Sunday, 15 November 2009

दो ग़ज़ल - दो रंग: प्राण शर्मा

ग़ज़ल:
हर तरह के फूल का बूटा लगाया जाता है
घर के आँगन को सदा सुन्दर बनाया जाता है

आसमां तक कब भला उसको उठाया जाता है
मिट्टी का घर भी कहीं ऊंचा बनाया जाता है

धीरे- धीरे मुँह बना कर देखना सबको तेरा
इतना तो बतला कि ये किसको चिढ़ाया जाता है

प्यार के धागे में अब तो बाँध ले मुझको सनम
एक बच्चे सा मुझे क्यों बरगलाया जाता है

कैसी उलझन, कैसे अड़चन, कैसी है ये चुपचुपी
हाल दिल का अपने को कुछ तो सुनाया जाता है
प्राण शर्मा
**********************************

एक धुँधला सुबह का तारा लगा तो क्या हुआ
गर मुसाफिर कुछ थका-हारा लगा तो क्या हुआ

चाँद-तारों की तरह न्यारा लगा तो क्या हुआ
हर बशर मुझको बड़ा प्यारा लगा तो क्या हुआ

मेरे साथी, चलो कुछ प्यास तो अपनी बुझी
पानी सागर का अगर खारा लगा तो क्या हुआ

काश, उसके दिल के अन्दर झांक कर तुम देखते
देखने में कोई हत्यारा लगा तो क्या हुआ

"प्राण" मैं चलता रहा इसको उठा कर हर तरफ
जिंदगी का बोझ कुछ भारा लगा तो क्या हुआ
प्राण शर्मा
*****************************


अगला अंक २० नवम्बर २००९


प्रकाश सिंह "अर्श" के


दो रंग - ग़ज़ल और नज़्म



27 comments:

Dipak 'Mashal' said...

Aapki gazal padhna hamesha hi apne aap me ek gauraav ka ahsaas dilata hai... ye sher to khaaskar pasand aaya-
काश, उसके दिल के अन्दर झांक कर तुम देखते
देखने में कोई हत्यारा लगा तो क्या हुआ
Jai Hind...

MANOJ KUMAR said...

आसमां तक कब भला उसको उठाया जाता है
मिट्टी का घर भी कहीं ऊंचा बनाया जाता है

ए मेरे साथी, चलो कुछ प्यास तो अपनी बुझी
पानी सागर का अगर खारा लगा तो क्या हुआ

यथार्थ की पहचान को चेहरा है जो आदमी को जिन्दा रखने की ताकत में बढ़ोत्तरी करता है।

रूपसिंह चन्देल said...

"प्राण" मैं चलता रहा इसको उठा कर हर तरफ
जिंदगी का बोझ कुछ भारा लगा तो क्या हुआ

दोनों गज़लें बहुत ही खूबसूरत हैं. पहले ही कह चुका हूं कि गज़लों में प्राण जी कोई जवाब नहीं है.

चन्देल

श्याम सखा 'श्याम' said...

एक धुँधला सुबह का तारा लगा तो क्या हुआ
गर मुसाफिर कुछ थका-हारा लगा तो क्या हुआ

सही और सुन्दर अभिव्यक्ति

Devi Nangrani said...

आसमां तक कब भला उसको उठाया जाता है
मिट्टी का घर भी कहीं ऊंचा बनाया जाता है

क्या कहें क्या न कहें इन दोनों के बीच में फासला ही नहीं लगता. बस फन के वाकिफ़ होने का येः अवसर महावीर व् प्राण शर्मा जी की बदौलत फन और फनकारों से रूबरू करवाती है.
सादर
देवी नागरानी

पी.सी.गोदियाल said...

प्यार के धागे में अब तो बाँध ले मुझको सनम
एक बच्चे सा मुझे क्यों बरगलाया जाता है

बहुत खूब, क्या कहने सुबान अल्लाह

Nirmla Kapila said...

