी पढ चुकी हूँ इनकी कलम हमेशा बांम्ध लेती है इन सुन्दर रचनाओं के लिये आभार्

सुशील कुमार said...

दोनो रचनायें अच्छी है। मन प्रसन्न हो गया।

पंकज सुबीर said...

आदरणीय महावीर भाई साहब मैं शब्‍दों में नहीं कह सकता कि आपने रक्षा बंधन के एक सप्‍ताह पूर्व दोनों बड़ी बहनों की कविताएं पढ़वा कर इस अनुज पर कितना उपकार किया है । दोनों ही मेरी बड़ी बहनें हैं । तथा दोनों को ही मैं दीदी कह कर पुकारता हूं और जीवन में बहन नहीं होने के उस दुख को जो अब तक था, कम होते महसूस करता हूं । कविताएं ऐसी हैं कि मुझे सीधे अपने उस छोटे में कस्‍बे में ले गईं जिसको बरसों पहले छोड़ दिया । जहां पर रात को आंगन में बिस्‍तर लगाते थे तो तारों भरा आसमान होता था । जहां पर संध्‍या को गायों के गले में बंधी घंटियों की आवाज से गोधुलि का समय गूंज उठता था । आज बरसों बाद उस छोटे से कस्‍बे की याद ये दोनों कविताएं पढ़ कर आ गई है और मन भारी हो गया है । अपनी दोंनों बहनों को प्रणाम और यही कि अपने अनुज पर स्‍नेह बनायें रखें । एक बार फिर से आपको भी प्रणाम इतनी सुंदर कविताएं पढ़वाने के लिये ।

महावीर said...

मेरी ग़लती से सुधा ओम ढींगरा जी की कविता अधूरी ही प्रकाशित हो गई थी

जिसके लिए मुझे खेद है। कविता अब ठीक कर दी गई है।

महावीर शर्मा

PRAN SHARMA said...

MAHAVIR JEE,
SUDHA JEE AUR LAVANYA JEE
DONO KO EK SAATH AAPKE BLOG PAR
DEKH KAR BAHUT ACHCHHA LAG RAHAA
HAI.DONO KEE KAVITAYEN PADHKAR
BADAA AANAND AAYAA HAI.AAPKA
BAHUT-BAHUT DHANYAWAAD.

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' said...

सुधा जी की कविता के लावण्य और लावण्य जी के कविता से छलकती सुधा एक साथ पाकर मन तृप्त हो गया. दोनों कवयित्रियों का कलाम कमाल का है. एक ने बचपन की स्मृतियाँ जीवंत कर दीं तो दूसरी ने उषा-संध्या से साक्षात् करा दिया. दोनों रचनाकारों और संपादकों को साधुवाद.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

आदरणीय महावीर जी ,
सादर प्रणाम,
आप से जोन स्नेह और अपनापन मिलता रहा है , मेरे लिए वह अमूल्य निधि है -
आप ने मेरी तथा बहन सुधा जी की कवितायेँ , आपके जाल घर पर देकर , फिर वही नेह नाता निभाया है
कृतग्य हूँ ...........
हिन्दी जगत के , साथीयों के यहां आने और अपने मन के भाव व्यक्त करने के लिए भी
ह्रदय से धन्यवाद कहती हूँ .........
विनीत,
- लावण्या

kavi kulwant said...

bahut achcha laga..aap dono ki kalam hindi sahitya ko smridha kar rahi hai..

HARI SHARMA said...

हिन्दी ब्लोग जगत की दो विशिष्ट कवियित्रियो़ की लावन्यमयी कविताओ़ की सुधा परोसकर आपने काव्यप्रेमियो़ को वेहतरीन उपहार दिया है.
सुधा जी की कविता मे़ एक ओर जहा बचपन के सजीव यादे़ है़ उनकी वर्तमान से तुलना है वही आज की निराशा के बाद भी आशा है. बहुत ही बेहतरीन कविता है ये.

लावन्य जी की कविता मे़ रुमानियत के प्रचलित बिम्बो को असाधारण कौशल और ताजगी के साथ प्रस्तुत किया है. बहुत बहुत बधाई.

योगेन्द्र मौदगिल said...

बेहतरीन प्रस्तुति सुधा जी और लावण्या जी को इन शब्दचित्रों के लिये बहुत बधाई

देवमणि पाण्डेय, मुम्बई से ई मेल द्वारा said...

'अच्छा लगता है' कविता के लिए डॉ.सुधा ओम ढींगरा को बधाई । उन्होंने बचपन की याद दिला दी । बचपन में हम भी सितारों को ऐसे ही देखते थे।

लावण्या जी की कविता ''कौन'' भी अच्छी लगी । यह देखकर अच्छा लगा की अपने पिताजी से काव्य भाषा उनको विरासत में मिली है । सन् 1988 में जब मैने कविता लिखना शुरू ही किया था तब मुम्बई के 'खार' उपनगर में एक मित्र के साथ पं.नरेंद्र शर्मा से मिलने गया था । उनकी सादगी और सरलता देखकर हम लोग दंग रह गए थे । कुछ समय बाद बिरला क्रीड़ा केन्द्र में उनके साथ कविता पढ़ने का भी सौभाग्य मिला जिसमें स्व.विद्यानिवास मिश्र और स्व.जगदीश गुप्त भी शामिल थे । यह बहुत प्रसन्नता की बात है कि लावण्या जी अपने पिताजी की रचनात्मक विरासत को आगे बढ़ा रही हैं ।

देवमणि पाण्डेय, मुम्बई

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

आदरणीय महावीर जी , आदरणीय पाण्डेय जी ,
तथा सौ. सुधा जी ,
सादर प्रणाम !
आपके जालघर पर , मेरी कविता पढ़कर , कई विद्वानों ने मेरे पूज्य पापा जी को याद किया है
ये सुनकर , मैं , गौरव और आनंद अनुभव कर रही हूँ -

पापा जी जैसा तो , मैं क्या लिखूँगी !
अगर , उनके आर्शीवाद से, और आप सब के प्रोत्साहन से , हमारी हिंदी के संग इसी तरह
जुडी रहूँगी तब भी अपने आपको ,
कृतार्थ समझूँगी ..........

