Sunday, 11 October 2009

महावीर शर्मा की ग़ज़ल और कविता

ग़ज़ल

ज़िन्दगी में प्यार का वादा निभाया ही कहां?
नाम लेकर प्यार से मुझ को बुलाया ही कहां?

टूट कर मेरा बिखरना, दर्द की हद से परे
दिल के आईने में ये मञ्ज़र दिखाया ही कहां ?

शीशा-ए-दिल तोड़ना है तेरे संग-ए-दर पे दोस्त
तेरे दामन पे लहू दिल का गिराया ही कहां ?

ख़त लिखे थे ख़ून से जो आंसुओं ने धो दिए
जो लिखा दिल के वरक़ पर, वो मिटाया ही कहां?

जो बनाई है तिरे काजल से तस्वीर-ए-जहाँ
पर अभी तो प्यार से उसको सजाया ही कहां ?

देखता है वो मुझे अब दुश्मन-ए-जाँ की तरह
दुश्मनी में भी मगर दिल से भुलाया ही कहां ?

ग़ैर की बाहों में था वो और मैं ख़ामोश था
संग दिल तू ने अभी तो आज़माया ही कहां?

जाम टूटेंगे अभी तो, सर कटेंगे सैंकड़ों
उसके चहरे से अभी पर्दा हटाया ही कहां ?
महावीर
शर्मा

**********************************************

यह कविता सन् १९६१ में लिखी गई थी।


यदि मेरा अधःपतन तेरे , जीवन का आधार बने तो,

स्वागत सौ सौ बार पतन का !

यदि जीवन के घोर शमन से, मानव का इतिहास बने तो,

स्वागत सौ सौ बार शमन का !


मैं ने देखे हैं वे मानव, ऊंचे महलों में रहते हैं,
बड़े गर्व से जिन्‍हें सभी ही , उद्योग-पति ही कहते हैं,
मखमल के फर्शों पर चलते, थकने का जिनको भान नहीं,
दानी और श्रीमान बिना, होता जिनका सम्मान नहीं,
धन की मदिरा में मस्त बने, आता न कभी विचार गमन का।

स्वागत सौ सौ बार पतन का !


वे मानव भी देखे मैं ने, जो फ़ुट पाथों पर रहते हैं,
नफ़रत से आंखें फेर जिन्हें, सब भिखमंगा ही कहते हैं,
पावों से रिसता रक्त भूख से आंखों में दम आता है,

बोल निकलता नहीं मगर, “बाबा पैसाचिल्लाता है,
मरने पर लाश पड़ी नंगी है, नहीं वहां कुछ काम कफ़न का!

स्वागत सौ सौ बार पतन का !!


यदि मेरा अधःपतन तेरे इस जीवन का आधार बने तो

स्वागत सौ सौ बार पतन का !

यदि जीवन के घोर शमन से, मानव का इतिहास बने तो,

स्वागत सौ सौ बार शमन का !


महावीर शर्मा

*********************

26 comments:

Udan Tashtari said...

गज़ल और कविता..दोनों को सौ सौ बार नमन! मन मोह लिया इस उम्दा प्रस्तुति ने.

रश्मि प्रभा... said...

जाम टूटेंगे अभी तो, सर कटेंगे सैंकड़ों ही
उसके चेहरे से अभी पर्दा हटाया ही कहां है?
......waah
jane kis kis ki maut aayi hai
aaj rukh par koi nakaab nahi

mehek said...

bahut sunder

गौतम राजरिशी said...

"जाम टूटेंगे अभी तो, सर कटेंगे सैंकड़ों ही / सके चेहरे से अभी पर्दा हटाया ही कहां है"...बहुत खूब सर!

स्वागत सौ-सौ बार पतन का....पढ़ कर आस-पास की एक सच्ची तस्वीर जो उभरती है तो मन वितृष्णा से भर उठता है। अपने पूरे लय-प्रवाह में एक बहुत ही अच्छी कविता!!

PRAN SHARMA said...

