Sunday, 8 November 2009

महावीर शर्मा की दो ग़ज़लें

ग़ज़ल
अदा देखो, नक़ाबे-हुस्न वो कैसे उठाते हैं,
अभी तो पी नहीं हम ने, क़दम क्यों डगमगाते हैं?

ये अब अंदाज़ तो देखो त'आल्लुक तोड़ कर भी वो
हमारे दिल का ख़ूँ करके, वो मेहंदी भी रचाते हैं


हमें मञ्ज़ूर है गर, ग़ैर से भी प्यार हो जाए,
कमज़कम सीख जाएंगे कि दिल कैसे लगाते हैं।

सुना है आज वो हम से ख़फ़ा हैं, बेरुख़ी भी है,
नज़र से फिर नज़र हर बार क्यों हम से मिलाते हैं?

हमारी क्या ख़ता है, आज जो ऐसी सज़ा दी है,
ज़रा सा होश आता है मगर फिर भी पिलाते हैं

निगाहे-नाज़ से अब आग कुछ ऎसी लगा दी है
बुझे ना ज़िन्दगी भर, रात दिन दिल को जलाते हैं


वफ़ा के इम्तिहां में जान ली, ये भी नहीं देखा
वो मेरी लाश के पहलू में खंजर भूल जाते हैं।


महावीर शर्मा
***************************



याद जब आई कभी, आंसू निकल कर बह गये
क्या कहें इस दिल की हालत, शिद्दते-ग़म सह गए

गुफ़्तगू में फूल झड़ते थे किसी के होंट से
याद उनकी ख़ार बन, दिल में चुभो के रह गए

जब मिले मुझ से कभी, इक अजनबी की ही तरह
पर निगाहों से मिरे दिल की कहानी कह गये।


प्यार के थे कुछ लम्हे, यादों के नग़मे बन गए
वो ही नग़मे साज़े-ग़म पर गुनगुना कर रह गए

दो क़दम ही दूर थे, मंज़िल को जाने क्या हुआ
फ़ासले बढ़ते गये, नक्शे-क़दम ही रह गए


दिल के आईने में उसका, सिर्फ़ उसका अक्स था
शीशा--दिल तोड़ डाला, ये सितम भी सह गए

ख़्वाब में दीदार हो जाता तेरी तस्वीर का
नींद भी आती नहीं, ख़्वाबी-महल भी ढह गये।
महावीर शर्मा

अगला अंक: १५ नवम्बर २००९
यू.के. से वरिष्ठ ग़ज़लकार, समीक्षक, कहानीकार 'प्राण शर्मा' की दो ग़ज़लें

43 comments:

PRAN SHARMA said...

SHRI MAHAVIR JEE KEE GAZALON KO
PADHNA SUKOON KO HAASIL KARNA HAI.
GAZAL KE HAR SHER KAA MISRA MUN
MEIN KHOOSHBOO BHAR DETAA HAI.
UNKEE DONO GAZALEN LAJAWAAB HAIN.
JITNEE TAAREEF KEE JAAYE,KAM HAI.

AlbelaKhatri.com said...

हमेशा की तरह
उम्दा
बेहतरीन और शानदार ग़ज़लें........

मुबारक !

पंकज सुबीर said...

आदरणीय दादा भाई सादर प्रणाम । सबसे पहले तो क्षमा चाहता हूं कि पिछली कुछ रचनाओं को पढ़ने के बाद भी व्‍यस्‍तता के चले टीप नहीं कर पाया । देवी नागरानी जी की ग़ज़लें, लघ्‍़ाकथाएं और दिव्‍या माथुर जी की ग़ज़लें ये सब पढ़ ली थीं लेकिन समयाभाव के चलते विस्‍तार से टिपपणी नहीं कर पाया । केवल ये लिख कर चलते बनना कि वाह बहुत खूब लिखा , वो मुझे ठीक नहीं लगता है ।
नाज़ु‍क और नफासत से भरी शायरी पढऩे के लिये आपकी और प्राण साहब की ग़ज़लों से अच्‍छी कोई जगह नहीं है । बात को सलीके से कहना और तरीके से भी कहना ये आपकी और प्राण साहब की ग़ज़लों से सीखा जा सकता है । जैसे हमें मन्‍जूर है गर गैर से भी प्‍यार हो जाये कमज़कम सीख जाएंगे कि दिल कैसे लगाते हैं । उफ क्‍या सलीके से और नाजुक शब्‍दों से बात कही है । इसे ही तो कहते हैं देखन में छोटे लगें घाव करें गम्‍भीर । या फिर वफा के इम्तिहां में जान ली ये भी नहीं देखा वो मेरी लाश के पहलू में खंजर भूल जाते हैं ।
रह गए रदीफ काफिये की जुगलबंदी पर बहुत कम प्रयोग किया जा सकते हैं । क्‍योंकि संभावनाएं कम हैं काफिये दोहराने ही पड़ेंगें । जैसे निकाह की ग़ज़ल दिल के अरमां आंसुओं में बह गए में भी रह गए का प्रयोग दो बार हुआ है । आपने भी रह गए काफिये का प्रयोग तीन बार किया है किन्‍तु हर बार नये रूप में होने के कारण लगता ही नहीं कि दोहराव हो रहा है । ये आपके जैसे उस्‍ताद शायर की लेखनी ही कर सकती है ।

