Saturday, 10 April 2010

यू.के. से बासित कानपुरी की दो ग़ज़लें

"यू.के. के कवियों की रचनाओं की श्रृंखला" में जनाब बासित कानपुरी की दो ग़ज़लें

संक्षिप्त परिचय:
बासित कानपुरी

जन्म : कानपुर,उत्तर प्रदेश, भारत
बासित साहब का बुनियादी ताल्लुक एक निहायत अदबी (साहित्यिक) घराने से है. उनके नाना से लेकर वालिद और भाई किसी न किसी तरह उर्दू अदब से संबद्ध रहे हैं.
शिक्षा और कार्य-क्षेत्र: अर्थशाश्त्र (Economics) में उच्च शिक्षा प्राप्त करके बैंकिंग पेशे में रहे. १९६९ में इसी सिलसिले में लन्दन आए और यहीं के होकर रह गए. १९९१ में रिटायर होकर अदबी कार्यों में व्यस्त हैं. १९९३ में एक भव्य मुशायरे में शिरकत की और सुप्रसिद्ध जनाब ख़ुमार बाराबंकी, जनाब सरदार जाफ़री, जनाब बशीर बद्र जैसे महान शोअरा की मौजूदगी में बसीत साहब ने अपना कलाम सुनाया और दाद-ए-सुख़न वसूल की. ज़र परस्ती दुनियादारी, हंगामों और सामाजिक ऊंच-नीच के दौर में बासित की ग़ज़ल ने मुहब्बत का एक गुलज़ार रखा है.
बासित साहब के गले में इस क़दर मिठास है कि सुनने वाले मंत्रमुग्ध हो जाते हैं. इसी लिए मुशायरों में बासित साहब की ग़ज़लों का बेसब्री से इंतज़ार रहता है. मशहूर गुलोकारा राधिका चोपड़ा ने उनकी ग़ज़लों को बड़ी खूबसूरती से गाया है और सुनने वालों ने ग़ज़लों और राधिका चोपड़ा की आवाज़ दोनों ही को बहुत सराहा है.

गज़ल
बासित कानपुरी
यादों ने बीते लम्हों का मंज़र सजा दिया
माज़ी को हाल - हाल को माज़ी बना दिया
यूं भी बहल गई है तबीयत कभी कभी
ख़त उसके नाम हमने लिखा और जला दिया
देते रहे वो पहले तो झूटी तसल्लियाँ
फिर रफ़्ता रफ़्ता रब्त-ए-तआल्लुक़ घटा दिया
वह बात जिसका ज़िक्र कभी हम न कर सके
लोगों ने क्यों उसी का फ़साना बना दिया
भर आईं आँखें देखकर 'बासित' कुछ इस तरह
हम कैसे मान जाएँ कि दिल ने भुला दिया
*********************************
गज़ल
बासित कानपुरी
बना है अपना तो ये मुक़द्दर कि लिखना लिखना मदाम लिखना
वह बीती बातों को याद करना वह क़िस्सा-ए-ना तमाम लिखना
वह चाँद चेहरा मुस्कुराहट अजीब दिन थे अजीब रातें
वह सूरत जब भी जेहन में आए उसी का बस सिर्फ़ नाम लिखना
तुम्हें पता है कि वह हमेशा से दिल की धड़कन में बस रहे हैं
नदीम उनको जो ख़त लिखो तो ज़रूर मेरा सलाम लिखना
वह हुस्न में एक ज़िंदगी हैं कभी जो उनकी शबीह लिखना
तो उनका चेहरा गुलाब लिखना और उनकी आँखों को जाम लिखना
वह आयें 'बासित' जो घर तुम्हारे सहर से तुम उसको ताबीर करना
और उनकी रूख़सत के वाक़ये को तुम अपनी यादों की शाम लिखना
**********************************************

19 comments:

इस्मत ज़ैदी said...

यादों ने बीते लम्हों का मंज़र सजा दिया
माज़ी को हाल - हाल को माज़ी बना दिया

वह आयें 'बासित' जो घर तुम्हारे सहर से तुम उसको ताबीर करना
और उनकी रूख़सत के वाक़ये को तुम अपनी यादों की शाम लिखना

बहुत खूब!
माज़ी को हाल - हाल को माज़ी बना दिया
ये मिसरा अपने आप में बहुत कुछ समेटे हुए है

तिलक राज कपूर said...

माज़ी को हाल - हाल को माज़ी बना दिया
क्‍या बात कह दी जनाब आपने।

और
वह बात जिसका ज़िक्र कभी हम न कर सके
लोगों ने क्यों उसी का फ़साना बना दिया।
तथा
वह हुस्न में एक ज़िंदगी हैं कभी जो उनकी शबीह लिखना
तो उनका चेहरा गुलाब लिखना और उनकी आँखों को जाम लिखना।
महफिल लूटने वाले शेर हो गये।

Udan Tashtari said...

वह हुस्न में एक ज़िंदगी हैं कभी जो उनकी शबीह लिखना
तो उनका चेहरा गुलाब लिखना और उनकी आँखों को जाम लिखना

-बहुत आनन्द आया दोनों गज़लें पढ़कर.

एक से एक शानदार शेर!!

रूपसिंह चन्देल said...

देते रहे वो पहले तो झूटी तसल्लियाँ
फिर रफ़्ता रफ़्ता रब्त-ए-तआल्लुक़ घटा दिया

Bahut sundar Ghazalen. Basit sahab ko pahali bar padha lekin bhai vaah----Badhai

श्याम कोरी 'उदय' said...