MAHAVIR SHARMA JEE JITNE ACHCHHE
GADYA LEKHAK HAIN UTNE ACHCHHE KAVI
BHEE HAIN.BAHUT DINON KE BAAD UNKA
KAVYA PADHNE KAA SUAVSAR MILAA HAI.
GAZAL AUR KAVITA DONO HEE SASHAKT
HAIN.1961 MEIN LIKHEE UNKEE KAVITA
AAJ BHEE NAYEE LAGTEE HAI.ACHCHHEE
KAVITA KABHEE PURANEE NAHIN HOTEE
HAI.ASHA HAI KI BHAVISHYA MEIN
MAHAVIR SHARMA JEE KEE ANYA
KAVITAAYEN PADHNE KO MILENGEE.N JAANE KAHAN-KAHAN UNHONNE APNEE
KAVITAAYEN CHHIPAKAR RAKHEE HAIN?
MAIN UNSE GUZAARISH KARTAA HOON KI
VE EK-EK KARKE APNEE SABHEE KAVITAYEN BLOG PAR LAGAAYEN.

परमजीत बाली said...

कविता और गजल दोनों बहुत बढिया लिखी हैं।पढ कर आनंद आ गया। धन्यवाद।

RC said...

Namaste,
Bahut achchi rachana !
देखता है वो मुझे अब दुश्मन-ए-जाँ की तरह
दुश्मनी में भी मगर दिल से भुलाया ही कहां ?

ग़ैर की बाहों में था वो और मैं ख़ामोश था
संग दिल तू ने अभी तो आज़माया ही कहां?

Yah sabse adhik pasand aaye.

जो बनाई है तिरे काजल से तस्वीर-ए-जहाँ
पर अभी तो प्यार से उसको सजाया ही कहां ?

Yeh wala sher ..... zara alagh laga.

Pranaam
RC

ashok andrey said...

aadarniya mahavir jee aapki dono rachnaon ne mun ko mohliya hai yadi mera adhe:patan tere iss jeevan ka aadhar bane to ,svaagat sou-sou baar patan kaa!
behtareen rachnaa hai aur gajal kaa bhee ek alag meejaaj jo gehre chhu jaata hai,
khat likhe the khoon se jo aansuon ne dho diye
jo likhaa dil ke varak par vo mitaaya hee kahaan
badhai sveekaren meri aur se


ashok andrey

रूपसिंह चन्देल said...

आदरणीय शर्मा जी

गज़ल और कविता - दोनों ही बहुत सार्थक लगीं.१९६१ की कविता की सचाई इतने वर्षों बाद भी नहीं बदली बल्कि बढ़ी ही है.आपकी रचनाएं पढ़कर अच्छा लगता है.

आभार

चन्देल

Dr. Ghulam Murtaza Shareef said...

यदि जीवन के घोर शमन से, मानव का इतिहास बने तो,
स्वागत सौ सौ बार शमन का !

महावीरजी,
गद्य एवं पद्य दोनों में महारत रखते हैं
यदि जीवन के घोर शमन से, मानव का इतिहास बने तो,
स्वागत सौ सौ बार शमन का !
अत्यधिक उच्च विचार हैं l
बधाई स्वीकार करें l

Nirmla Kapila said...

टूट कर मेरा बिखरना, दर्द की हद से परे
दिल के आईने में ये मञ्ज़र दिखाया ही कहां ?
और
देखता है वो मुझे अब दुश्मन-ए-जाँ की तरह
दुश्मनी में भी मगर दिल से भुलाया ही कहां ?

लाजवाब सुन्दर
यदि मेरा अधःपतन तेरे , जीवन का आधार बने तो,

स्वागत सौ सौ बार पतन का !

यदि जीवन के घोर शमन से, मानव का इतिहास बने तो,

स्वागत सौ सौ बार शमन का !
आपको भी इस कविता के लिये सौ बार नमन धन्यवाद ओस सुन्दत [रस्तुति के लिये

AlbelaKhatri.com said...

वाह वाह
बहुत खूब.............
आनन्द आ गया.........
बधाई !

Babli said...

इतना शानदार ग़ज़ल और कविता लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है ! बहुत खूब !

नीरज गोस्वामी said...