दिगम्बर नासवा said...

आदरणीय महावीर जी .... नमस्कार
आपकी लाजवाब, खूबसूरत शायरी से इतना कुछ सीखने को मिलता है की बयान नहीं कर सकते ......... शेरों का मज़ा तो अलग है ................. ग़ज़ल की बारीकियां भी जानने को मिलती हैं .......

Murari Pareek said...

दोनों ही रचनाए बहुत ही खुबसूरत हैं !!! दिल को दुखी करने वाली !! आज दर्द के सिवा जमाने में है ही क्या !!!! यही कारन है की ज्यादातर रचनाए !!! सनम की बेवफाई से सरोबार होती हैं !!!

Kavi Kulwant said...

arew ah asahab.. bahut dino baad aap ko bhi padhane ko mila aap ke blog par..

अजित वडनेरकर said...

हमें मन्‍जूर है गर गैर से भी प्‍यार हो जाये
कमज़कम सीख जाएंगे कि दिल कैसे लगाते हैं

शानदार ग़ज़ल....

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' said...

आत्मीय महावीर जी की दोनों रचनाएँ जानदार शायरी की मिसाल हैं. 'इम्तिहां' में 'न' की ध्वनी छिपी है इसलिए मेरे विचार से चन्द्र बिंदी न होकर केवल बिंदी होना चाहिए. शायद यह टंकण की त्रुटि है. ध्यानाकर्षण का उद्देश्य मात्र यह है कि आप उस्ताद शायर की रचना को देखकर मुझ जैसे नवसिखिया नकल किया करते हैं.

गज़लों का हर शेर एक से बढ़कर एक है. आप व् प्राण जी का अंदाजे-बयां ही औरों से जुदा है. साधुवाद.

रश्मि प्रभा... said...

aapki lekhni mann par ek amit prabhaw chhod jati hain

नीरज गोस्वामी said...

उस्तादों की शायरी पर कुछ कहूँ इतनी समझ खुदा ने अभी तक अता नहीं की...पढ़ रहा हूँ और गुण रहा हूँ...लगातार...
नीरज

रूपसिंह चन्देल said...

अभी तो पी नहीं हम ने, क़दम क्यों डगमगाते हैं?

बहुत सुन्दर गज़लें हैं शर्मा जी.

बधाई.

चन्देल

venus kesari said...

वफ़ा के इम्तिहां में जान ली, ये भी नहीं देखा
वो मेरी लाश के पहलू में खंजर भूल जाते हैं।


वाह वाह क्य खूब शेर............माशाअल्लाह

वीनस केशरी

Devi Nangrani said...

आदरणीय महावीरजी की शानदार गज़ल के मतले से नज़र उठी तो हर शेर कि रवानी अपने रौ में बहती रही.

शब्दों कि बुनावट और कसावट में एक शिल्पी के तराशने का फन नज़र आया,
अदा देखो, नक़ाबे-हुस्न वो कैसे उठाते हैं,
अभी तो पी नहीं हम ने, क़दम क्यों डगमगाते हैं?
वाह !!!!!!!!

यूं तराशा है उसको शिल्पी ने
जान सी पड़ गयी शिलाओं में

देवी नागरानी

neera said...

वफ़ा के इम्तिहां में जान ली, ये भी नहीं देखा
वो मेरी लाश के पहलू में खंजर भूल जाते हैं।

क्या खूब कहा है!

