Tuesday, 22 November 2011

महावीर जी जैसा दूसरा कोई हो नामुमकिन है...


'चेहरे पर सत्य का तेज़, हर वक़्त होंठों पर खेलने वाली मधुर मुस्कान, वाणी में ओज, हृदय में शत्रुओं को भी क्षमा करके स्थान देने की क्षमता, दुनिया को भलाई, भलाई और सिर्फ़ भलाई देने की चाह....' किशोरावस्था में जब कहानियों के नायक को इस तरह से महिमामंडित किया जाता तो लगता था कि डींगे हांकी जा रही हैं वरना आज के युग में कौन इस तरह से होता है. जो भी इस तरह की सोच रखता होगा वह आदरणीय श्री महावीर जी से मिलने के बाद अपने आप को एक बार चिकोटी काट कर यह एहसास जरूर दिलाता कि वह कहानी की दुनिया में नहीं बल्कि इसी दुनिया में है. जी यह सब मैंने ख़ुद महसूस किया. महावीर जी से मेरी ज्यादा तो नहीं पर करीब १७-१८ बार फोन पर बात हुई मगर जब भी हुई हमेशा एक-सवा घंटा के करीब ही हुई. कोई न कोई इस तरह का विषय ही उपलब्ध हो जाता कि उनकी राय जानना जरूरी लगता. भले ही उनसे मुलाक़ात एक ही मुमकिन हो सकी( दूसरी मुलाक़ात के लिए उन्होंने ही रोक दिया था, कारण अभी बताता हूँ) लेकिन वह मिलना ऐसा था कि आजीवन चंद घंटों की वह मुलाक़ात नहीं भूल सकता.
हालांकि ब्लॉग लिखना शुरू करने के कुछ दिन बाद से ही महावीर जी के संपर्क में आ गया था लेकिन उनसे मिलने का संयोग अप्रैल २०१० में बना, जब मैं एक मित्र से मिलने बेलफास्ट से लन्दन गया. जाने से पहले ही मैंने श्री महावीर जी से बात कर ली थी कि मैं आपसे मिलने आना चाहता हूँ. कुछ महीनों से फोन पर संपर्क के कारण महावीर जी मुझे अच्छे से जानने तो लगे ही थे इसलिए संभवतः वह भी मिलने के लिए उतने ही उत्सुक थे जितना कि मैं. जब मैं उनके घर मिलने पहुंचा तो महावीर जी ने ही दरवाजा खोला. उनके साथ कई विषयों पर बात हुई, उनके लन्दन आने के पहले दिन से लेकर उस दिन तक की लगभग सारी प्रमुख बातें उन्होंने खुली किताब की तरह मेरे सामने रख दीं. मेरी जगह कोई भी होता तो उनकी सादगी से वह भी उतना ही प्रभावित होता जितना कि मैं हुआ. जब रात होने को हुई तो बेमन से विदा लेना पड़ा.. मुझे अच्छे से याद है कि घर से चलते वक़्त उन्होंने कहा था कि, ''तुम्हारी तस्वीर देख कर तुम्हारी शक्ल सिल्वेस्टर स्टालिन से मिलती हुई लगती थी, मगर सामने देखकर....''
और मैंने टोका था कि, '' हाँ तो सच कहिये न कि सामने से देखने पर उतना सुन्दर नहीं हूँ..'' और उन्होंने मुझे गले से लगा लिया था. मुझे नहीं पता था कि प्रत्यक्ष रूप से वह उनसे मेरी प्रथम और आख़िरी भेंट साबित होने वाली है.
लौट कर जब बेलफास्ट पहुंचा तो बातों का सिलसिला बढ़ता चला गया और एक दिन उन्होंने मुझे बताया कि नेहरू केंद्र में उनकी कहानी 'विरासत' का पाठ होना है जिसके लिए उनकी इच्छा है कि मैं उनकी कहानी पढूं.. काफी समय से मंच से दूर रहने की वजह से मैंने उनसे जब क्षमा मांगनी चाही तो उनका कहना था कि,
''मैंने तुम्हारा प्रोफाइल देख लिया है, तुम्हारा रंगमंच का अभिनय यहाँ काम आएगा और फिर मुझे तुम पर पूरा भरोसा है.''
उनका भरोसा ही था जिसने मुझे हौसला दिया और मैंने अपनी कोशिश भर उस कहानी का जितना बेहतर पाठ कर सकता था, किया. वो महावीर जी ही थे जिन्होंने ब्रिटेन की हिन्दी साहित्य की कई बड़ी हस्तियों से मेरा परिचय कराया और मुझ जैसे अनाड़ी को लोगों की नज़र में लाये.
उनके व्यक्तित्व का एक अहम् पक्ष था कि वह किसी भी कार्य को करने के बाद उसका श्रेय नहीं लेना चाहते थे, चाहते थे तो सिर्फ़ लोगों को आगे बढ़ाना. मैं जब कहानी पाठ के लिए लन्दन गया तो आदरणीय महावीर जी ने लन्दन तक आने-जाने का पूरा व्यय, मुझे पहले से बताये बिना मेरे पते पर चेक बनाकर भेज दिया. मैंने जब वह वापस करना चाहा तो उनका यही कहना था कि,
''दीपक, मेरे लिए तुम राज(उनके पुत्र) से कम नहीं हो.. क्या मैं अपने बेटे के लिए इतना भी नहीं कर सकता? वैसे भी तुम्हारा अभी छात्र जीवन है, तुम्हे इनकी आवश्यकता पड़ सकती है.''
साथ ही यह हिदायत दी थी कि इस बात का पता किसी को भी न चले. महावीर जी मैं माफी चाहता हूँ कि आज वह वादा तोड़ रहा हूँ..
उन्होंने मुझे दूसरी बार मिलने से इसलिए मना कर दिया था कि उस समय उन्हें 'आँत का इन्फेक्शन' हो रखा था और इसलिए कि वह इन्फेक्शन मुझको न हो जाए उन्होंने अगली बार स्वस्थ होने पर मिलने का वादा करके मुझे वापस बेलफास्ट जाने को कहा था. मगर यह दुर्भाग्य ही रहा कि फिर वह वापस ठीक न हो सके और वह वादा वादा ही रह गया..

१७ नवम्बर २०१० को शाम के वक़्त मेरे पास एक अनजान नंबर से फोन आया, स्वर बहुत दुखी था.. लगा कि महावीर जी हैं लेकिन वह महावीर जी नहीं बल्कि उनके बेटे श्री राज शर्मा भाई थे जिनकी आवाज़ बिलकुल महावीर जी की तरह ही है. राज भाई ने बताया कि, '' अभी ४-५ मिनट पहले डैड नहीं रहे, वो चाहते थे कि यह बात जल्द से जल्द आपको बताई जाए..''. अपने प्रति उनके स्नेह को देख जो आंसू निकलना शुरू हुए तो बड़ी देर लगी फिर उन्हें थमने में. निश्छल भाव से मुझ पर स्नेह रखने वाली एक और पुण्यात्मा भौतिक रूप से यह दुनिया छोड़ चुकी थी. वह दिन मेरे लिए अपनी अब तक की ज़िंदगी के सबसे दुःख भरे दिन में से एक था.
मैं यह तो नहीं कहता कि दुनिया में भले आदमी नहीं हैं लेकिन यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि आदरणीय महावीर जी जैसा दूसरा कोई हो यह नामुमकिन है.