आदरणीय महावीर जी सादर प्रणाम...अभिभूत हूँ आपकी ग़ज़ल और गीत पढ़ कर क्या कहूँ कुछ शब्द ही समझ में नहीं आ रहे...अप्रतिम रचनाएँ हैं ये आपकी...आभार इन्हें हमें पढने का मौका दिया आपने...
नीरज

पंकज सुबीर said...

जाम टूटेंगे अभी तो, सर कटेंगे सैंकड़ों
उसके चहरे से अभी पर्दा हटाया ही कहां ?
इसे कहते हैं शेर । जो बात मैं नये सीखने वालों को लम्‍ब्‍ी लम्‍बी पोस्‍ट से सिखाना चाहता हूं वो काम एक ही शेर कर रहा है । ये उसी प्रकार का शेर है जिसके बारे में कहा जात है कि जिसमें शेरियत कूट कूट कर भरी होती है । इसको पढ़ने में और सुनने में दोनों में ही आनंद आयेगा । मिसरा सानी में जो ठसक है जो उन्‍माद है वो देखने लायक है । ये एक शेर ऐसा है जिसको लेकर मैं पूरा का पूरा एक अध्‍याय लिख सकता हूं । बहुत दिनों के बाद शेरियत से भरपूर शेर पढ़ने को मिला । एक ऐसा शेर जिसमें मस्‍ती है । वही लापरवाह की मस्‍ती जो ग़ालिब की मीर की ग़ज़लों में होती थी । मिसरा उला में कहने का जो अंदाज है वो सर चढ़ कर बोलने वाला है । दादा भाई मैं कई लोगों को कहता हूं कि एक मिसरा तो अमूमन हर ग़ज़लकार बहुत सुंदर बना लेता है लेकिन पूरा शेर नहीं बना पाता । या तो मिसरा उला कमज़ोर रहा जाता है या मिसरा सानी में कमी रह जाती है । बहुत कम होता है कि दोनों मिसरे बोलते हुए हों । आपका ये शेर उसी प्रकार का है इसके दोनों ही मिसरे बोल रहे हैं और अपने ही अंदाज़ में बोल रहे हैं । दादा भाई आज गीत की और ग़ज़ल के बाकी के शेरों की बात इसलिये नहीं कर रहा कि आज तो इस एक ही शेर के आनंद में खोया हूं । क्‍या लिख दिया ये आपने दादाभाई । अहा जाम टूटेंगे अभी तो, सर कटेंगे सैंकड़ों, उसके चहरे से अभी पर्दा हटाया ही कहां ?
अभी तो इसका ही आनंद लेनें दें । इसको रट लेने दें ताकि इसको कोट करने वाले स्‍थान पर कोट कर सकूं ।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

जाम टूटेंगे अभी तो, सर कटेंगे सैंकड़ों
उसके चहरे से अभी पर्दा हटाया ही कहां ?
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
ग़ज़ल के गुरुदेव
गुणी,
भाई श्री पंकज जी की बात
बिलकुल सही है
इस एक शेर ने ,
मन में ,
ना जाने कितनी कथा, कहानियों का इतिहास
सजीवन कर दिया है
मुझे तो इस वक्त -
अद्वितीय सुन्दरी ,
महारानी चितौड़ " पद्मिनी " याद आ रहीं हैं :-)
यही खूबसूरती है
जो एक पंक्ति से ,
आपके सामने ,
पूरा चलचित्र खडा कर दे !
आपने वही कमाल कर दिया है ..

ग़ज़ल और कविता दोनों ही
अपने अपने रंग में
उत्कृष्ट हैं ही ...
आदरणीय महावीर जी की लेखनी को
शत शत नमन -

आ. प्राण भाई साहब ने
सही फरमाया,
हमें
और भी पढ़वायें -- आपका लिखा -
प्रतीक्षा रहेगी ,
सादर, स - स्नेह,
- लावण्या

MUFLIS said...