मैं तो कुछ भी कहने के लायक नहीं हूँ। अपने आदरणीय भाई साहिब तो तो बहुत कुछ कह सकती हूँ मगर श्री प्राण शर्माजी गज़ल उस्ताद को क्या कहूँ? उन की पुस्तक गज़ल कहता हूँ का आनन्द ले रही हू। दोनो गज़लों का हर अश आर लाजवाब हैं किसी एक अश आर को कैसे कहूँ कि यही पसंद है । इन गज़लों के लोये उन्हें बहुत बहुत बधाई और शुभकामनायें आपका धन्यवाद्

mehek said...

प्यार के धागे में अब तो बाँध ले मुझको सनम
एक बच्चे सा मुझे क्यों बरगलाया जाता है
waah behtarin,dono hi gazalein behad pasand aayi.

दिगम्बर नासवा said...

Usyaad logon ke sher kitna kamaal karte hain .... dono Gazlen kamaal ki .. mukammal ....

धीरे- धीरे मुँह बना कर देखना सबको तेरा
इतना तो बतला कि ये किसको चिढ़ाया जाता है ...
bahoot hi bhola pan jhalakta hai is sher mein... kamaal ka sher hai ...

ए मेरे साथी, चलो कुछ प्यास तो अपनी बुझी
पानी सागर का अगर खारा लगा तो क्या हुआ ..

itna lajawaab sher hai ki dil se vaah .. vaah nikalti hai ...

neera said...

वाह!
काश, उसके दिल के अन्दर झांक कर तुम देखते
देखने में कोई हत्यारा लगा तो क्या हुआ

"प्राण" मैं चलता रहा इसको उठा कर हर तरफ
जिंदगी का बोझ कुछ भारा लगा तो क्या हुआ

नीरज गोस्वामी said...

आसमां तक कब भला उसको उठाया जाता है
मिटटी का घर भी कहीं ऊंचा बनाया जाता है
***
काश, उसके दिल के अन्दर झाँक कर तुम देखते
देखने में कोई हत्यारा लगा तो क्या हुआ

अब भला ऐसे कालजयी शेर जिन ग़ज़लों में हों उनके बारे में क्या कमेन्ट किया जाये...सिर्फ लिखने वाले का सर झुका कर आभार ही व्यक्त किया जा सकता है...प्राण साहब शायरी के उस मुकाम पर हैं जहाँ पहुँचने की हसरत लिए शायर अपनी उम्र बिता देते हैं....अब लता दी के गाने हों या सचिन की बल्लेबाजी...उस पर क्या कहना...वो तो आनंद लेने का स्त्रोत्र हो गए हैं...शायरी में प्राण साहब भी उसी मुकाम पर हैं, इश्वर उन्हें सेहत और लम्बी उम्र बक्शे. आमीन.
नीरज

श्रद्धा जैन said...

हर तरह के फूल का बूटा लगाया जाता है
घर के आँगन को सदा सुन्दर बनाया जाता है

waah waah kya baat hai


आसमां तक कब भला उसको उठाया जाता है
मिट्टी का घर भी कहीं ऊंचा बनाया जाता है

hmm ye bahut gahri baat hai

धीरे- धीरे मुँह बना कर देखना सबको तेरा
इतना तो बतला कि ये किसको चिढ़ाया जाता है

bahut khoob

प्यार के धागे में अब तो बाँध ले मुझको सनम
एक बच्चे सा मुझे क्यों बरगलाया जाता है
kya baat hai


कैसी उलझन, कैसे अड़चन, कैसी है ये चुपचुपी
हाल दिल का अपने को कुछ तो सुनाया जाता है

bahut khoob
bahut khoobsurat gazal

श्रद्धा जैन said...