दीपक मशाल

Monday, 21 November 2011

स्नेह का दूसरा नाम- महावीर शर्मा


'महावीर स्मृति सप्ताह' की शृंखला को आगे बढ़ाते हुए आज कनाडा से समीर लाल 'समीर' जी ने महावीर जी को याद करते हुए कहा कि-

स्नेह का दूसरा नाम- महावीर शर्मा

'आपके भाव बहुत प्रभावित करते हैं किन्तु यदि आप गज़ल के व्याकरण पर थोड़ा सा काम कर लें तो आपकी रचनायें गज़ल के रुप और बेहतर प्रभाव छोड़ेंगी. कृप्या अन्यथा न लें. आपसे मिला तो कभी नहीं किन्तु न जाने क्यूँ आपसे एक अपनापन सा लगता है, इसलिए कह गया.'

यह था महावीर जी से पहला परिचय सन २००५ में याहू ग्रुप के ईकविता मंच के द्वारा. नया नया शौक जागा था कविता कहने का. हर विधा में बिना व्याकरण जाने कुछ प्रायस करते रहने का नया शौक. ऐसे वक्त में गज़ल के महाज्ञाता और वरिष्ट का ऐसा आशीष पाकर धन्य हुआ. तुरंत ही जबाब दिया, आभार प्रदर्शन किया और निवेदन किया कि आप अपना फोन नम्बर दें तो चर्चा हो.

हालांकि उन दिनों वो कुछ अस्वस्थ थे किन्तु तुरंत ही जबाब आ गया. न सिर्फ फोन नम्बर बल्कि मेरी एक रचना को गज़ल में परिवर्तित कर उस पर तख्ति कैसे की और सरल शब्दों में उसके व्याकरण का ज्ञान देते हुए. मैं धन्य महसूस कर रहा था और बस, फोन पर चर्चाओं का सिलसिला शुरु हुआ.

पितृतुल्य स्नेह मिला. बात करने में इतने सहज, सौम्य और सरल कि कभी यह अहसास ही नहीं हुआ कि उनसे कभी मुलाकात नहीं है. शीघ्र ही उन्होंने अपने स्नेह से मुझे उस अधिकार का पात्र बना दिया कि जब कुछ ख्याल आते, उन्हें गज़ल की शक्ल में लिख उनके पास भेज देता. कभी इन्तजार नहीं करना पड़ा. तुरंत जबाब आता कि इस पंक्ति को ऐसा कह कर देखो और उस पर मात्राओं का ज्ञान, तख्ति निकालना आदि लगातार चलता रहा.

इस पूरी प्रक्रिया में उन्होंने न तो कभी अपने लगातार गिरते स्वास्थय का अहसास होने दिया और न ही कभी इसके चलते जबाब और सलाह देने में देर की. लगता जैसे ऊँगली पकड़ कर चलना सिखा रहे हैं. उन्हीं के माध्यम से प्राण शर्मा जी जैसे महारथी और गज़ल के सिद्धहस्त से परिचय प्राप्त हुआ और उनसे भी वही अपार स्नेह पा रहा हूँ. कई बार खुद के इतने भाग्यशाली होने पर घमंड में भी आ जाता हूँ और आज प्राण जी हमेशा मेरे पक्ष में ढाल बन कर खड़े नजर आते हैं.

बीच में लन्दन जाना भी हुआ मात्र एक दिन के लिए. महावीर जी से फोन पर चर्चा हुई. उनकी तबीयत कुछ ज्यादा खराब थी उस वक्त और वह अस्पताल ही जा रहे थे. समयाभाव में उस दिन मिलना नहीं हो पाया और उसी दिन मुझे टोरंटो वापस आना था.

वापस आकर जब उनसे फोन पर बात हुई तो जिस तरह से वह भावुक हो उठे कि मैं भी अपने आंसू न रोक पाया. सोचने लगा कि यदि एक दिन और रुक जाता तो शायद मुलाकात हो जाती. मन बना लिया था कि अगली यात्रा में और कुछ हो न हो, महावीर जी से जरुर मुलाकात करुँगा.

इस बीच उनके कहानी वाले ब्लॉग पर मेरी लघुकथा छापी. बिखरे मोती की रिपोर्टों और मेरे अभियान 'धरा बचाओ, पेड़ लगाओ' के लिंक भी उन्होंने अपने ब्लॉग पर लगा कर सम्मान दिया. फिर एक दिन उनका ही फोन आया कि अपनी गज़लें भेजो, महावीर ब्लॉग पर छापना है. अच्छा लगेगा.

मैं क्या जानता था कि यह अंतिम वार्तालाप है. उन्होंने मेरी दो गज़लें छापी और वही उनके जीते जी उनके महावीर ब्लॉग की आखिरी प्रविष्टियाँ बन गई.

'वही होता है जो मंजूरे खुदा होता है' - एक दिन खबर आई कि महावीर जी नहीं रहे. मैं स्तब्ध!! बार बार महावीर ब्लॉग खोलता और सामने होती उनकी अंतिम प्रविष्टी- मेरी दो गज़ले जिन्हें उनके साथ साथ प्राण जी आशीष भी प्राप्त था. जब भी नजर पड़ती, महावीर जी के स्वर कानों में पड़ते कि बहुत बढ़िया लिख रहे हो, लिखते रहो.

आज महावीर जी नहीं है. इस दफा जब लंदन पहुँचा तो याद आया कि बिना महावीर जी मिले न जाने का वादा था, अब वो कैसे पूरा होगा. एक कशिश लिए भारी मन से लंदन से वापस लौट गया.

आज भी जब कुछ लिखता हूँ तो महावीर जी बरबस साथ होने का अहसास जगाते नजर आते हैं सुधरवाते हुए- व्याकरण सिखाते हुए.

दीपक ने जब इस ब्लॉग को पुनः आरम्भ करने का बीड़ा उठाया तो दिल भर आया. इस पुण्य कार्य के लिए दीपक को साधुवाद. प्राण जी भी इस अभियान में अपना वरद हस्त बनाये हैं, उनको भी प्रणाम एवं साधुवाद.

महावीर जी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि. मुझे मालूम है कि आज भी जब भी कुछ लिखता हूँ, वो उस पर अपनी नजर बनाये हैं. आप बहुत याद आते हैं महावीर जी.

-समीर लाल 'समीर'

Saturday, 19 November 2011

महावीर स्मृति सप्ताह-3


जिस प्रकार आप सबने ब्लॉग पुनरारंभ को एक सराहनीय कदम कहा है तो कदम-कदम पर आप सबका सहयोग भी जरूर मिलेगा. मेरी आप सबसे दरख्वास्त है कि अपनी रचनाओं में से कुछ को इस ब्लॉग को सींचने का माध्यम बनाइये. खासकर इस सप्ताह के लिए मैं ग्रेट ब्रिटेन में हिन्दी की अलख जगाये रखने वाले/ महावीर जी के संपर्क में रहे विद्वानों की तरफ़ एक बार फिर आशा भरी नज़रों से देख रहा हूँ.