नमस्कार
आपकी उम्दा तख्लिकात से नज़र नवाज़ हुआ
इतने बरस पहले लिखी गयी कविता आज भी उतनी hi सच्ची और उतनी ही सार्थक है ... जज्बे इंसानियत से भरपूर ....
पूरी कौम की राहनुमाई करती हुई
वक़्त और हालात की नब्ज़ को
पहचानती हुई एक कामयाब रचना

और आपकी ग़ज़ल तो सुभान अल्लाह ....

"देखता है वो मुझे अब दुश्मन ए जां की तरह
दुश्मनी में भी मगर दिल से भुलाया ही कहाँ .."

ग़ज़ल की कदीम उम्दा रिवायात की तर्जुमानी करता हुआ ये नायाब शेर
अपनी मिसाल खुद आप है
पूरी ग़ज़ल आपके तज्रबात की पुख्तगी की निशाँदेही करती है
मेरी जानिब से
पुर-अदब मुबारकबाद कुबूल फरमाएं
---मुफलिस---

haidabadi said...

महावीर साहिब
आज मुद्दत के बाद आपकी ग़ज़ल और कविता दोनों को पढ़ा
बहुत ख़ुशी हुई ग़ज़ल के सारे शेयर एक से बढ़के एक हैं
ज़हन को सकून देते हैं खुबसूरत ख़यालों को आपने खुबसूरत
लफ्जों से सजाया तराशा है जहाँ आपकी ग़ज़ल सच्चे ज़ज्बात की आईनादार
है वहां आपकी कविता में भी कभी कबार मुस्कराते हुए मिसरे दिखाई देते हैं
आपकी रचनायों में तजुर्बे की सदाकत और कल्पना की परवाज़
काबिले दाद है
हैं दुआएँ मेरे बजुर्गों की
मेरे चारों तरफ उजाले हैं

चाँद शुक्ला हदियाबादी
डेनमार्क

Mrs. Asha Joglekar said...

Bahut badhiya gazal aur utanee hee dard bbharee kawita. Dhanyawad ise padhane ka.

Pushpa Bhargava said...

bahut sunder rachna ke lie
bhut,bhut aabhar.

Pushpa Bhargava

Suman said...

nice

Dr. Ahmad Ali Barqi Azmi said...

महावीर शर्मा जी
आदाब
हैँ यह अशआर वक़्त की आवाज़
जिन मेँ है ज़िंदगी का सोज़ो साज़

पेश करता हूँ मैँ मुबारकबाद
है बहुत ख़ूब आपका अंदाज़

डॉ.अहमद अली 'बर्क़ी आज़मी

आचार्य संजीव 'सलिल' - ई मेल द्वारा said...

गीत और गजल की यह जुगलबन्दी आदरणीय महावीर शर्मा जी की सृजन क्षमता की परिचायक है. बधाई.
Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.coms

Dr. Sudha Om Dhingra said...

बहुत बढ़िया ग़ज़ल और कविता पढ़ने को मिलीं--
पंकज भाई से सहमत हूँ ग़ज़ल के शे'र को लेकर.
लावण्या जी से सहमत हूँ इसकी चित्रात्मक अभिव्यक्ति से.एक अरसे बाद खूबसूरत रचनाएँ पढीं...

देवी नागरानी said...

:ई मेल द्वारा:

महावीर जी बहुत ही उम्दा शेर है..पड़ते ही कुछ अंदर नम सा हुआ !!
शीशा-ए-दिल तोड़ना है तेरे संग-ए-दर पे दोस्त
तेरे दामन पे लहू दिल का गिराया ही कहां ?
देवी नागरानी

Vijay Kumar Sappatti said...

aadaarniy mahaveer ji

namaskaar

deri se aane ke liye khama chahunga ...

gazal maine kiyni baar padhi kya kahun .. pyaar ka aisa rang bhara hai aapne ki mere paas shabd nahi hai ,kuch kahne ko ..

har sher kuch kahta hai aur man ke bheetar tak jaakar pyaar ke sukh -dukh ki aahat deta hai ..

main abhi bhoot hoon is gazal se..

kavita jo ki itni purani likhi gayoi hai par aaj bhi ,aaj ke yug ki katha kahti hai ..main nishabd hoon aapki lekhni par sir..

mera naman hai aapki lekhni ko ..

pranaam

vijay