Udan Tashtari said...

दो क़दम ही दूर थे, मंज़िल को जाने क्या हुआ
फ़ासले बढ़ते गये, नक्शे-क़दम ही रह गए

सभी शेर उम्दा!! आनन्द आ जाता है आपक पढ़कर.

MUFLIS said...

अदा देखो, नक़ाबे-हुस्न वो कैसे उठाते हैं,
अभी तो पी नहीं हम ने, क़दम क्यों डगमगाते हैं?

जब मिले मुझ से कभी, इक अजनबी की ही तरह
पर निगाहों से मिरे दिल की कहानी कह गये।

दिल के आईने में उसका, सिर्फ़ उसका अक्स था
शीशा-ए-दिल तोड़ डाला, ये सितम भी सह गए

ऐसे ऐसे नायाब और दिल-फरेब
अशार कहने वाले खालिक़ को
मेरा पुर-खुलूस आदाब
आप जैसे उस्ताद-ए-मुहतरम ही तो ग़ज़ल की
पुख्ता और मेआरी रिवायत को संजो कर ,
संभाल कर रक्खे हुए हैं
एक एक शेर में
दिली जज़्बात का इज़हार झलकता है

और हुज़ूर ......
आपने जिस प्यार भरे तब्सिरे से इस नाचीज़ की
हौसला अफ़्ज़ाइ की है उसके लिए मैं आपका
शुक्रिया अदा करता हूँ ...
उम्मीद है....शफ़क़त बनाए रक्खेंगे

एक बार फिर इन दो खूबसूरत ग़ज़लों पर
दिली मुबारकबाद क़बूल करें .

ashok andrey said...

aadarniya mahaavir jee aapki dono gajlon ne man ko chhu liya hai kaphee samay ke baad itnee behtareen gajlon se gujarnaa hua hai-
hamen manjoor hai gar,gair se bhee pyaar ho jaaye
kamjkam seekh jaayenge ki dil lgaate hain.
aur
guphtgu men phool jhadte the kisee ke hont se
yaad oonki khaar ban, dil men chubho ke reh gaye.
bahut sundar gajlon ke liye meree aur se badhai sweekaren
ashok andrey

Harkirat Haqeer said...

वाह...वाह...वाह......हर शे'र लाजवाब ......सुभानाल्लाह्ह्ह्ह्ह्छ .....गज़ब....गज़ब.....गज़ब......!!


ये ' रचात' को ठीक कर लें ....!!

याद जब आई कभी, आंसू निकल कर बह गये
क्या कहें इस दिल की हालत, शिद्दते-ग़म सह गए

दिल के आईने में उसका, सिर्फ़ उसका अक्स था
शीशा-ए-दिल तोड़ डाला, ये सितम भी सह गए

महावीर जी आपकी गजलें तो माशाल्लाह..... तारीफ से परे हैं ......!!

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

आदरणीय महावीर जी
आपकी ग़ज़लों को पढ़ना एक एक शेर के साथ कई सारे नजारे देखना
गज़ब सुकून देनेवाला लम्हा बन जाता है
नमन
सादर,
स स्नेह,
- लावण्या

Dr. Sudha Om Dhingra said...

हमेशा की तरह उम्दा खूबसूरत ग़ज़लें-

जब मिले मुझ से कभी, इक अजनबी की ही तरह
पर निगाहों से मिरे दिल की कहानी कह गये।

सभी शे'र बढ़िया...
बधाई.

Babli said...

पहले तो मैं आपका तहे दिल से शुक्रियादा करना चाहती हूँ बढ़िया टिपण्णी देने के लिए और उससे भी ज़्यादा खुशी हुई की आपने मुझे सुझाव दिया है उस आखरी लाइन के बारे में! आप जैसे महान लेखक से अगर कुछ सिखने का मौका मिले तो ये मेरे लिए सौभाग्य की बात होगी! बहुत ही सुंदर और उम्दा ग़ज़ल लिखा है आपने!

गौतम राजरिशी said...

पहली ग़ज़ल का बेमिसाल मतला और वो तीसरा शेर "कमज़कम सीख जायेंगे.." वाला- अहहा!

दूसरी ग़ज़ल पे जैसा कि सुबीर जी ने कहा कि मुशकिल काफ़िये के संग भी ग़ज़ल की खूब्सूरती बरकरार है....