आज पेश करता हूँ श्री महावीर जी का ही एक मनभावन, प्रेरक गीत. जहाँ तक मुझे पता है यह गीत श्री महावीर जी को स्वयं में बहुत पसंद था. तो लीजिये प्रस्तुत है आपके सामने-

अब धरती के गान लिखो

अब धरती के गान लिखो

लिख चुके प्यार के गीत बहुत कवि अब धरती के गान लिखो।
लिख चुके मनुज की हार बहुत अब तुम उस का अभियान लिखो ।।

तू तो सृष्टा है रे पगले कीचड़ में कमल उगाता है,
भूखी नंगी भावना मनुज की भाषा में भर जाता है ।
तेरी हुंकारों से टूटे शत्‌ शत्‌ गगनांचल के तारे,
छिः तुम्हें दासता भाई है चांदी के जूते से हारे।

छोड़ो रम्भा का नृत्य सखे, अब शंकर का विषपान लिखो।।

उभरे वक्षस्थल मदिर नयन, लिख चुके पगों की मधुर चाल,
कदली जांघें चुभते कटाक्ष, अधरों की आभा लाल लाल।
अब धंसी आँख उभरी हड्‍डी, गा दो शिशु की भूखी वाणी ,
माता के सूखे वक्ष, नग्न भगिनी की काया कल्याणी ।

बस बहुत पायलें झनक चुकीं, साथी भैरव आह्‍वान लिखो।।

मत भूल तेरी इस वाणी में, भावी की घिरती आशा है,
जलधर, झर झर बरसा अमृत युग युग से मानव प्यासा है।
कर दे इंगित भर दे साहस, हिल उठे रुद्र का सिहांसन ,
भेद-भाव हो नष्ट-भ्रष्ट, हो सम्यक्‌ समता का शासन।


लिख चुके जाति-हित व्यक्ति-स्वार्थ , कवि आज निधन का मान लिखो।।
महावीर शर्मा

प्रस्तुतकर्ता- दीपक मशाल

Friday, 18 November 2011

महावीर जी को लावण्या शाह जी की श्रद्धांजलि


कल अर्थात १७ नवम्बर को हम सबके चहेते श्री महावीर जी की प्रथम पुण्यतिथि थी जिसको ध्यान में रखते हुए आप सभी गुणीजनों के समक्ष इस सम्पूर्ण सप्ताह को 'महावीर स्मृति सप्ताह' के रूप में मनाने का विचार रखा था. विचार को संबल देते हुए अमेरिका से आदरणीया लावण्या शाह जी ने महावीर जी को स्मरण करते हुए इस सप्ताह का प्रथम आलेख भेजा जो कि आपके समक्ष प्रस्तुत है.. उम्मीद है कि अन्य साथियों से भी सहयोग मिलेगा--
लावण्या शाह जी का पत्र-
आदरणीय महावीर जी की उपस्थिति हिन्दी ब्लॉग लिखनेवालों के मध्य ऐसे थी मानों अनगिनत सितारों के बीच एक पवित्र ' आकाशगंगा ' का विस्तार हो . आज उनकी खामोशी हिन्दी ब्लॉग जगत व् साहित्य प्रेमी लोगों के लिए एक निरंतर प्यास बन चुकी है . मैं उनके परिवार के हरेक सदस्य से अपना नाता मान कर अपने आपको ' बृहत महावीर शर्मा परिवार का सदस्य ' ही कहती हूँ और उन्हें मेरे स्नेह व् छोटों को आशिष भेज रही हूँ .
आईये हम हमारे महावीर जी से एक बार फिर , परिचित हो लें -

महावीर शर्मा

  • जन्मः १९३३ , दिल्ली, भारत। निवास-स्थानः लन्दन, य़ू.के. शिक्षाः एम.ए.: पंजाब विश्वविद्यालय, भारत। लन्दन विश्वविद्यालय:गणित,ऑडियो विज़ुअल एड्स। ब्राइटन विश्वविद्यालय :स्टेटिस्टिक्स। उर्दू का भी अध्ययन। कार्य-क्षेत्रः १९६२ -१९६४ तक स्व: श्री ढेबर भाई जी के प्रधानत्व में भारतीय घुमन्तूजन सेवक संघ के अन्तर्गत राजस्थान रीजनल ऑर्गनाइज़र के रूप में कार्य किया । १९६५ में इंग्लैण्ड के लिये प्रस्थान । १९८२ तक भारत, इंग्लैण्ड तथा नाइजीरिया में अध्यापन। तीन वर्षों तक एशियन वेलफेयर एसोशियेशन के जनरल सेक्रेटरी के पद पर सेवा देते रहे। १९९२ में स्वैच्छिक पद से निवृत्ति के पश्चात अंतिम श्वांस तक लन्दन में ही उनका स्थाई निवास स्थान रहा। १९६० से १९६४ तक महावीर यात्रिक के नाम से हिन्दी और उर्दू की मासिक तथा साप्ताहिक पत्रिकाओं में कविताएं, कहानियां और लेख प्रकाशित। कादम्बिनी, सरिता, गृहशोभा, पुरवाई(लंदन),हिन्दी चेतना(अमेरिका), पुष्पक, गर्भनाल, इन्द्र दर्शन आदि हिंदी पत्रिकाओं में कविताएं, कहानियां और लेख प्रकाशित। इंटरनेट पर अनेक जालघरों पर भी रचनाएं प्रकाशित। "महावीर" ब्लॉग पर प्रतिष्ठित रचनाकारों की रचनाओं के साथ साथ नए रचनाकारों की रचनाएं भी सम्मलित करने का प्रयास करते रहे। हमारे प्रिय आदरणीय श्री महावीर जी को मरणोपरांत मार्च २०११ में उनकी पत्रकारिता के क्षेत्र में उपलब्धियों को ध्यान में रखते हुए हाईकमीशन लन्दन ने हज़ारी प्रसाद द्विवेदी सम्मान प्रदान कर इस सम्मान के गौरव में वृद्धि की. सम्मान को महावीर जी के सुपुत्र श्री राज शर्मा ने ग्रहण किया.
ज्ञानवान, सौम्य व्यक्तित्त्व के धनी सुशिक्षित , सुसंस्कृत आत्मीय स्वजन ,ऐसे पूज्य महावीर जी जो गजल के नियम भी आसानी से सिखला देते थे या अपने सुलझे हुए सुझावों से दूसरों को सही राह सुझा देते थे - फिर भी आपने कभी दम्भ न किया और न विद्वत्ता का प्रदर्शन ही किया ! वे इतने सरल व् सहज थे कि सभी को उनके बनाए जाल घरों पे आमंत्रित किया करते, दूसरे रचनाकारों की रचनाएं , शानदार ढंग से उनके जालघर पर प्रस्तुत किया करते और ई मेल से साहित्यरसिकों को इनके बारे में सूचित भी किया करते थे ! होगा कोई ऐसा अपनत्व देने वाला ? इतना उदार शायद ही कोई दूसरा ब्लॉग स्वामी होगा जैसे वे थे !
उनके ब्लॉग पे मुशायरा , कवि सम्मेलन इन सभी का आयोजन भी अक्सर होता रहता था जिसके लिए वे रचनाकारों से रचनाएं मंगवाते और सहर्ष सुंदर रीति से प्रस्तुत भी किया करते देखिये ना मानो वास्तव में मुशायरा जारी हो इस तरह महावीर जी द्वारा , यहाँ संचालन हो रहा है,