आदरणीय, देवमणि जी,
आप पापा जी के घर
" खार " के आवास पर पधारे थे ,
ये सुनकर,
फिर वह घर , याद हो आया -
आपका कहना सर्वथा सही है
पापा जी और मेरी अम्मा, श्रीमती सुशीला नरेंद्र शर्मा , दोनों ही, भले मानुष थे --
सब के स्नेही , सदा सर्वथा संस्कारी , व सद` गृहस्थ ही रहे -
सादगी और सरलता ही उनके आभूषण थे - -

मेरे लिए , आज भी दोनों , ह्रदय में इस तरह बसे हुए हैं के मेरे भावों को ,
शब्दों से बयान करते , अकसर मैं, भावुक हो जाती हूँ .......

हां, आपका आभार प्रकट करती हूँ जो आपने पापा जी को याद किया और मुझे आशिष दीये हैं --

डाक्टर जयरामन जी ने भी कहा था एक बार ,
" पण्डित जी का खार का आवास हिन्दी जगत का तीर्थ - स्थान था '

आज उस घर में,
पापा जी तो नहीं रहे !
उनकी आत्मा भी अनंत पथ की और अग्रसर हो चुकी है -
मेरा छोटा भाई परितोष है वहीं पर -
और वह
पण्डित नरेंद्र शर्मा सम्पूर्ण " रचनावली " के प्रकाशनार्थ , कार्यरत है -

सुधा जी ,
आपकी कविता पढ़कर मुझे भी मेरे शैशव की स्मृति हो आयी -
इस नायाब तोहफे के लिए , सप्रेम शुक्रिया :)

आप सभी के इ मेल आ. महावीर जी ने लिख भेजे थे
अत: आप सभी को ,
एक साथ ही, मेल लिख रही हूँ ,
अब आज्ञा लेती हूँ,
सादर - स - स्नेह
विनीत,
- लावण्या

श्याम कोरी 'उदय' said...

... रचनाएँ प्रभावशाली व हृदय को छूने वाली हैं, बधाईंयाँ !!!

बलराम अग्रवाल said...

विज्ञान,
बौद्धिक विकास
और भौतिक संवाद ने
बचपन की छोटी-छोटी
खुशियाँ छीन लीं.
बचपन का विश्वास
परिपक्वता का अविश्वास बन
अच्छा नहीं लगता है....
सुधा ओम ढींगरा जी की इस कविता में निर्मलता और सहजता के खो जाने की व्यथा अपनी पूरी गहराई में उतरी है। लावण्या शाह की कविता छायावाद का सशक्त उदाहरण है। ऐसे गीत लिखना अब आसान नहीं रहा। दोनों ही कवयित्रियों को हार्दिक बधाई।

Devi Nangrani said...

संध्या की

सजीली सेज पर ,

ह्रदय वीणा को

झंकृत किये,

ह्रदय के पाश

atma ko parmatma se milne ke prayaas ki chatpatahat!!
ati Sunder abhivyakti Lavanya ke shabdon mein daad ke kabil!!!

Devi Nangrani

Devi Nangrani said...

Sudhaji

Is Materialistic world mein kahin koi kona hai jahan insaan admiyat ko bachakar

वो मासूमियत, वो भोलापन
फिर से ओढ़ लेने को जी चाहता है.
ji sakta hai to koi sahityakaar hi hoga jo apne ko bisrakaar apne kirdaron ko jeevit karte hue aise hi kuch pal ji leta ho!!
Devi Nangrani

Dr. Sudha Om Dhingra said...

आदरणीय महावीर जी,
आप की बहुत -बहुत आभारी हूँ कि आप ने अपने ब्लाग में हम दोनों सखियों को स्थान दिया. बलराम जी ने सही कहा है कि लावण्य जी की कविता छायावाद की याद दिलाती है, ऐसी कविता लिखना अब कठिन है. लावण्य जी, आप इसी तरह लिखती रहें. हृदय की गहराइयों से शुभकामनायें --बधाई! उनके साथ एक ही मंच पर आना मेरे लिए गर्व की बात है. हम दोनों को प्रोत्साहित करने के लिए आप का और सब साथियों का जिन्होंने ईमेल द्वारा अपनी प्रतिक्रियाएं भेजीं -धन्यवाद!

ashok andrey said...

sudha jee tatha lavanya jee ki rachnaen padin in khubsurat rachnaon ke liye badhai deta hoon hame kahin gehre tak chhuti hein adbhut
ashok andrey

Vijay Kumar Sappatti said...

mahaveer ji , dono kavitao ka rang chad gaya hai ji , kya baat hai , kya shaandaar lekhan hai , waaaaaaaaaaaah..

sudha ji aur lavanya didi , dono ke likhne ka andaaz bahut hi accha hai ..

badhai .

Mrs. Asha Joglekar said...

do bahut sunder kawitayen padhwane ke liye aapkea abhar. Sudha jee koPadh kar achpan men laut gaya tha man. aur Lawanya jee kee sundari to adbhut.