शुक्रिया महावीर जी!

"अर्श" said...

PAHALI GAZAL KA MATALAA KHUD KAHAR BARPAA RAHAA HAI AUR YAH SHE'R SACH KA SAMANAA KARNE PE AATUR HAI...
वफ़ा के इम्तिहां में जान ली, ये भी नहीं देखा
वो मेरी लाश के पहलू में खंजर भूल जाते हैं।

KYA KHUB SHE'R KAHE HAIN AAPNE ...
DUSARI GAZAL KA BHI WAHI HAAL USTADANAA SHE'R AUR GAZALEN PADHANE KO MILI MAJAA AAGAYAA... DONO HI GAZALEN APNE AAP ME PURI TARAH MUKAMMAL... KUCHH KAHUN MUNAASIB NAHI ... KAM HI LAGTA HAI...
SHUKRIYA KHUBSURAT GAZALEN PADHWAANE KE LIYE...


ARSH

लता 'हया' said...

bahut bahut shukria mahaveer ji,aapki daad mere liye kisi dua se kamtar nahin.hausala-afzai ka shukria,
aapki donon gazalon ke mutalliq kya kahon? har lihaaz se aapse chhoti hoon siwa iske ke ik ik sher hazaar hazaar kanjar chubo daalta hai hassas jazbaaton ki lashon par !

rashmi ravija said...

हमें मञ्ज़ूर है गर, ग़ैर से भी प्यार हो जाए,
कमज़कम सीख जाएंगे कि दिल कैसे लगाते हैं।
har sher lazabaab...behtareen gazal hai..

rashmi ravija said...

हमें मञ्ज़ूर है गर, ग़ैर से भी प्यार हो जाए,
कमज़कम सीख जाएंगे कि दिल कैसे लगाते हैं।
har sher lazabaab...behtareen gazal hai..

rashmi ravija said...
This comment has been removed by the author.
Nirmla Kapila said...

हमें मञ्ज़ूर है गर, ग़ैर से भी प्यार हो जाए,
कमज़कम सीख जाएंगे कि दिल कैसे लगाते हैं।
निगाहे-नाज़ से अब आग कुछ ऎसी लगा दी है
बुझे ना ज़िन्दगी भर, रात दिन दिल को जलाते हैं


याद जब आई कभी, आंसू निकल कर बह गये
क्या कहें इस दिल की हालत, शिद्दते-ग़म सह गए

दो क़दम ही दूर थे, मंज़िल को जाने क्या हुआ
फ़ासले बढ़ते गये, नक्शे-क़दम ही रह गए
दोनो गज़लें लाजवाब हैं बस गुनगुना रही हूँ । टिप्पणी नहीं दे सकती हाथ काँपते हैं उस्ताद शायरों की कलम पर कुछ लिखते हुये। बस कलम का जादू देखने चली आती हूँ शुभकामनायें ।

डॉ टी एस दराल said...

महावीर जी, नमस्कार.
पहली बार आपको पढ़ा है.
मैं तो निशब्द हो गया हूँ.
दोनों ही ग़ज़लें लाज़वाब.
आपकी शायरी को सलाम.

डॉ टी एस दराल said...

महावीर जी, नमस्कार.
पहली बार आपको पढ़ा है.
मैं तो निशब्द हो गया हूँ.
दोनों ही ग़ज़लें लाज़वाब.
आपकी शायरी को सलाम.

Priya said...

ham to first time aaye aapke blog par .......par yaha to sangam hai....jahan doobki lagana to banta hai....:-)

ज्योति सिंह said...

mahavir ji namaskaar ,shukriyaan mere blog par aakar ek sundar tippani dene ke liye ,pahali baar aai hui magar shaandar rachna padhkar dil khush ho gaya ye safar chalta rahe .

PRAN SHARMA said...

MAHAVIR JEE,
CHITRA DEKHA TO EK BAAR
AUR DAAD DENE KO JEE KAR AAYAA
HAI.AAP KEE GAZALEN CHITRA KO SAAKAAR ROOP DE RAHEE HAIN AUR CHITA AAPKEE GAZALON KO SAAKAAR
ROOP DE RAHAA HAI.DONON EK DOOSRE
KEE POORAK HAIN.BAHUT KHOOB.

पी.सी.गोदियाल said...

क्या बात है , यहाँ तो साहिय की खान भरी पडी है, बहुत सुन्दर महावीर जी !