एक धुँधला सुबह का तारा लगा तो क्या हुआ
गर मुसाफिर कुछ थका-हारा लगा तो क्या हुआ
dhundhla subah ka tara
kya baat kahi hai


चाँद-तारों की तरह न्यारा लगा तो क्या हुआ
हर बशर मुझको बड़ा प्यारा लगा तो क्या हुआ

bahut khoob

ए मेरे साथी, चलो कुछ प्यास तो अपनी बुझी
पानी सागर का अगर खारा लगा तो क्या हुआ

ahaaaaaa sagar ka paani khara hai magar pyaas to bujhi

काश, उसके दिल के अन्दर झांक कर तुम देखते
देखने में कोई हत्यारा लगा तो क्या हुआ

waah waah Guru ji
tusi kamaal ho

"प्राण" मैं चलता रहा इसको उठा कर हर तरफ
जिंदगी का बोझ कुछ भारा लगा तो क्या हुआ

hmm zindgi waqayi bhari hi hai

Priya said...

waaah ..bahut khoob ""प्राण" मैं चलता रहा इसको उठा कर हर तरफ
जिंदगी का बोझ कुछ भारा लगा तो क्या हुआ
"

श्याम कोरी 'उदय' said...

... अब तारीफ़ में क्या लिखें, बस समुन्दर में डुबकी लगा के जा रहे हैं !!!!!!

dr. ashok priyaranjan said...

अच्छा लिखा है आपने । सहज विचार, संवेदनशीलता और रचना शिल्प की कलात्मकता प्रभावित करती है ।

मैने भी अपने ब्लाग पर एक लेख लिखा है-घरेलू हिंसा से लहूलुहान महिलाओं का तन और मन-समय हो तो पढ़ें और कमेंट भी दें ।
http://www.ashokvichar.blogspot.com

कविताओं पर भी आपकी राय अपेक्षित है। कविता का ब्लाग है-
http://drashokpriyaranjan.blogspot.com

पंकज सुबीर said...

दादा भाई
अब मैं आप पर केस करने वाला हूं । आपने मुझे परेशान कर दिया है । परेशानी ये है कि मुझे आदरणीय प्राण साहब को दो ग़ज़लें अपनी भेजनी हैं । पहले मैंने दो ग़ज़लें अपनी छांट ली थीं भेजने के लिये किन्‍तु उसी समय आपकी दो ग़ज़लें आपके ब्‍लाग पर पढ़ीं । उनके सामने अपनी खुद की ग़ज़लें ऐसी लगीं कि तुरंत ही फाड़ दीं । फिर बड़ी ही हिम्‍मत करके संडे का दिन उपयोग करके दो ग़ज़लें छांटी थीं कि आपने आज सुबह सुबह ही प्राण सहब की दो ग़ज़लें पढ़वा दीं । अब अपनी ग़ज़लों का क्‍या करूं । प्राण साहब को क्‍या भेजूं । क्‍योंकि इन दोनों ग़ज़लों को पढ़ने के बाद अपनी ग़ज़लें एक बार फिर से फाड़ चुका हूं ।
आसमां तक कब भला उसको उठाया जाता है
मिट्टी का घर भी कहीं ऊंचा बनाया जाता है

धीरे- धीरे मुँह बना कर देखना सबको तेरा
इतना तो बतला कि ये किसको चिढ़ाया जाता है

प्यार के धागे में अब तो बाँध ले मुझको सनम
एक बच्चे सा मुझे क्यों बरगलाया जाता है
नयी देवदास के एक गाने की पंक्ति उधार लेकर कमेंट कर रहा हूं इन शेरों पर । मार डाला हाय मार डाला ।
प्रणाम प्राण साहब की लेखनी को ।

Babli said...

बहुत ही गहराई और सुंदर भाव एवं अभिव्यक्ति के साथ आपने उम्दा ग़ज़ल प्रस्तुत किया है! इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाइयाँ !

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

शायरी के शौकीनों के लिये पूरी खुराक हैं यहां तो!
आदरणीय महावीर जी के अहसानमंद हैं हम..
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

"अर्श" said...

gazal pitamah ki gazalon ke baare me main kuchh kahun yah mere haisiyat ke bahar ki baat hai... unki gazalon se bahut saari baaten maine sikhi hai khud... dono hi gazal apne aap me mukammal dastaan bayaan kar rahi hai... gaharaayee, bhav, mahsoosiyat, aur naa jaane kya kya hota hai inki gazalon me ... guru dev inki dono gazalen padhwaakar aapne hame dhanya kiyaa hai ...


aapka
arsh

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

आ. प्राण साहब की ग़ज़लों को पढ़ना , एक सुकून और बहुत देर तक सोचने का सामान दे जाता है
आ. महावीर जी आपका भी शुक्रिया -- इन्हें पढवाने के लिए
सादर सविनय ,
- लावण्या

Science Bloggers Association said...

बहुत ही सुंदर गजलें, इन्हें पढवाने का आभार।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

गौतम राजरिशी said...

"आसमां तक कब भला उसको उठाया जाता है
मिट्टी का घर भी कहीं ऊंचा बनाया जाता है"

ये हुस्ने-मतला तो ग़ज़ब का हुस्न समेटे हुये है...आहहा! हम तो अटक के रह गये इस मतले की कोमलता, उँचाई, और लाजवाब कथ्य पर!

पूरी ही ग़ज़ल खूब बन पड़ी है।

दूसरी ग़ज़ल भी अपनी अनूठी रदीफ़ में भी ग़ज़ब की सहजता बरकरार रखे हुये है...

शुक्रिया महावीर जी, प्राण साब की इन ग़ज़लों से मिलवाने के लिये।

Dr. Sudha Om Dhingra said...

आसमां तक कब भला उसको उठाया जाता है
मिट्टी का घर भी कहीं ऊंचा बनाया जाता है

वाह क्या बात है...

एक धुँधला सुबह का तारा लगा तो क्या हुआ
गर मुसाफिर कुछ थका-हारा लगा तो क्या हुआ

क्या कह दिया आप ने ...

चाँद-तारों की तरह न्यारा लगा तो क्या हुआ
हर बशर मुझको बड़ा प्यारा लगा तो क्या हुआ

वाह वाह वाह ...

ए मेरे साथी, चलो कुछ प्यास तो अपनी बुझी
पानी सागर का अगर खारा लगा तो क्या हुआ

आप के शे'रों से सीखती हूँ, पहले भी कई बार कह चुकी हूँ....आप इसी तरह लिखते रहें और मैं पढ़ती रहूँ ... ...

रविकांत पाण्डेय said...

आसमां तक कब भला उसको उठाया जाता है
मिट्टी का घर भी कहीं ऊंचा बनाया जाता है
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एक धुँधला सुबह का तारा लगा तो क्या हुआ
गर मुसाफिर कुछ थका-हारा लगा तो क्या हुआ

ए मेरे साथी, चलो कुछ प्यास तो अपनी बुझी
पानी सागर का अगर खारा लगा तो क्या हुआ

आदरणीय प्राण जी के इन उत्कृष्ट शेरों को बार-बार पढ़ रहा हूं और नतमस्तक हुआ जा रहा हूं। बहुत-बहुत शुक्रिया इस अनोखे उपहार के लिये।

ashok andrey said...

priya bhai pran jee kee gajlon ko pdnaa kisee sukhad ehsaas se gujarne jaisaa lagtaa hai man ko chhu jaatee hain unki gajlen -
pyaar ke dhaage mai ab to baandh le mujhko sanam
ek bachche sa mujhe kyon barglaya jaata hai
tathaa-
kaash, uske dil ke andar jhaank kar tum dekhte
dekhne men koi hatyaara lagaa to kyaa hua
bahut sundar rachnaen hai;meree aur se badhaee sweekaren
ashok andrey

देवमणि पांडये की ई मेल द्वारा टिप्पणी: said...

प्राण साहब की गज़लों में बड़ी ताज़गी है -
चाँद-तारों की तरह न्यारा लगा तो क्या हुआ
हर बशर मुझको बड़ा प्यारा लगा तो क्या हुआ

ए मेरे साथी, चलो कुछ प्यास तो अपनी बुझी
पानी सागर का अगर खारा लगा तो क्या हुआ