....बेहतरीन गजलें ... एक से बढकर एक शेर ..... बेहद प्रसंशनीय!!!!

परमजीत बाली said...

बहुत उम्दा गजले हैं। बधाई। स्वीकारें।

देवमणि पाण्डेय said...

अच्छी ग़ज़ल है। बधाई!

यूं भी बहल गई है तबीयत कभी कभी
ख़त उसके नाम हमने लिखा और जला दिया

वह बात जिसका ज़िक्र कभी हम न कर सके
लोगों ने क्यों उसी का फ़साना बना दिया

देवमणि पाण्डेय

MUFLIS said...

"देते रहे वो पहले तो झूटी तसल्लियाँ
फिर रफ़्ता रफ़्ता रब्त-ए-तआल्लुक़ घटा दिया"

ऐसा दिल-फरेब शेर एक अरसे के बाद पढने को मिला है
बासित साहब की शाइरी में जो खुसूसियत है
उन्हें लफ़्ज़ों में बाँध पाना, कोई आसान काम नहीं

"वह आयें 'बासित' जो घर तुम्हारे सहर से तुम उसको ताबीर करना
और उनकी रूख़सत के वाकये को तुम अपनी यादों की शाम लिखना"

वाह-वा !!
मुबारकबाद .

Dr. Ahmad Ali Barqi Azmi said...

Hai ghazal Basit ki Barqi fikr o Fun ka imtezaaj
Is liye maiN pesh karta hooN unheiN apna kheraaj
Ahmad Ali Barqi Azmi
New Delhi-110025

ओम पुरोहित'कागद' said...

mahaveer ji,
vande!
u.k. ke bhartiy rachnakaron ki rachnayen prakash me la kar vandniy kam kar rahe hain aap.
badhai ho!
basit ji,indira ji,sanjeev varmaji,usha raje ji,aadi ko ab tak padh liya.achha laga. vaqut milne par baki ko bhi padhunga.

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

श्रद्धेय महावीर जी, आदाब
जनाब बासित कानपुरी साहब की बेहतरीन ग़ज़लें पढ़वाने के लिये शुक्रिया.
वह बात जिसका ज़िक्र कभी हम न कर सके
लोगों ने क्यों उसी का फ़साना बना दिया
बहुत उम्दा

तुम्हें पता है कि वह हमेशा से दिल की धड़कन में बस रहे हैं
नदीम उनको जो ख़त लिखो तो ज़रूर मेरा सलाम लिखना..
वाह....वाह

Pran Sharma said...

Baasit kanpuri kee dono gazalon
ke har sher mein bhavabhivyakti
sundar aur sahaj hai.Badhaaee.

रंजना said...

यादों ने बीते लम्हों का मंज़र सजा दिया
माज़ी को हाल - हाल को माज़ी बना दिया

वह बात जिसका ज़िक्र कभी हम न कर सके
लोगों ने क्यों उसी का फ़साना बना दिया

क्या बात कही है...वाह !!!

दोनों ही रचनाएँ अतिसुन्दर मनमोहक और लाजवाब
हैं...सभी के सभी शेर मन को बाँध लेने वाले हैं...
इन सुन्दर रचनाओं को पढवाने के लिए बहुत बहुत आभार...

प्रियदर्शिनी तिवारी said...

ITANY SHANDAR GAZALO KE LIYE DHANYAVAAD..

Babli said...

वह सूरत जब भी जेहन में आए उसी का बस सिर्फ़ नाम लिखना
तुम्हें पता है कि वह हमेशा से दिल की धड़कन में बस रहे हैं
नदीम उनको जो ख़त लिखो तो ज़रूर मेरा सलाम लिखना..
बहुत ख़ूबसूरत पंक्तियाँ! अत्यंत सुन्दर ग़ज़ल! बहुत बढ़िया लगा! लाजवाब! उम्दा प्रस्तुती!

श्रद्धा जैन said...

यादों ने बीते लम्हों का मंज़र सजा दिया
माज़ी को हाल - हाल को माज़ी बना दिया

bahut hi shaandaar gazlen share ki aapne
padhwane ke liye shukriya Sir

महावीर said...

जनाब बासित कानपुरी साहब का "महावीर" ब्लॉग पर स्वागत है.
आपकी ग़ज़लों पे इज़हार-ए- राय करने की गुंजाइश ही नहीं क्योंकि ऐसा करना सूरज को चराग़ दिखाने वाली बात होगी. लेकिन फिर भी दिल कुछ बिना कहे नहीं मानता. आपकी दोनों ही ग़ज़लें निहायत दिलकश हैं, बहुत पसंद आईं. जैसे जैसे पढ़ता गया, इधर माहौल और भी शायराना हो गया. आपका कलाम पढ़ते हुए दिल में जज़्बात करवट बदलने लगते हैं.
यूं भी बहल गई है तबीयत कभी कभी
ख़त उसके नाम हमने लिखा और जला दिया
आफ़रीन!
वह हुस्न में एक ज़िंदगी हैं कभी जो उनकी शबीह लिखना
तो उनका चेहरा गुलाब लिखना और उनकी आँखों को जाम लिखना
आपके रू-ब-रू होता तो मुकर्र ज़रूर कहता.
दोनों ग़ज़लों के मक़ते भी ख़ूब पसंद आये.
इन ख़ूबसूरत ग़ज़लों के लिए शुक्रिया.
ख़ाकसार
महावीर शर्मा

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' said...

दोनों रचनाएँ रुचीं.

नरेन्द्र व्यास said...

दोनो ही रचनाएं दिल को भाई । आभार ।।