ऑन लाईन मुशायरा : आज हमारी ख़ुशकिस्मती है कि अमेरिका से इस मंच पर बरखा पर अपनी कविता से आपके दिलों में आनंद का संचार करने के लिए श्रीमती लावण्या शाह जी आ रही हैं। मैं देख रहा हूं कि लावण्या जी का नाम सुनते ही तालियों के शोर में मेरी आवाज़ ऐसे गुम हो गई जैसे नक्कारख़ाने में तूती की आवाज़। मैं जानता हूं कि आप उनकी कविता के लिए बेज़ार हो रहे हैं। हों भी क्यों ना, जिनकी ख्याति उनके ब्लॉग अंतरमन और http://www.lavanyashah.com/ ालवण्यम्` ~अन्तर्मन्`

कितने ही जालघरों, पत्रिकाओं, कवि-सम्मेलनों आदि में फैली हुई है। आप जानते ही हैं कि लावण्या जी महाकवि स्व. पंडित नरेन्द्र शर्मा जी की सुपुत्री हैं । पंडित जी के विषय में कुछ कहना तो सूरज के सामने दीपक दिखाने वाली बात होगी। लीजिए, लावण्या जी माइक पर आगई हैं-

http://mahavir.wordpress.com/2008/07/15/mushaira-part-1/

” पाहुन “

बरखा स -ह्रदया,

उमड घुमड कर बरसे,

तृप्त हुई, हरी भरी बन्, शुष्क धरा,

बागोँ मेँ खिल उठे कँवल - दल

कलियोँ ने ली मीठी अँगडाई !
फैला बादल दल , गगन पर मस्ताना

सूखी धरती भीग कर मुस्काई !

मटमैले पैरोँ से हल जोत रहा
कृषक थका गाता पर उमग भरा

” मेघा बरसे मोरा जियरा तरसे,

आँगन देवा, घी का दीप जला जा !”
रुन झुन रुन झुन बैलोँ की जोडी,

जिनके सँग सँग सावन गरजे !

पवन चलये बाण, बिजुरिया चमके
सत्य हुआ है स्वप्न धरा का आज,

पाहुन बन हर घर बरखा जल बरसे !

- लावण्या
तो इस तरह महावीर जी ने मुझे गौरव दिलाया जो कविता प्रस्तुत करने का अवसर दिया !
हां महावीर जी के संग मेरे , बड़े भाई श्री प्राण शर्माजी जो शायद ' प्रवासी भारतीयों ' की लम्बी शृंखला में सबसे पहले परदेस स्थायी हुए और हिन्दी / उर्दू में लेखन कार्य किया वे हमारे अग्रणी कहे जायेंगें और प्राण भाई साहब भी गजल विधा में माहिर हैं और लघु कथाएँ लिखने में भी सिध्ध हस्त हैं , उन्होंने भी ' मंथन ' हिन्दी ब्लॉग में महावीर जी के संग , सम्पादक की महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है जिसके लिए वे भी बधाई के हक्कदार हैं
मैं आज आदरणीय महावीर जी को श्रद्धापूर्वक याद करते हुए , प्राण भाई व् अब उनका हाथ बंटाने का निर्णय लेकर हिन्दी ब्लॉग जगत को पुनः महावीर जी के ब्लॉग की पताका साहित्य जगत में फहराती हुई रखने के लिए कमर कसने वाले युवा रचनाकार दीपक ' मशाल ' जी का भी सच्चे ह्रदय से अभिनंदन करती हूँ और मेरे हिन्दी ब्लॉग ' लावण्यम - अंतर्मन ' से , विविध प्रविष्टीयों से कुछ महावीर जी के लिखे हुए शब्द , आ. महावीर जी के ही वाक्यों को यहाँ उनकी पावन स्मृति में , श्रध्धा सुमन स्वरूप , प्रस्तुत कर रही हूँ
आदरणीय महावीर जी की वाणी आज भी हमारे संग है मानों महावीर जी के आशीर्वाद भी हमारे संग हैं , मैं तो ऐसा , ही महसूस कर रही हूँ ..
ईश्वर उन्हें अपने प्रकाश में समाहित किये आत्मा को सद्गति दे कर प्रसन्न हैं और वे सदा स्थूल नही परंतु सूक्ष्म स्वरूप में , उनके उच्च लेखन के जरिए हमारे साथ रहेंगें ऐसा मेरा विश्वास है
अत: सादर प्रणाम करते हुए अब प्रस्तुत कर रही हूँ आदरणीय श्री महावीर जी के चुने हुए शब्द
आदरणीय महावीर जी के शब्द :
महावीर said...

लावण्या
कुछ दिनों बाद तुम्हारी इस साइट को खोला तो इतना गंभीर और साथ ही सत्य घटनाओं के आधार पर यह उपन्यास(?) पढ़ कर ऐसा लग रहा था कि सब सामने हो रहा हो।
Blog archive पर चेप्टरों को देने के कारण कहानी को क्रमशः पढ़ने में आसानी हो गई थी। आशा है यह उपन्यास के रूप में कागज के पन्नों में सुसज्जित कर एक पुस्तक के रूप में भी पाठकों को मिले, जिस से हर बार कंप्यूटर खोले बिना कहीं भी पार्क में, सोते समय या कहीं भी जब समय मिले तो आनंद उठा सकें।
दूसरे, एक और पोस्ट के लिए बधाई देना चाहूंगा। यूसुफ़ साहब (दिलीप कुमार) के विषय में बहुत ही सुंदर लिखा है। बार बार पढ़ने को जी करता है। उनके विषय में इतना कुछ लिखा है कि इस सामग्री को बटोरने में ना जाने कितना परिश्रम किया होगा! कुछ नायाब तस्वीरें देख कर उनकी पुरानी यादें ताज़ा हो गईं। एक बार फिर बधाई और धन्यवाद!
सस्नेह
महावीर

JULY 6, 2007 10:44 AM
Lavanyam -Antarman said...

आदरणीय महावीर जी,
सादर नमस्कार !
आपका आना ,
मेरे जाल घर पर और मेरे प्रयासोँ को देखना, फिर उन्हेँ सराहना .
मैँ कृतार्थ हो गयी कि आपको मेरे प्रयास पसँद आये हैँ --
ये कथा मेरे,एक मित्र को अर्पित भावाँजलि स्वरुप है -
जो हम से बिछुड जाते हैँ वे हमारी स्मृति
मेँ सदा जीवित रहते हैँ
है ना ?
सादर,स स्नेह,
-- लावण्या

JULY 7, 2007 10:15 PM
महावीर said...

रोचकता, जानकारी और पुरानी यादें सब ही इस में हैं। पढ़ने में आनंद आगया।
सज्जाद साहब ने केवल १४ फ़िल्मों का संगीत देकर यह सिद्ध कर दिया कि quantity नहीं,
quality का महत्व है। इसी लिए आज भी लोग उनके संगीत को भुला ना पाए। एक ऐसा संगीतकार जिसने बचपन में ही सितार, वीणा, वायलिन, बांसुरी, मेन्डोलीन, जलतरंग, बैंजो, अकॉर्डियन, स्पेनिश गिटार आदि साज़ों पर महारत कर ली थी। स्वयं जीते जागते आर्केस्ट्रा थे।
इस प्रकार की जानकारी देती रहिए।

Lavanyam -Antarman said...

आदरणीय महावीर जी,

प्रणाम !

सही कहा आपने -- वन मेन ओर्केस्टा ही कहलायेँगे सज्ज्जाद साहब -

और आज के युग के गँधर्व - है ना ?

