
ओ देस से आने वाले बता
क्या आम के ऊंचे पेड़ों पर
अब भी वो पपीहे बोलते हैं
शाख़ों की हरेरी पर्दों में (हरेरी: रेश्मी)
नग़मों के ख़ज़ाने खोलते हैं
सावन के रसीले गीतों से
तालाब में आमरस बोलते हैं
ओ देस से आने वाले बता
क्या अब भी किसी के सीने में
बाक़ी है हमारी चाह बता
क्या याद हमें भी करता है अब
यारों में कोई आह बता
ओ देस से आने वाले बता
लिल्ल्हा बता लिल्लहा बता
ओ देस से आने मेरे बता
क्या गाँव में अब भी वैसी ही
मस्ती भरी रातें होती हैं
देहात की कमसिन माहवशें (माहवशें: चाँद की तरह)
तालाब की जानिब जाती हैं
चांद की सादा रौशनी में
रंगीन तराने गाती है
ओ देस से आने वाले बता
क्या अब भी गजरदम चरवाहे (गजरदम: तड़के, उषाकाल)
रेवड़ को चराने जाते हैं
शाम के धुंधले सायों के
हमराह घरों को जाते हैं
अपनी रसीली बांसुरियों में
इश्क़ के नग़मे गाते हैं
ओ देस से आन वाले बता
क्या गाँव में अब भी सावन में
बरखा की बहारें छाती हैं
मासूम घरों से भोर भयी
चक्की की सदायें आती हैं
याद में अपने मायके की
बिछड़ी हुई सखियां गाती हैं
ओ देस से आने वाले बता
दरया का वो ख़्वाब आलूदा
उसकी फ़ज़ायें कैसी हैं
वो गांव, वो मंदिर, वो तालाब
उसकी हवाएं कैसी हैं
वो खेत, वो जंगल, वो चिड़ियां
उनकी सदाएं कैसी हैं
ओ देस से आने वाले बता
आख़िर में ये हसरत है कि बता
वो ग़ारतें ईमां कैसी हैं (गारतें ईमां: ईमान को नाश करने वाली)
बचपन में जो आफ़त ढाती थी
वो आफ़ते-दौरां कैसी है
हम दोनों थे जिसके परवाने
वो शम-ए-सबिश्तां कैसी है
ओ देस से आने वाले बता...
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'देवी' नागरानी की एक ग़ज़ल:
मेरे वतन की खुश्बू.....
बादे-सहर वतन की चन्दन सी आरही है,
यादों के पालने में मुझको झुला रही है।
ये जानकर भी अरमाँ होते नहीं हैं पूरे,
पलकों में ख़्वाब 'देवी' फिर भी सजा रही है।
कोई कमी नहीं है मुझको मिला है सब कुछ,
दूरी मगर वतन की मुझको रुला रही है।
शादाब मेरे दिल में इक याद है वतन की,
तेरी भी याद उसमें घुलमिल के आ रही है।
'देवी' महक है इसमें मिट्टी की सौंधी-सौंधी,
मेरे वतन की ख़ुश्बू केसर लुटा रही है।
'देवी' नागरानी