योगेन्द्र मौदगिल said...

वाह वाह.... बेहतरीन ग़ज़लें... वाह दादा वाह..

रंजना said...

हर शेर ने अपने में मन को ऐसे गूँथ लिया कि आगे बढ़ना असंभव हो रहा था...दोनों ग़ज़लों के सौन्दर्य माधुरी की प्रशंशा कर पाऊं,इतना सामर्थ्य मुझमे नहीं.....इन्हें तो बस पढना और इनके सम्मुख नतमस्तक होना ही अपने बस में है...

अप्रतिम !! अद्वितीय गज़लें !!

(आप जैसे विद्वजन का अनुग्रह किसी वरदान से कम नहीं...मैं श्रद्धानत हूँ आपके अनुग्रह्स्वरूप पाए टिपण्णी के लिए....आपका आर्शीवाद अनुग्रह आगे भी बना रहे यही मनोकामना है...)

Simply Poet said...

ir please do check out
www.simplypoet.com

World's first multilingual poetry portal

do post there you may be depriving a lot of people the opportunity to appreciate your beautiful creations.

'अदा' said...

आदरणीय महावीर जी,
सादर प्रणाम,
आप मेरे ब्लॉग पर आये मेरे लिए, यह ईश्वर के आशीर्वाद से कम नहीं था..
आपकी दोनों गज़लें कितनी खूबसूरत है....इससे आप भी वाकिफ हैं और लोगों ने भी बताया ही है...अपने-अपने तरीके से ....
मेरा कुछ भी कहना छोटा मुँह बड़ी बात हो जायेगी....
सबकुछ बहुत ही अच्छा लगा..
सादर...
स्वप्न मंजूषा

अमिताभ श्रीवास्तव said...

aadarniy,
aksar aapke blog par aataa hu aour rachnaye padhh jaataa hu. tippani nahi deta. aap ise yu kah sakte he ki abhi me tippani dene laayak nahi hu, kamse kam aap jese guruvaro ki rachnao par..
mujhe lagta he, mahaz achha he, shaandar he, laazavaab he..aadi likh dene se baat nahi banati..rachna ki sahi samiksha yaa jo gambhirta se padhhi jaati he us par apani baat kahne ka matlab sirf achha he, laazavaab he aadi likhna katai nahi he...isake liye gahree samajh aour rachnakaar ke bhaavo ko apane antarman me utaar lene ka achook gyaan avshyak he..yah nirvivaad satya he ki aap log saahitya ke anmol sevak he, gyaataa he aap sab ko padhh lena aour seekhne kaa yatn karanaa hi mere liye pratham kaary he. isaliye me chupchaap aapke blog par aataa rahta hu aur chupchaap hi chalaa jataa hu../ aapka mere blog par aanaa hi mere liye ati soubhagya ki baat he..fir yadi koi tippani chhhod dena mera puraskar ho jaataa he../
gazalo ke bhaav, shbdo ka pravaah aour kai sare artho ka bahanaa..aksar aapki rachnao me paayaa he.kabhi mugdh hua to kabhi chakit, kabhi kuch atpata bhi lagaa to kabhi soch me bhi dooba..kulmilakar khoob seekhne ko mil rahaa he, apse bager pooche yah krtya kartaa hu, shama kijiyega.

महावीर said...

मेरी ग़ज़लें पढ़ने और टिप्पणियों द्वारा अपनी प्रतिक्रियाओं के लिए मैं हार्दिक रूप से आप सभी का हार्दिक धन्यवाद करता हूँ.
रविवार को वरिष्ठ ग़ज़लकार प्राण शर्मा जी की ग़ज़लों का आनंद लीजिये.
महावीर शर्मा

श्याम सखा 'श्याम' said...

ये अब अंदाज़ तो देखो त'आल्लुक तोड़ कर भी वो
हमारे दिल का ख़ूँ करके, वो मेहंदी भी रचाते हैं

..........
गज़ल किन-किन तरीकों से सदा वो तो सजाते हैं
कि सब अशआर यारो सीधे दिल में पहुंच जाते हैं

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

आपके कलाम पर कुछ कह सकें, ऐसे अल्फाज़ कहां हमारे पास!
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

परमजीत बाली said...

सभी रचनाएं बहुत सुन्दर है।बहुत बढ़िया प्रस्तुति है। धन्यवाद।

आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।