टिप्पणी के लिये धन्यवाद -- यूँ ही स्नेह रखेँ -

स -स्नेह,

--लावण्या

JULY 20, 2007 1:22 PM
महावीर said...

तिनकोँ से सजाये नीड, ख्वाबोँ से सजीले,
पलते विहँग जहाँ कोमल परोँ के बीच,
एक एका, आपा अपना, विश्व सपना सुहाना,
ऐसा लगे मानोँ, बाजे मीठी प्राकृत बीन !

उत्कृष्ट कलात्मक शैली में उच्च कोटि का शब्द विधान, बहुत ही सुंदर रचना है।

OCTOBER 1, 2007 5:46 PM
Lavanyam - Antarman said...

आदरणीय महावीर जी ,
आपका आना और मेरी कविता से ये पँक्तियोँ को आशिष देना मेरे लिये बहुत बडा तोहफा है ~`
ऐसे ही स्नेह व कृपा बनायेँ रखेँ -
सादर ,स - स्नेह,
-- लावण्या

OCTOBER 5, 2007 2:18 P
महावीर said...

"जब नरेन्द्र आये, तो उन्होँने जीवन की ऐसी अनुभूतियोँ को वाणी दी, जिनको छूने का साहस,जिनको कहने का साहस, लोगोँ मेँ नहीँ था".
स्व.पण्डित नरेन्द्र शर्मा जी के काव्य में "सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम्" का पूर्ण
सामंजस्य देखा जा सकता है। उन महान प्रतिभाशाली व्यक्ति के संग संग छायावादी
कवियों के सिरमौर श्री सुमित्रानन्दन पंत जी और आदरणीय डा. हरिवंश राय
बच्चन जी को बार बार नमन!
लावण्या, अगर विकीपीडिया पर श्री नरेन्द्र जी के विषय में पूर्ण रूप से नहीं
लिखा हो तो इस कार्य को पूरा जरूर करना क्योंकि इस में तुम ही सक्षम हो।


महावीर शर्मा

NOVEMBER 29, 2007 11:25 ऍम
महावीर said...

बहुत ही अच्छी जानकारी है। पढ़ कर पुरानी यादें ताज़ा हो गईं जब १९७८ में नाइजीरिया में छः मास तक रहा था। इतनी जानकारी देने के लिए धन्यवाद।

DECEMBER 21, 2007 11:55 ऍम
महावीर said...

मलिका पुखराज के बारे में जानकारी पढ़ कर पुरानी यादें ताज़ा कर दीं। उसके लिए धन्यवाद। हां, मलिका पुखराज का एक गाना था जो उन दिनों बहुत ही मकबूल हुआ था - 'अभी तो मैं जवान हूं'। जहां तक मुझे याद है कि इसकी धुन शायद मशहूर फिल्म संगीतकार 'हुसनलाल भगत राम' ने दी थी। इस गाने को उनकी बेटी ताहिरा ने भी बड़ी खूबसूरती से गाया। गाना इतना मशहूर था कि मलिका-ए-तरन्नुम 'नूरजहां' ने भी एक फ़िल्म में गाया था।
ऐसी जानकारी देते रहिए, बड़ा अच्छा लगता है, विशेषतयः हिंदी में पढ़ कर।
एक बार फिर धन्यवाद।

FEBRUARY 16, 2008 2:29 PM
महावीर said...

बस यही अंतर है, लोग चले जाते हैं और समय की चादर का आवरण उनकी यादों तक को ढांप लेती है। किन्तु, महान व्यक्तियों के अस्तित्व और व्यक्तित्व के अमरत्व के सामने काल हार कर हथियार डाल देता है। वे सदैव जीवित रहते हैं।
श्रद्धेय पंडित जी आज भी उनके गीतों, कविताओं, सिने-जगत और टी.वी. में अमूल्य योगदान, अतीत के संस्मरणों और साहित्य में जीवित हैं, कल भी रहेंगे।
आज फिल्मों में स्तरीय गीतों के अभाव में श्रद्धेय पंडित जी की रिक्तता बहुत ही महसूस होती है।
उनकी पुण्य-तिथि पर मेरी ओर से श्रद्धाञ्जलि।

FEBRUARY 11, 2008 1:41 PM
महावीर said...

पंडित नरेंद्र शर्मा जी कालजयी साहित्यकार .. 'थे' शब्द कहने में मुझे संकोच हो रहा है. उनका साहित्य अमर है, उनकी कवितायेँ और अन्य रचनाएं आज भी लता जी और कितने ही महान संगीतकारों के स्वरों में एक नया स्वर देती रहीं. , कवि-सम्मेलनों में, चल-चित्रों, रेडियो, टी.वी. के महाभारत जैसे अद्वितीय सीरियलों में हर घर में, ज़मीन पर और ख़ला में उनकी वाणी आज भी गूँज रही है. उनके चित्रों में आज भी सशरीर साकार दिखाई देते हैं, केवल भीतर की आँखे खोलकर देखने की बात है. फिर भी परंपरावादिता के अनुसार पंडित जी को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित है.
लावण्या, (आज तुम्हारे नाम के साथ 'जी' नहीं लगाऊंगा क्योंकि अपने बच्चों, छोटी बहनों, भतीजियों आदि के नामों से 'जी' जोड़ने से न जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है जैसे 'अपनापन' सा छीन लिया गया हो), यही कहूँगा कि आज इस पुण्यतिथि पर मेरी श्रद्धांजलि के साथ यही आशीर्वाद है कि तुम पंडित जी के पदचिन्हों को संभालते हुए साहित्य जगत में देदीप्यमान होकर अपनी और स्व. पंडित जी की साहित्यिक-कृतियों द्वारा इसी प्रकार साहित्य-सेवारत रहो.

FEBRUARY 11, 2010 9:02 AM
अंत में यही कहूँगी , आदरणीय महावीर जी , हम आपको कभी ना भूल पायेंगें
मेरे स्व. पिता पण्डित नरेंद्र शर्मा जी की पंक्तियाँ दुहराती हूँ ,
' आज के बिछुड़े मन जाने कब मिलेंगें ' ?
सादर श्रध्धा सहित नमन व भावभरी अश्रुपूरित श्रध्धान्जली
- लावण्या दीपक शाह
सीनसीनाटी , ओहायो , यू. एस. ए.

प्रस्तुतकर्ता- दीपक मशाल

Wednesday, 16 November 2011


आज १७ नवम्बर है, यानी आदरणीय महावीर शर्मा जी की प्रथम पुण्यतिथि. पिछले वर्ष आज ही के दिन इस ब्लॉग एवं 'मंथन' ब्लॉग के निर्माता द्वय में से एक श्री महावीर जी इस पृथ्वी लोक को छोड़ अनंत का हिस्सा बन गए थे. देखते ही देखते एक साल हो गया लेकिन आज भी उनकी आवाज़ कानों में गूंजती है. वैसे तो हम सभी साहित्य रसिकों के लिए यह दिन शोक का दिन है, लेकिन साथ ही इसी बहाने हम महावीर जी की अपने दिलों में बसी मीठी यादों को ताज़ा करके देखते हैं. चलिए देखते हैं आँख बंद करके... चलिए एक बार फिर महसूस करते हैं उस स्नेहमयी आवाज़ को, उस स्पर्श को उस दुलार को जो हम हमेशा से हिन्दी साहित्य के इन संत से पाते रहे हैं. ओह्ह मैं खुशखबरी देना तो भूल ही गया, वैसे आप में से अधिकांश मित्रों को यह पहले से ही पता होगी लेकिन जिन्हें नहीं मालूम उन्हें बताता चलूँ कि

हमारे प्रिय आदरणीय श्री महावीर जी को मरणोपरांत मार्च २०११ में उनकी पत्रकारिता के क्षेत्र में उपलब्धियों को ध्यान में रखते हुए हाईकमीशन लन्दन ने हज़ारी प्रसाद द्विवेदी सम्मान प्रदान कर इस सम्मान के गौरव में वृद्धि की. सम्मान को महावीर जी के सुपुत्र श्री राज शर्मा ने ग्रहण किया.


