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Saturday, 13 February 2010

यू.के. से उषा राजे सक्सेना की दो रचनाएं

यू.के. के कवियों की रचनाओं की श्रृंखला में
उषा राजे सक्सेना की दो रचनाएँ:



आशंका

लगता है
फिर वही होगा

हम फिर
बटेंगे
और बिकेंगे
उन्हीं के
बाजारों में
अपनी खुदगर्जी
और मूर्खताओं के
प्रमाण बन .
वे फिर
खरीद ले जायेंगे
हमारे उभरते नौजवानों
और बुद्धिजीवियों को

हम खुली आँख
विश्व- कल्याण का
स्वप्न देखते रह जायेंगे
वे अपना भविष्य
बनाते रहेंगे

हम महादानी कर्ण
और एकलव्य की तरह
अपनी सुरक्षा
बड़े गर्व से
उनके दान-पात्र में डालते रहेंगे
वे हमें असीसते रहेंगे

हम दृष्टिहीन
धृतराष्ट्र के उत्तराधिकारी
अंधे काफिलों से
कांच और पीतल के टुकड़ों पर
लुटते रहेंगे

हम पीढ़ी-दर-पीढ़ी
गर्व से सुनाते रहेंगे
उन्हें
दूध और दही की नदी में
नहाती
सोने की चिड़िया की
अनूठी कहानी
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सन्नाटा

सन्नाटा है
चुप सी लगी है
सब कुछ जमा हुआ सा लगता है
मन के अन्दर उग आये परदेस में
कोई झिझकते हुए भी
सांकल नहीं खटखटाता

लगता है एक पूरा का पूरा
शब्द समूह खो गया है
हवा गूंगी हो गयी है
आकाश बहरा हो गया है
दीवारें कुछ और
ठोस हो गयी हैं
खिड़कियाँ भी बंद हो गयी हैं
छत से लटकता
अकेला बल्ब
आँखें मिचमिचाता
मेरे होने न होने पर
एक जलता हुआ प्रश्न-चिन्ह
लगाता है

आँख में ठहरा हुआ आँसू
पलकों पर लटक गया है

अंगीठी में जलते हुए
लाल अंगारों से पूछती हूँ
कहीं मैं भी तो
जलता हुआ कोयला नहीं
जिसकी राख में
एक नन्ही सी
चिंगारी
तिड़कने का खामोशी से
इंतज़ार
कर रही है
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अगला अंक : 21 फरवरी 2010
यू. के. से दिव्या माथुर की रचनाएं

Sunday, 25 October 2009

यू.के. से उषा राजे सक्सेना की दो ग़ज़लें

ग़ज़ल:
-उषा राजे सक्सेना

जिंदगी को स्वार्थ का नश्तर लगा
ढेर था ईंटों का उसको घर लगा

हादसा यह क्या हुआ, इस शहर में
आते-जाते को बड़ा ही डर लगा

जब कहीं भी प्यार की मैयत उठी
मेला नफरत का वहां अक्सर लगा

उफ़, हमारे दौर की ये सभ्यता
दिल में आता है, उसे ठोकर लगा

दिन में चलकर थक गई है तू "उषा"
रात हो आयी है, चल बिस्तर लगा
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ग़ज़ल:

चाहत जब दौलत तक आयी
समझो वो फितरत तक आयी

साजिश, साजिश केवल साजिश
उनकी हर आदत तक आयी

मानव खुद जब बम बन बैठा
ये दुनिया दहशत तक आयी

ऊंचे महलों की कीरत से
ये दुनिया गुरबत तक आयी

टकराई फिर जमकर बरसी
बदली जब परबत तक आयी

उषा राजे सक्सेना

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अगला अंक: १ नवम्बर २००९
अमेरिका से 'देवी' नागरानी की दो ग़ज़लें
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Saturday, 16 May 2009

यू. के. से उषा राजे सक्सेना की दो गज़लें - दो रंग

परिंदा याद का मेरी मुंडेरी पर नहीं आया
कोई भटका हुआ राही पलट कर घर नहीं आया

सभी ने ओढ़ कर चादर उदासी की यही सोचा
शजर पर क्यों बहारों का नया मंज़र नहीं आया

मेरे हाथों की गर्मी से कहीं मुरझा न जाए वो
इसी डर से मैं नाज़ुक फूल को छू कर नहीं आया

मुखोटा दर मुखोटा थी हँसी , बस इसलिए ही तो
छुपा था जो मुखोटे में नज़र ख़ंजर नहीं आया

चुभे हैं दिल में तेरे ऐ 'उषा' कुछ दर्द के कांटे
है अचरज क्यों उभर कर आह का एक स्वर नहीं आया
उषा राजे सक्सेना
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फ़ज़ां का रंग क्यूँ बदला हुआ सा लगता है
ये सारा शहर क्यूँ जलता हुआ सा लगता है

हरेक शख़्स ये कहता हुआ सा लगता है
लहू का रंग कुछ बदला हुआ सा लगता है

ये ऐसा दौर है जिसमें कि झूट जीत गया
जो सच्चा था, वही हारा हुआ सा लगता है

ज़रा ये सोचिए क्या बात है कि दुनिया में
हरेक आदमी सहमा हुआ सा लगता है

हरेक दिल में कोई धुंध और धुआं है 'उषा'
है कैसा वक़्त जो ठहरा हुआ सा लगता है
उषा राजे सक्सेना
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अगला अंक: २३ मई २००९
यू.के. से वरिष्ठ ग़ज़लकार, समीक्षक, कहानीकार 'प्राण शर्मा' की दो ग़ज़लें