सबसे पहले लीजिये आपके लिए हाज़िर है श्री महावीर जी की एक महकती हुई, बेहतरीन ग़ज़ल

कुछ अधूरी हसरतें अश्के-रवाँ में बह गये

क्या कहें इस दिल की हालत, शिद्दते-ग़म सह गये।

गुफ़तगू में फूल झड़ते थे किसी के होंठ से

याद उनकी ख़ार बन, दिल में चुभो के रह गये।

जब मिले हम से कभी, इक अजनबी की ही तरह

पर निगाहों से मेरे दिल की कहानी कह गये।

यूँ तो तेरा हर लम्हा यादों के नग़मे बन गये

वो ही नग़मे घुट के सोज़ो-साज़ दिल में रह गये।

दिल के आईने में उसका, सिर्फ़ उसका अक्स था

शीशा-ए-दिल तोड़ डाला, ये सितम भी सह गये।

दो क़दम ही दूर थे, मंज़िल को जाने क्या हुआ

फ़ासले बढ़ते गए, नक़्शे-क़दम ही रह गये।

ख़्वाब में दीदार हो जाता तेरी तस्वीर का

नींद अब आती नहीं, ख़्वाबी-महल भी ढह गये।

दादामुनि महावीर जी के चले जाने से स्तब्ध और दु:खी ख्यातिलब्ध साहित्यकार श्री पंकज सुबीर जी ने अपने भावों को ग़ज़ल के रूप में सहेजा था.. आप भी उस ग़ज़ल को पढ़ियेगा-

सितारा टूट गया कोई जगमगाता हुआ

चराग़ बुझ गया कोई है झिलमिलाता हुआ*

दरख्‍़त कल वो हवाओं में गिर गया आखि़र

खड़ा हुआ था घनी छांव जो लुटाता हुआ

हज़ार ग़म थे, मुश्किलें थीं, परेशानी थीं

मगर मिला वो हमेशा ही मुस्‍कुराता हुआ

पकड़ के हाथ वो चलना उसे सिखाता था

कोई जो राह में मिलता था डगमगाता हुआ

अजीब जि़द थी, बला का था हौसला उसमें

मिला वो मौत से पंजा ही बस लड़ाता हुआ

'मिलेंगे हश्र में फिर हम जो आज बिछड़ेंगे'

चला गया वो यही गीत गुनगुनाता हुआ

'सुबीर' उसको 'महावीर' नाम क्‍यूं न मिले

जिया जो ज्ञान की गंगा सदा बहाता हुआ


मेरा विचार है यह पूरा सप्ताह श्री महावीर जी को याद करते हुए उनकी खुद की कलम से निकली रचनाओं को प्रकाशित कर और उनसे सम्बंधित संस्मरणों के द्वारा उन्हें अपने स्मृति मंदिर में फिर सजा कर मनाया जाए.. आपका क्या ख्याल है?

यदि सहमत हों तो महावीर जी से सम्बंधित अपने-अपने व्यक्तिगत संस्मरण या तो अपने ब्लॉग पर लगाएं या मुझे mahavir.sharma5@googlemail.com या mashal.com@gmail पर प्रेषित करके साहित्य सरोवर के मानस हंस श्री महावीर जी को श्रद्धांजली देवें.


Tuesday, 8 November 2011

पूर्णिमा वर्मन जी की एक कविता


आप सबके स्नेह को पाकर अभिभूत हूँ साथ ही आश्वस्त भी कि आदरणीय प्राण जी एवं आप सभी अग्रजों के रहते श्री महावीर जी की स्थूलरूप से अनुपस्थिति का अहसास नहीं होगा और उनके द्वारा प्रारंभ किया गया यह ब्लॉग पुनः अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए गति पकड़ सकेगा. कल आप लोगों का आह्वाहन करते ही जिस तरह से आप सभी का आशीर्वाद और प्रोत्साहन मिला उससे लगा ही नहीं कि एक लम्बे अंतराल के लिए इस श्रंखला में विराम लगा था.
आज आपके लिए पूर्णिमा वर्मन जी की एक कविता लेकर आया हूँ. आनंद उठाइएगा..


सन्नाटों में आवाज़ें

सन्नाटों में भी आवाज़ें
खुशियों में भी दर्द छुपे हैं

शब्दों ने
कुछ और कहा है
अर्थों ने
कुछ और गुना है
समझ बूझकर चलने वाले
रस सागर में डूब चुके हैं

तोल-मोल है
बड़ा भाव है
दुनिया आडंबर
तनाव है
झूठे खड़े मंच पर ऊँचे
हाथ जोड़कर संत झुके हैं

जग की बस्ती
में दीवाने
ईश्वर अल्ला को
पहचाने
मन के सादे बाज़ारों में
हम यारों बेमोल बिके हैं

पूर्णिमा वर्मन

प्रस्तुतकर्ता- दीपक मशाल

Saturday, 7 August 2010

कनाडा से समीर लाल 'समीर' की दो ग़ज़लें


ग़ज़ल
समीर लाल ‘समीर’


मुद्दतों बाद उसे दूर से जाते देखा
धूप को आज यूँ ही नज़रें चुराते देखा

मुद्दतों बाद हुई आज ये कैसी हालत
आँख को बेवज़ह आंसू भी बहाते देखा

मुद्दतों बाद दिखे हैं वो जनाबे आली
वोट के वास्ते सर उनको झुकाते देखा

मुद्दतों बाद खुली नींद तो पाया हमने
खुद को सोने का बड़ा दाम चुकाते देखा

मुद्दतों बाद जो लौटा हूँ मैं घर को अपने
अपने ही भाई को दीवार उठाते देखा

मुद्दतों बाद कोई आने लगा अपने सा
रात भर ख्वाब में मैंने उसे आते देखा

मुद्दतों बाद किसीने यूँ पुकारा है "समीर"
खुद ही खुद से पहचान कराते देखा
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ग़ज़ल
समीर लाल ‘समीर'


अकेले चले हो किधर धीरे-धीरे
युं ही क्या कटेगा सफ़र धीरे-धीरे

दुआओं की खातिर किये थे जो सज़दे
सभी को दिखेगा असर धीरे-धीरे

पिलाई है तुमने जो आँखों से मदिरा
चढ़ेगी वो बन के ज़हर धीरे-धीरे

रहूँगी मैं ज़िंदा सजन बिन तुम्हारे
चलेगी ये सांसें मगर धीरे-धीरे

नहीं मैंने सोचा, जुदा तुमसे होकर
कि बरपेगा ऐसा क़हर धीरे-धीरे

उसे बोलते हैं नज़र का मिलाना
खुशी से मिली हो नज़र धीरे-धीरे

कभी तो कहो प्यार से बात मन की
बना लो मुझे हमसफ़र धीरे-धीरे
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आगामी अंक : शुक्रवार, १३ अगस्त २०१०

आकाशवाणी दिल्ली के केंद्र निदेशक

डॉ लक्ष्मी शंकर वाजपेयी की ग़ज़लें

Saturday, 31 July 2010

प्रतिष्ठित कवयित्री और कहानीकर दिव्या माथुर की कविताएँ


इस वर्ष "राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त मेमोरियल ट्रस्ट" का "राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त प्रवासी पुरस्कार" हिन्दी की प्रतिष्ठित कवयित्री और कहानीकार दिव्या माथुर के काव्य-संग्रह 'झूठ, झूठ और झूठ' को दिया जायेगा. इस पुरस्कार की राशि २१००० रुपये है. हमारी ओर से दिव्या माथुर को ढेरों बधाइयां!
प्राण शर्मा द्वारा "झूठ, झूठ और झूठ" की समीक्षा नीचे दिए हुए लिंक पर पढ़ सकते हैं:
"झूठ, झूठ और झूठ"


झूठ १
दिव्या माथुर


झटका
झिंझोड़ा
अटका, पटका
भटकाए न भटका
गले में अटका
गया न सटका
मन में खटका
चेहरा लटका
कम्बख़्त आँख से
झटपट टपका
झूठ मेरा !

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झूठ -२
दिव्या माथुर


बेचारे के थे
न पाँव न पँख
गोद खिलाया
काँधे बिठाया
नाशुक्रा निकला
ये निगोड़ा
सर पर चढ़
मेरे ही बोला
देखो तो ज़रा
ये झूठ मेरा !
************************

झूठ -3
दिव्या माथुर

मेरी ख़ामोशी
एक गर्भाशय है
जिसमें पनप रहा है
तुम्हारा झूठ
एक दिन जनेगी ये
तुम्हारी अपराध भावना को
मैं जानती हूँ कि
तुम साफ़ नकार जाओगे
इससे अपना रिश्ता
यदि मुकर न भी पाए तो
उसे किसी के भी
गले मढ़ दोगे तुम
कोई कमज़ोर तुम्हें
फिर बरी कर देगा
पर तुम
भूल के भी न इतराना
क्यूंकि मेरी ख़ामोशी
एक गर्भाशय है जिसमें पनप रहा है
तुम्हारा झूठ !
****************************

झूठ -4
दिव्या माथुर


झूठ
सर पर चढ़ के
बोलता है
यही सोच के
ख़ामोश हूँ मैं
ये न समझना
कि मेरे मुंह में
ज़ुबान नहीं .

**********************

झूठ -5
दिव्या माथुर


तुम्हारे छोटे, मँझले
और बड़े झूठ
उबलते रहते थे मन में
दूध पर मलाई सा
मैं जीवन भर
ढकती रही उन्हें
पर आज उफन के
गिरते तुम्हारे झूठ
मेरे सच को
दरकिनार कर गए
तुम मेरी ओट लिए
साधु बने खड़े रहे
और झूठ की चिता पर
सती हो गया सच.
******************************

Friday, 23 July 2010

भारत से द्विजेन्द्र "द्विज" की दो ग़ज़लें


ग़ज़ल
द्विजेन्द्र "द्विज"


जिधर कहीं भी है ख़्वाबों का कारवाँ निकला
क़दम-क़दम पे उधर एक इम्तिहाँ निकला

उलझते क्यों न वहाँ हमसफ़र सब आपस में
जहाँ भी रहनुमा रहजन का हमज़बाँ निकला

जुनूँ में आग लगा कर तो भाग ली वहशत
जब आई होश तो अपना ही वो मकाँ निकला

परिन्द अम्न के जाकर कहाँ बसर करते
हर एक शाख़ पे ही ख़ौफ़ मेज़बाँ निकला

वो जिसकी बात में जादू बला का रहता था
बयाँ के वक़्त वही शख़्स बेज़ुबाँ निकला

******************
ग़ज़ल
द्विजेन्द्र "द्विज"


जबकि नारों में यहाँ हैं लाख उजियारे हुए
क्यों अँधेरे ही मगर फिर आँख के तारे हुए

ज़ात,मज़हब,रंग,नस्लें और फ़िरक़े हो गया
आदमी था एक जिसके लाख बँटवारे हुए

लफ़्ज़, जिनका था हमारी ज़िंदगी से वास्ता
आपके होंठों पर आकर खोखले नारे हुए

थाम कर सच्चाई के तिनके हैं बैठीं झुग्गियाँ
झूठ की ईंटों से ऊँचे कितने चौबारे हुए

आप अंगारों को फूलों में बदल सकते नहीं
क्या करेंगे आप फिर जब फूल अंगारे हुए

आजकल अपने घरों में भी नहीं महफ़ूज़ हम
साज़िशें चौखट , दरो-दीवार हत्यारे हुए

सीख लेते हैं सलीबों पर लटकना ख़ुद-ब-ख़ुद
हों जहाँ भी लोग इतने ख़ौफ़ के मारे हुए

ज़िन्दगी जीना सिखाते हैं हमें जाँबाज़ वो
जो नहीं ख़ुद के मुख़ालिफ़ जंग में हारे हुए

यूँ नज़र आता 'द्विज' इनमें सुर न कोई ताल था
हाथ में आई कलम, जब लफ़्ज़ बंजारे हुए

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Friday, 16 July 2010

भारत से डॉ. सुभाष राय की दो रचनाएं

डॉ. सुभाष राय
जन्म : : जनवरी 1957 में उत्तर प्रदेश के जनपद मऊ नाथ भंजन में स्थित एक छोटे से गांव बड़ागांव में।
शिक्ष-दीक्षा :मऊ के डी सी एस के डिग्री कालेज से हिंदी, अंग्रेजी और मनोविज्ञान विषयों के साथ स्रातक परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। आगरा विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध साहित्य संस्थान के.एम.आई. से हिंदी भाषा और साहित्य में स्रातकोत्तर की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। वहीं से विश्वविद्यालयीय शिक्षक योग्यता परीक्षा नेट पास की, विधि की पढ़ाई पूरी की और उत्तर भारत के विख्यात संत कवि दादूदयाल के रचना संसार पर शोध किया। डाक्टरेट मिली।
प्रकाशन :जब मैट्रिक का विद्यार्थी था, तभी से जनवार्ता, गांडीव जैसे काशी के समाचारपत्रों में कविताएं, कहानियां और आलेख प्रकाशित होने लगे थे। समसामयिक विषयों पर एक हजार से ज्यादा लेख प्रकाशित। हिंदी क्षेत्र की लगभग सभी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं लगातार लेख, व्यंग्य, समीक्षा और कविताओं का प्रकाशन।
इन्टरनेट पर :अपने ब्लॉग ‘बात-बेबात’ और 'साखी' के अलावा अनेक प्रतिष्ठित ई-मैग्ज़ींस में कवितायेँ और अन्य रचनाएँ. विश्व कविता संग्रह कविता कोश में रचनाएँ शामिल.
प्रसारण :प्रयाग में निवास के दौरान आकाशवाणी इलाहाबाद से कई वर्षों तक कविता, कहानी और वार्ताओं का प्रसारण।
सम्मान-पुरस्कार :: संस्कार भारती, आगरा विकास संघ तथा कई अन्य साहित्यसेवी संस्थाओं की ओर से सम्मान। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के प्रतिष्ठापूर्ण पुरस्कारों की चयन समिति का सदस्य रहा.
विशेष : नवगीत के सशक्त हस्ताक्षर डा. उमा शंकर तिवारी, हिंदी के प्रसिद्ध लेखक और आलोचक डा. कन्हैया सिंह, नयी कविता के शीर्ष रचनाकारों में शामिल श्रीराम वर्मा के अलावा हिंदी के अनन्य साधक डा रघुवंश, जगदीश गुप्त, मार्कंडेय जी, दूधनाथ सिंह आर प्रो हरिमोहन के सानिध्य में बैठकर साहित्य पढ़ने का अवसर मिला। केन्द्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के पत्रकारिता विभाग में छः माह तक अध्यापन
संप्रति :प्रयाग के नार्दर्न इंडिया पत्रिका ग्रुप में सेवा शुरू करके तीन दशकों की इस पत्रकारीय यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव पर. अमृत प्रभात, आज, अमर उजाला जैसे प्रतिष्ठित दैनिक समाचारपत्रों में शीर्ष जिम्मेदारियां संभालने के बाद इस समय आगरा में एक मिड-डेयर दैनिक समाचारपत्र डीएलए से संपादक विचार के रूप में जुड़ा हुआ हूं।
संपर्क : ए-158, एमआईजी, शास्त्रीपुरम, बोदला रोड, आगरा (यूपी)
फोन: ०९९२७५००५४१

'मेरे भीतर तुम उपस्थित रहोगे'
डॉ. सुभाष राय

ओ मेरे पिता! तुम्हारा
अंश हूँ मैं सम्पूर्ण
मां के गर्भ में रचा
तुमने मुझे अपने लहू से

तुमसे मुक्त कैसे
हो पाऊंगा कभी
कैसे वापस लौटा सकूँगा तुझे
उसका अंश भी जो
तुमने दिया है मुझे
सब कुछ निछावर करके भी

अपने आंसुओं के साथ
रखा तुमने मुझे
जो करुणा और प्रेम
पाता हूँ अपने भीतर
तुम्हारी संवेदना से सिंचित है वह
कैसे विछड़ सकता हूँ मैं
तुमसे, तुम्हारे आंसुओं से

मैं जानता हूँ तुम रहोगे
सदा, सर्वदा मेरी आत्मा में
ज्योति की तरह दीप्त
मेरी नसों में बहते हुए
शताब्दियों के इतिहास की तरह
समय में ओझल वर्तमान की तरह
युग-युगों में फैले
भविष्य की तरह

भले ही तुम्हारा शरीर थम जाये
तुम्हारी हड्डियाँ तुम्हारा बोझ
उठाने से मना कर दें
तुम्हारा ह्रदय धड़कने से
इनकार कर दे
भले ही तुम संसार को
उसके पार्थिवत्व को
किसी भी पल अस्वीकार कर दो
पर मैं तुम्हारा मूर्त स्वीकार हूँ
तुम्हारा पूर्ण प्राकट्य हूँ
मेरे भीतर तुम उपस्थित रहोगे
तब भी, जब नहीं होगे
किसी जागतिक दृश्य में

मां ने तुम्हारी प्रतिकृति में
जो नवचैतन्य सौंपा था तुझे
उसकी प्रथम श्वांस के साक्षी हो तुम
तुम्हारी बाँहों में अनंत
अंधकार से मुक्ति पाई मैंने
अपनी अजस्र निश्छलता से
सींचकर तुमने मनुष्यत्व दिया मुझे
जब तक आसमान के नीचे
मनुष्य होगा, मैं हूँगा, तुम होगे

मैं जब कभी हताश होता हूँ
थक जाता हूँ, असहज हो जाता हूँ
अपने कंधे पर महसूस करता हूँ
तुम्हारे खुरदरे हाथ
और निकल आता हूँ
नैराश्य के विकट व्यूह से
जीवन का पहिया हाथों में
सम्हाले युद्ध को तत्पर
अभिमन्यु की तरह

जब कभी आत्मीय प्रवंचनाएं
क्रोधाविष्ट हो घेरतीं हैं मुझे
छल-छद्म के साथ
उपस्थित होतीं हैं
तुम्ही मुझे मृत्यु से संवाद
की शक्ति सौंपते हो
और मैं यमराज से भी नहीं डरता
नचिकेता हो जाता हूँ

जब कभी संशय में होता हूँ
समरभूमि के बीच में
लडूं या मुक्ति पा लूं रण से
संघर्ष और कर्तव्य के संबंधों
को समझने में असमर्थ
हो जाता हूँ पूरी तरह
मेरे भीतर से निकलकर
सामने आ जाते हो
पटु महानायक कृष्ण की तरह
पलायन की ओर
रथ हांकने से रोक लेते हो
मेरा अर्जुन उठ खड़ा होता है
अपने गांडीव के साथ
याद आ जाता है जीवन
का आप्त वाक्य-
मामनुस्मर युद्ध च

मैं जानता हूँ तुम कुछ नहीं
कुछ भी नहीं चाहते मुझसे
पर मैं कुछ देना चाहता हूँ
सिर्फ यही है मेरे पास
लो, मैं देता हूँ वचन
तम्हे कभी आहत नहीं करूँगा
दुःख नहीं दूंगा
बना रहूँगा
तुम्हारा अभिमन्यु
तुम्हारा नचिकेता
तुम्हारा अर्जुन
**********
'अब सुनो तुम'
डॉ. सुभाष राय

सुबह का सूरज
तुम्हारे भाल पर
उगा रहता है अक्सर
मेरे हृदय तक
उजास किये हुए

मेरी सबसे सुन्दर
रचना भी कमजोर
लगने लगती है
जब देखता हूँ
तुम्हें सम्पूर्णता में

दिए की तरह जलते
तुम्हारे रक्ताभ नाख़ून
दो पंखडियों जैसे अधर
काले आसमान पर लाल
नदी बहती देखता हूँ मैं

सचमुच एक पूरा
आकाश होता है तुम्हारे होने में
जिसमें बिना पंख के
भी उड़ना संभव है
जिसमें उड़कर भी
उड़ान होती ही नहीं
क्योंकि चाहे जितनी दूर
चला जाऊं किसी भी ओर
पर होता वहीँ हूँ
जहाँ से भरी थी उड़ान

तुम नहीं होती तो
अपने भीतर की चिंगारी से
जलकर नष्ट हो गया होता
बह गया होता दहक कर
तुम चट्टान के बंद
कटोरे में संभाल कर
रखती हो मुझे
खुद सहती हुई
मेरा अनहद उत्ताप
जलकर भी शांत
रहती हो निरंतर

जो बंधता नहीं
कभी भी, कहीं भी
वह जाने कैसे बंध गया
कोमल कमल-नाल से
जो अनंत बाधाओं के आगे भी
रुकता नहीं, झुकता नहीं
कहीं भी ठहरता नहीं
वह फूलों की घाटी में
आकर भूल गया चलना
भूल गया कि कोई और भी
मंजिल है मधु के अलावा

सुन रही हो तुम
या सो गयी सुनते-सुनते
पहले तुम कहती थी
मैं सो जाता था
अब मैं कह रहा हूँ
पर तुम सो चुकी हो

उठो, जागो और सुनो
मुझे आगे भी जाना है.
**************